बचपन से हम देखते आए हैं कि समाज में बच्चों को राम, हनुमान, सीता, दुर्गा जैसे धार्मिक पात्रों के रूप में सजाकर उनके आदर्शों का प्रदर्शन किया जाता है. लेकिन इन प्रतीकों के माध्यम से जिस तरह की सामाजिक सोच और व्यवस्था को सामान्य बनाया गया, उस पर सवाल उठाना भी उतना ही ज़रूरी है.
आज समय बदल रहा है – और यह बदलाव सिर्फ प्रतीकों का नहीं, सोच का है. अब बहुजन समाज अपने बच्चों को बुद्ध, कबीर, रैदास, ज्योतिबा फुले, बिरसा मुंडा, पेरियार, बाबा साहेब और साहेब कांशीराम जैसे महान विचारकों और क्रांतिकारियों के रूप में देखना चाहता है. ये वे लोग हैं जिन्होंने समानता, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी.
हिंदू धर्म की परंपरागत संरचना ने सदियों तक जाति और भेदभाव को बनाए रखा – और अब बहुजन समाज उस व्यवस्था को चुनौती दे रहा है. यह सिर्फ असहमति नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और अधिकार की लड़ाई है.
यह बदलाव एक नई दिशा की ओर संकेत करता है – जहां अंधभक्ति की जगह तर्क होगा, अन्याय की जगह समानता होगी, और दमन की जगह स्वाभिमान.
यही बहुजन अस्मिता है. यही असली सामाजिक परिवर्तन है.
(लेखक: सतीश कुमार गौतम; जुनियर रिसर्च फेलो. ये लेखक के अपने विचार हैं)

