जयंति विशेष: जिद्दु कृष्णमूर्ति का चमत्कार

...जिस नौजवान को लाखों यूरोपीय, अमेरिकी और भारतीय लोग भगवान समझने लगे थे वह अगर किसी पोंगा पंडित की तरह अवतार या गुरु होने का नाटक करने लगता तो उसके लिए कितना आसान होता?

जिद्दु कृष्णमूर्ति का असली चमत्कार भारतीयों को भारतीयों की भाषा में समझाया नहीं गया है.

उनके गहरे मित्र और समर्थकों ने भी अभी तक बहुत ही ईमानदारी से कृष्णमूर्ति का प्रचार करने की कोशिश नही की है. उन्होंने भारतीय मन की कमजोरियों का लाभ उठाकर कृष्णमूर्ति का प्रचार नहीं किया है. इसीलिये कृष्णमूर्ति को लोग न तो जानते हैं न समझते हैं.

लेकिन ओशो रजनीश और जग्गी वासुदेव या रविशंकर जैसे लोगों ने भारतीय मन की कमजोरियों का फायदा उठाते हुए खुद को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से प्रचारित किया है.

इसीलिये न सिर्फ लोग उन्हें जानते हैं बल्कि उनकी पूजा भी करते हैं. इन लोगों ने भारतीयों का कितना हित या अहित किया है ये बात अलग है, इसका हिसाब लगाना हालाँकि बहुत आसान है.

इनके शिष्यों की जिन्दगी में थोड़ा सा गहराई से झांकिए सब पता चल जाता है. इनके अंधविश्वास, भाग्यवाद और गुरु पर हद दर्जे की निर्भरता (जिसे ये गुरुभक्ति कहते हैं) से साफ़ पता चलता है कि इन गुरुओं ने नुक्सान ही अधिक पहुँचाया है और अभी भी पहुंचा रहे हैं.

आइये कृष्णमूर्ति को भारतीय मन के ढंग से समझते हैं. हालाँकि यह ढंग बिलकुल ही गलत है लेकिन इसके प्रति चेतावनी जाहिर करते हुए मैं ये लेख लिख रहा हूँ. इसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि कृष्णमूर्ति को न जानने वाले लोगों को ये पता चल सके कि कृष्णमूर्ति सामान्य बाबाओं से किस तरह भिन्न हैं. कितने इमानदार, बोल्ड और कितने खालिस जमीनी इंसान हैं.

यह बताना इसलिए भी जरुरी है कि भारतीय मन चमत्कार में ही भरोसा करता है.

इमानदारी यहाँ चमत्कार नहीं है. इंसानियत यहाँ चमत्कार नहीं है. जब तक ये न बताया जाए कि किसी ने करोड़ों रुपयों को लात मार दी तब तक लोग त्याग को भी नहीं समझते.

अगर ये कहें कि फलाने चंद गरीब पैदा हुए और गरीब ही मर गए लेकिन बड़े अच्छे कवि थे तो लोग उन्हें नहीं पूछते. लेकिन ये कहें कि ढिकाने चंद राजमहल में पैदा हुए थे फिर अरबों खरबों की संपत्ती को लात मारकर बाबाजी बन गए तो इस आदमी को भारतीय लोग एकदम से पूजने लगते हैं. उसकी शिक्षा क्या है या वो क्या कह के गए हैं इससे उन्हें कोइ भी मतलब नहीं, वे बस उसकी मूर्ती और मन्दिर बनाकर ढोल पीटने लग जायेंगे.

इसीलिये राम कृष्ण सहित भारतीयों के सभी चमत्कारी अवतार या तो राजा हैं, या किसी अन्य अतिभौतिक या अतिप्राकृतिक अर्थ में चमत्कारी हैं. यहाँ तक कि स्वयं बुद्ध भी इसी अर्थ में लोगों को अधिक महिमावान नजर आते हैं. इसीलिये बुद्ध को भी बहुत पारम्परिक अर्थ में ही समझा जाता है.

यह बात बुद्ध के लिए समस्या बन गयी है. और इसीलिये कबीर, रैदास और नानक सहित गोरख को भी भारतीय भीड़ सम्मान नहीं दे पाती.

इस दृष्टि से कृष्णमूर्ति के चमत्कार को उजागर करना होगा ताकि लोग समझ सकें कि वे चमत्कारी बाबाओं और त्यागियों से गुणात्मक रूप से भिन्न हैं, न सिर्फ भिन्न हैं बल्कि उनसे बहुत ज्यादा सुलझे हुए और बहुत ज्यादा स्पष्टवादी और उपयोगी हैं. तो सवाल उठता है कि कृष्णमूर्ति के पास क्या था जिसे उन्होंने लात मार दी? क्या त्याग उन्होंने किया? इसे समझने की कोशिश कीजिये.

थीयोसोफिकल सोसाइटी ने बचपन में ही कृष्णमूर्ति को गोद ले लिया था और उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया. गुलाम भारत के दौर में उनकी शिक्षा इंग्लैण्ड में करवाई गयी और उन्हें विश्वगुरु की भूमिका के लिए चुना गया. एनी बेसेंट और बिशप लीडबीटर, जो थियोसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख थे, उन्होंने इस बालक को चुना था.

उनकी मान्यता ये थी कि इस बालक में गौतम बुद्ध की आत्मा का प्रवेश कराया जा सकता है और बुद्ध को भगवान मैत्रेय के रूप में कृष्णमूर्ति के शरीर के जरिये फिर से दुनिया के सामने लाया जा सकता है.

इस सोच के साथ कृष्णमूर्ति की शिक्षा शुरू की गयी. उनके नाम से कुछ किताबें भी लिखी गयी (एट द फीट ऑफ़ मास्टर) उनके नाम से एनी बेसेंट कई लेख लिखती रहीं. और उन्हें महान साबित करती रहीं.

कृष्णमूर्ति के जवान होते-होते उनके नाम पर करोड़ों की संपत्ति, महल, किले और जायदाद इकट्ठी हो गयी. उनके शरीर में बुद्ध के प्रवेश की घोषणा के बहुत पहले से ही उन्हें बुद्ध मानकर पूजा जाने लगा.

गुलाम भारत में जहां अंग्रेजों से मित्रता होना अपने आप में सौभाग्य माना जाता था. वहां नौजवान कृष्णमूर्ति को अंग्रेज और सारे यूरोपियन पूजने लगे थे, वे लोग उनके प्रति इतने समर्पित हो गये थे जिसका कोई हिसाब नहीं. दुनिया के बड़े राजनेता, दार्शनिक,धन्नासेठ, वैज्ञानिक, साहित्यकार इत्यादि उनकी एक झलक पाने को मरे जाते थे.

लेकिन कृष्णमूर्ति को इस सबसे नफरत थी. जिस दिन यह तय था कि कृष्णमूर्ति बुद्ध बनकर बोलना शुरू करेंगे उस दिन कृष्णमूर्ति ने सारी बिसात उलट डाली और कहा कि मैं कोई बुद्ध या अवतार या गुरु इत्यादि नहीं हूँ. मैंने अपना समाधान अपनी मेहनत से पाया है और आप भी अपनी समझ और मेहनत से अपना समाधान हासिल कीजिये.

आप कल्पना कीजिये, जिस नौजवान को लाखों यूरोपीय, अमेरिकी और भारतीय लोग भगवान समझने लगे थे वह अगर किसी पोंगा पंडित की तरह अवतार या गुरु होने का नाटक करने लगता तो उसके लिए कितना आसान होता? कितनी आसानी से वह दुनिया पर राज कर सकता था? कितनी आसानी से वह सब कुछ हासिल कर सकता था.

लेकिन कृष्णमूर्ति ने इस सबको इकट्ठा नकार दिया. इस नौजवान ने अपने नाम की गयी अरबों की संपत्ति को ठुकरा दिया. अपने नाम पर बनाई गयी संस्था (ऑर्डर ऑफ स्टार इन द ईस्ट) को भंग कर दिया और सबको सीधे-सीधे ये कहा कि सत्य एक पथहीन भूमि है उस पर कोई किसी को साथ नहीं ले जा सकता उस पर सबको अकेले ही चलना है और सारे धर्म, भगवान और मसीहा सब इंसानियत के दुश्मन हैं.

भारतीय धर्मप्रेमी तो ठीक हैं, वैज्ञानिक बुद्धि के यूरोपीय भी अभी तक इस सच्चाई को अपने गले नहीं उतार सके हैं. अभी भी गिने चुने लोग ही कृष्णमूर्ति को पढ़ते या समझते है. बाकी सब लोग किसी न किसी दाढी वाले या बाबा की गुलामी कर रहे हैं.

कृष्णमूर्ति इतने इमानदार और गैर समझौतावादी हैं की वे एक अर्थ में भारतीय लगते ही नहीं हैं. और आध्यात्मिक तो बिलकुल ही नहीं लगते.

यही उनका चमत्कार है– अगर कोई समझ सके तो.

(लेखक: संजय श्रमण, ये लेखक के अपने विचार हैं)

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