त्रिविध पावनी वैशाख पूर्णिमा: बौद्ध स्रोतों के आधार पर एक विवेचन

नमोऽस्तु बुद्धाय विशुद्धबोधये
विशुद्धधर्मप्रतिभासबुद्धये।
सद्धर्मपुण्योपगतानुबुद्धये
भवाग्रशून्याय विशुद्धबुद्धये॥
(बोधिसत्त्वसमुच्चयानाम कुलदेवता, बुद्धस्तोत्र, 1)

महामानवों का चरित केवल इतिहास बनकर नहीं रहता, वह चरित सदैव कालजयी होता है। वह चरित प्रत्येक काल के मानव को प्रेरित करता रहता है ताकि वह उस चरितानुसार अपना जीवन संवार सके और अनुभूत किए गए प्रत्यक्ष को अनुमिति से सत्य मानकर आगे की ओर प्रवृत्त हो सके। जब सत्य मार्ग की ओर किसी भी सत्त्व का चित्त लग जाता है तो यह चरित एक ऐसी अनूठी प्रेरणा बन जाता है कि हृदय श्रद्धा और विश्वास से भाव-विभोर हो जाता है, करोड़ों-अर्बुदों के मानव समुदायों द्वारा अपनी मुक्ति के लिए उसे प्रतिमान बना लिया जाता है, उसके द्वारा प्रशस्त किए गए पथ के सभी पथिक बन जाते हैं और उसकी वाणी में अपने देश और काल का सत्य खोजने लग जाते हैं।

भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को पलटने पर ज्ञात होगा कि सिन्धु संस्कृति के संवाहक और श्रमण परम्परा के उद्घोषक तथागत गौतम बुद्ध का जन्म, निब्बान और महापरिनिब्बान आज ही वैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस त्रिविधा पावनी वैशाख पूर्णिमा (वेसक) का न केवल बौद्ध धर्म-दर्शन में, अपितु मानवीय सभ्यता के सृजन और कल्याणकारी संस्कृति के संवर्द्धन में बहुत बड़ा महत्त्व है।

(1) वैशाख पूर्णिमा को जन्में सिद्धार्थ

सुत्तनिपात पालि ग्रंथ के नालकसुत्त, महायानी मिश्रित संस्कृत के बौद्ध ग्रंथ ललितविस्तर, आचार्य अश्वघोष के बुद्धचरित, अन्यान्य विभिन्न साहित्यिक स्रोतों एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर, फाह्यान और ह्वेनत्सांग के यात्रा वृत्तांतों के आधार पर शाक्यकुलभूषण नरश्रेष्ठ राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म लुम्बिनि में हुआ था।

तथागत गौतम बुद्ध के जन्म के समय भारत का राजनीतिक परिदृश्य अंग, मगध, काशी, कोसल आदि 16 महाजनपदों और शाक्य, कोलिय, वज्जि, मल्ल आदि 10 गणराज्यों में विभक्त था। शाक्य गणराज्य के महाराजा शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु अपने वैभव और उन्नति के लिए विश्वप्रसिद्ध थी। महाराजा शुद्धोधन की दोनों रानियाँ कोलिय गणराज्य की राजकुमारी महामाया और महाप्रजापति गौतमी थीं। महारानी महामाया के गर्भ से प्राचीन भारत के कपिलवस्तु के लुम्बिनी वन में 563 ईस्वी पूर्व राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ था। बाद में चक्रवर्ती सम्राट् अशोक ने एक शिलालेख वहाँ लगवाया था जिस पर लिखा हुआ मिलता है, “…हिदबुधेजाते साक्यमुनीति….” अर्थात् यहाँ शाक्यमुनि बुद्ध पैदा हुए थे। राजकुमार सिद्धार्थ के जन्म का वर्णन करते हुए महाकवि अश्वघोष ने लिखा है –

दीप्त्या च धैर्येण च यो रराज बालो रविभूमिमिवावतीर्णः।
तथातिदीप्तोऽपि निरीक्ष्यमाणो जहार चक्षूंषि यथा शशाङ्कः॥
बुद्धचरित, 1/12

अर्थात् दीप्ति और धीरता में वह पृथ्वी पर अवतीर्ण बाल सूर्य के समान शोभा वाला था। अत्यंत दीप्त होने पर भी जो कोई उसे देखता तो वह चन्द्रमा की भांति सबकी आंखें हर ले रहा था।

पालि भाषा में निबद्ध सुत्तपिटक के खुद्दकनिकाय के सुत्तनिपात के नालक सुत्त (688-89) में सिद्धार्थ के जन्म को लेकर कहा गया है –

‘‘सो बोधिसत्तो रतनवरो अतुल्यो, मनुस्सलोके हितसुखत्थाय जातो।
सक्यान गामे जनपदे लुम्बिनेय्ये, तेनम्ह तुट्ठा अतिरिव कल्यरूपा॥
‘‘सो सब्बसत्तुत्तमो अग्गपुग्गलो, नरासभो सब्बपजानमुत्तमो।
वत्तेस्सति चक्कोमिसिव्हये वने, नदंव सीहो बलवा मिगाभिभू’’॥

अर्थात् रत्नों में श्रेष्ठ, अतुल्य वह बोधिसत्त्व मनुष्यलोक के हित और सुख के लिए शाक्यों के लुम्बिनी ग्राम में पैदा हुए हैं, इसलिए यह बात असितादि सभी को हर्षित कर रही है। वह सभी सत्त्वों में उत्तम है, परम् व्यक्ति है, सभी जनों में उत्तम वृषभ (बैल) है, धम्मचक्र को सही दिशा में गति देने वाला, सिंहनाद से सम्पन्न सर्वजित् है।

ललितविस्तर के 7वें परिच्छेद से पता लगता है कि सिद्धार्थ का गर्भ अन्य गर्भों की भांति नौ मास का नहीं था, अपितु 10 मास का गर्भ था। उनके जन्म से पूर्व जब महारानी महामाया के गर्भ का 10वां मास आरम्भ हुआ तब प्रकृति की 32 अवस्थाओं में परिवर्तन होने लगा। असमय पुष्प खिल रहें हैं, प्रकृति का वातावरण समशीतोष्ण हो गया है, विभिन्न सुगंध वाले पुष्प असमय खिल रहे हैं, तालाब कमलों से भर गए हैं..आदि।

इस तरह सिद्धार्थ का जन्म लुम्बिनी में हुआ। उनकी माता ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाईं। महाप्रजापति गौतमी ने अपनी बहन को मरने से पहले वचन दिया था कि वे राजकुमार सिद्धार्थ के पालन-पोषण में कोई कमी नहीं रहने देंगी। वो उतनी भावुक थीं और वचनबद्ध थीं कि उन्होंने सिद्धार्थ के पालन-पोषण में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए अपने गर्भ को गिरा दिया। उनका यह त्याग न तो कभी जनमानस ने भुलाया और न ही कभी तथागत बुद्ध ने। बुद्ध के आगे ‘गौतम’ शब्द का लगाया जाना इसी त्याग का प्रतिफलन है। सिद्धार्थ जो बुद्ध हुए, वे ही गौतम बुद्ध कहलाए।

(2) वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध बने सिद्धार्थ

कपिलवस्तु के भव्य राजप्रासाद, सुख-सुविधायें, गृहस्थ जीवन और युवराज का वैभव सिद्धार्थ को रोकने के लिए या यू कहें सांसारिक मोह-माया में बांधने में अक्षम रहे। उनके मन में कुछ प्रश्न चल रहे थे जो संसार में विभिन्न दुःखों के शमन से सम्बन्धित थे। वे दुःखों का कारण और निवारण खोजना चाहते थे, जिसको लेकर अपनी पत्नी गोपा (यशोधरा) और माँ महाप्रजापति गौतमी से घंटों-घंटे वे बातचीत किया करते थे। विभिन्न थेरवादी और महायान के ग्रंथों में बुद्ध के गृहत्याग की घटना का विस्तृत वर्णन किया गया है जिसे महाभिनिष्क्रमण कहते हैं।

रोगी, वृद्ध, मृत तथा संन्यासी को देखकर सिद्धार्थ का बोधिचित्त जागृत हो गया और सांसारिक दुःखों के शमन के लिए एक मार्ग खोजने के लिए वो 29 वर्ष की अवस्था में एक लम्बी यात्रा पर निकल गए। भारत में महाभिनिष्क्रमण पर एक नवीन दृष्टिकोण बोधिसत्त्व डॉ. बी. आर. अम्बेडकर जी ने अपनी पुस्तक ‘बुद्ध एंड हिज धम्म’ में दिया है। उनके अनुसार बुद्ध का गृहत्याग शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के जल बटवारें को लेकर हुआ संघर्ष था। शाक्य गणराज्य कोलिय गणराज्य के साथ युद्ध करना चाहता था। सिद्धार्थ युद्ध के खिलाफ थे। शाक्य संघ ने उनके सम्मुख तीन प्रस्ताव रखे- 1. सिद्धार्थ सेना के साथ युद्ध करे, 2. फांसी पर लटकने या स्वेच्छा से देश छोड़ने की ओर प्रवृत्त हो और 3. परिवार के सामाजिक बहिष्कार सहित संपत्ति की जब्ती के लिए तैयार हो। सिद्धार्थ ने स्वेच्छा से देश छोड़ने की ओर कदम बढ़ाया। बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर की इस बात के पालि संदर्भों को कंवल भारती जी ने अपनी पुस्तक ‘राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर’ में संकलित किया है। पालि सुत्तपिटक के खुद्दकनिकाय के ग्रंथ सुत्तनिपात के चतुर्थ अट्ठकवग्ग (942-44) के 15वें अत्तण्डसुत्त की इन कुछ गाथाओं से बाबासाहब की बात को प्रमाण मिलता है, जो इस प्रकार है-

‘‘अत्तदण्डा भयं जातं, जनं पस्सथ मेधगं।
संवेगं कित्तयिस्सामि, यथा संविजितं मया॥
‘‘फन्दमानं पजं दिस्वा, मच्छे अप्पोदके यथा।
अञ्ञगमञ्ञेमहि ब्यारुद्धे, दिस्वा मं भयमाविसि॥
‘‘समन्तमसारो लोको, दिसा सब्बा समेरिता।
इच्छं भवनमत्तनो, नाद्दसासिं अनोसितं॥
‘‘ओसानेत्वेव ब्यारुद्धे, दिस्वा मे अरती अहु।”
सुत्तनिपात, 4/15/1-3

अर्थात् स्वयं के द्वारा दण्ड अर्थात् शस्त्र को धारण करना भयावह है। मुझमें संवेग अर्थात् वैराग्य कैसे उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। जैसे अल्पमात्रा जल में मछलियां छटपटाती रहती हैं, वैसे ही एक-दूसरे से विरोध करके लड़ने-झगड़ने वाली जनता को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। समस्त संसार निस्सार दिखायी देने लगा, लग रहा था कि सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसमें स्वयं के लिये स्थान खोजने पर निर्भय स्थान प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि अन्त तक समस्त जनता को परस्पर विरुद्ध होते हुए देखकर मैं ऊब गया।

गृहत्याग के छः वर्षों तक सिद्धार्थ इधर-उधर भटकते रहे। तत्कालीन विभिन्न गुरू उन्हें आश्वस्त नहीं कर सके। उनकी खोज कुछ अलग थी। ज्यादातर गुरू मानने पर बल देते थे, सिद्धार्थ तो जानना चाहते थे। वे किसी भी बिन्दु पर रुकने के स्थान पर खोज में लगे हुए थे। और अन्ततः 35 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ ने उरूवेला (वर्तमान बोधगया) में निरञ्जना नदी के तीर पर बोधि-वृक्ष के नीचे वैशाख-पूर्णिमा की ही रात्रि में बुद्धत्व का अधिगम किया, जिसे बौद्ध साहित्य में निब्बान कहा गया है। यह दुःख, दुःख समुदय, दुःख निरोध और दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा का ज्ञान था, जिसका आधार प्रतीत्यसमुत्पाद था। यह बौद्ध दर्शन का आधारस्तम्भ है। प्रतीत्यसमुत्पाद ही वह सूत्र है, जिसके अनुलोम-प्रतिलोम साक्षात्कार से राजकुमार सिद्धार्थ से सम्यक् सम्बुद्ध हुये, बुद्ध ने सर्वप्रथम कहा –

अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं।
गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं॥
गहकारक दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि।
सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसङ्खितं।
विसङ्खारगतं चित्तं तण्हानं खयमज्झगा॥
धम्मपद, 153-54

अर्थात् संसार में शरीर रूपी भवन के निर्माणकर्त्ता की खोज में वे अनेक जन्मों तक लगातार आवागमन करते रहे। इस जगत् में पुनः-पुनः जन्म लेना अत्यन्त दुःखदायी है। गृहकारक रूपी तृष्णा का दर्शन करने पर, भवन का निर्माण नहीं किया जा सकता अर्थात् नवीन शरीर की प्राप्ति नहीं हो सकती, यह जानकर ही बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् उन्होंने जाना कि भवन रूपी शरीर के निर्माण की कड़ियाँ टूट चुकी हैं, उसका शिखर अर्थात् अविद्या ध्वस्त हो चुकी है, चित्त संस्काररहित हो गया है तथा तृष्णा का क्षय हो चुका है।

बुद्ध ने प्रतीत्यसमुत्पाद का अनुलोम तथा प्रतिलोम ढंग से अवगाहन किया। प्रतीत्यसमुत्पाद का अनुलोमात्मक प्रत्यक्ष करते हुये गौतम बुद्ध ने देखा-

‘‘अविज्जापच्चया सङ्खारा, सङ्खारपच्चया विञ्ञाणं, विञ्ञाणपच्चया नामरूपं, नामरूपपच्चया सळायतनं, सळायतनपच्चया फस्सो, फस्सपच्चया वेदना, वेदनापच्चया तण्हा, तण्हापच्चया उपादानं, उपादानपच्चया भवो, भवपच्चया जाति, जातिपच्चया जरामरणसोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा सम्भवन्ति एवमेतस्सकेवलस्स दुक्खक्खन्धस्स समुदयो होति।” (विनयपिटक, महावग्ग, 1/1/1; संयुत्तनिकाय, 1/2/1/1/1; उदान, 1/3)

अर्थात् अविद्या के प्रत्यय से संस्कार की उत्पत्ति होती है, संस्कारों के प्रत्यय से विज्ञान, विज्ञान के प्रत्यय से नामरूप, नामरूप के प्रत्यय से षडायतन, षडायतन के प्रत्यय से स्पर्श, स्पर्श के प्रत्यय से वेदना, वेदना के प्रत्यय से तृष्णा, तृष्णा के प्रत्यय से उपादान, उपादान के प्रत्यय से भव, भव के प्रत्यय से जाति, जाति के प्रत्यय से जरामरणादि दुःख स्कन्ध का समुदय होता है। दुःखादि से आशय वृद्धावस्था, मृत्यु, शोक करना, परिदेव अर्थात् रोना पीटना, चैत्तसिक दुःख तथा पश्चाताप से है। दुःखों की उत्पत्ति जाति प्रत्यय से होती हैं।

प्रतीत्यसमुत्पाद के प्रतिलोमात्मक ज्ञान में अविद्यादि का क्रमशः निरोध है। बुद्ध बताते हैं-

‘‘अविज्जायत्वेव असेसविरागनिरोधा सङ्खारनिरोधो, सङ्खारनिरोधा विञ्ञाणनिरोधो, विञ्ञाणनिरोधा नामरूपनिरोधो, नामरूपनिरोधा सळायतननिरोधो, सळायतननिरोधा फस्सनिरोधो, फस्सनिरोधा वेदनानिरोधो, वेदनानिरोधा तण्हानिरोधो, तण्हानिरोधा उपादाननिरोधो, उपादाननिरोधा भवनिरोधो, भवनिरोधा जातिनिरोधो, जातिनिरोधा जरामरणसोकपरिदेवदुक्खदोमनस्सुपायासा निरुज्झन्ति एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधो होती’’ति। (विनयपिटक, महावग्ग, 1/1/1; संयुत्तनिकाय, 1/2/1/1/1; उदान, 1/3)

अर्थात् अविद्या के निरोध होने से संस्कार का निरोध हो जाता है, संस्कार के निरोध जाने से विज्ञान का निरोध जाता है, विज्ञान के निरोध हो जाने से नाम-रूप का निरोध जाता है, नाम-रूप के निरोध हो जाने से षडायतन का निरोध हो जाता है, षडायतन के निरोध से स्पर्श का निरोध हो जाता है, स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध हो जाता है, वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध हो जाता है, तृष्णा के निरोध हो जाने से उपादान का निरोध हो जाता है, उपादान के निरोध से भव का निरोध हो जाता है, भव के निरोध से जाति अर्थात् जन्म का निरोध हो जाता है तथा जाति के निरोध से जरामरणादि दुःखों का निरोध हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण दुःखस्कन्ध का निरोध हो जाता है।

प्रतीत्यसमुत्पाद के अनुलोमात्मक एवं प्रतिलोमात्मक ज्ञान से लगभग 2600 वर्ष पूर्व शाक्यकुलोपन्न राजकुमार सिद्धार्थ ने सम्यक् सम्बोधि प्राप्त की। उनका नाम यद्यपि सिद्धार्थ गौतम था किन्तु उन्होंने स्वयं को बुद्ध कहा। बोधिवृक्ष के नीचे साक्षात्कृत किए गए ज्ञान की वजह से उन्होंने स्वयं को बुद्ध कहा। धम्मपद (195) में बड़े ही सुन्दर शब्दों में कहा गया है –

सुखो बुद्धानमुप्पादो, सुखा सद्धम्मदेसना।
सुखा सङघस्स सामग्गी, समग्गानं तपो सुखो॥

अर्थात् बुद्ध का उत्पन्न होना (जन्म) सुखदायक है, सुखदायक है बुद्ध की सद्धम्म देशना, (भिक्खु) संघ की एकता सुखदायक है और एकता के साथ किया गया धम्म साधना (तप) सुखदायक है। सुत्तपिटक के खुद्दकनिकाय के सुत्तनिपात के चूळवग्ग के रतनसुत्त में इन गाथाओं के माध्यम से बुद्धत्व के महत्व् व विशेषांकन को दर्शाया गया है –

वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे,
गिम्हान मासे पठमस्मिं गिम्हे ।
तथूपमं धम्मवरं अदेसयि,
निब्बानगामिं परमं हिताय ।
इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।

अर्थात् जैसे वसन्त ऋतु के प्रारम्भ में वन के वृक्षकुञ्ज नव अंकुरों से पल्लवित हो कर सुन्दर लगते है वैसे ही सुन्दर एवं श्रेष्ठ धर्म का भगवान् ने उपदेश किया जो कि निर्वाण प्राप्ति कराता है अतः वह परम हितकारी है। यह बुद्ध की श्रेष्ठता कहीं गयी है, यह बुद्ध में उत्तम रत्न है- इस सत्य वचन के प्रभाव से सब प्राणियों का कल्याण हो।

वरो वरञ्ञू वरदो वराहरो,
अनुत्तरो धम्मवरं अदेसयि ।
इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं,
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।

अर्थात् श्रेष्ठ निर्वाण के दाता हैं, श्रेष्ठ धर्म के ज्ञाता हैं, श्रेष्ठ मार्ग के निर्देशक हैं। ये भगवान् बुद्ध स्वयं परम श्रेष्ठ है। आपने उत्तम, अनुत्तरित लोकोत्तर धर्म का उपदेश दिया है।यह बुद्ध की श्रेष्ठता कहीं गयी है, यह बुद्ध में उत्तम रत्न है- इस सत्य वचन के प्रभाव से सब प्राणियों का कल्याण हो।

(3) वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध का महापरिनिब्बान

बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् लगातार 45 वर्षों तक चारिका करते हुए आज से 2503 वर्ष पूर्व (483 BCE) वैशाख पूर्णिमा के दिन ही 80 वर्ष की अवस्था में कुसीनारा (उत्तरप्रदेश का कुशीनगर जिला) में साल वृक्ष के नीचे रात्रि के तीसरे पहर में महापरिनिब्बान को प्राप्त हुए। बुद्ध का अन्तिम भोजन सामिष था अथवा निरामिष था, इस विषय पर विद्वानों में एकमतता का अभाव है कि बुद्ध के परिनिर्वाण से पहले का भोजन सूकर मांस था या नहीं। दीघनिकाय के महावग्ग के महापरिनिब्बानसुत्त में चुन्द द्वारा दिये गये भोजन का नाम सूकरमद्दव दिया गया है जिसका अर्थ गलती से विद्वानों ने सुअर-मांस कर दिया है। उदान अट्ठकथा में इस शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा गया है-

केचि पन ‘‘सूकरमद्दवन्ति न सूकरमंसं, सूकरेहि मद्दितवंसकळीरो’’ति वदन्ति। अञ्ञे ‘‘सूकरेहि मद्दितप्पदेसे जातं अहिछत्तक’’न्ति। अपरे पन ‘‘सूकरमद्दवं नाम एकं रसायन’’न्ति भणिंसु। उदान अट्ठकथा, 8.5

अर्थात् सूकरमद्दव का अर्थ सुअर के द्वारा कुचला गया बांस का अंकुर तथा सूअरों द्वारा कुचले गये स्थान पर उगे कुकुरमुत्ता है। सूकरमद्दव एक तरह का मशरूम था, जिसकी अपच की वजह से तथागत का वैशाख पूर्णिमा को महापरिनिब्बान हुआ।

इस प्रकार तथागत गौतम बुद्ध के जीवन की तीन प्रमुख घटनाओं जन्म, निब्बान और महापरिनिब्बान से समन्वित त्रिविध पावनी वैशाख पूर्णिमा की आप सभी को मंगलकामनाएं। आप सभी कुशल कर्म एवं शीलाचरण करते हुए वैश्विक परिवार बनाने की ओर अग्रसर हों। धम्मपद (183) में कहा गया है –

सब्बपापस्स अकरणं कुसलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं एतं बुद्धानुसासनं।

अर्थात् सभी तरह के पाप कर्म नहीं करना, कुशल कर्मों को सम्पादित करना, चित्त का निरन्तर परिशोधन करते रहना, यही बुद्धों का शासन है।

लेखक – डॉ. विकास सिंह, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय के तुलनात्मक धर्म एवं सभ्यता केन्द्र में सह आचार्य हैं)

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