जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी: जातिगत जनगणना पर बहुजन विचारधारा की विजयगाथा

भारत की राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण आया है-जिसे बहुजन आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक जीत के रूप में देखा जा सकता है. कैबिनेट ने “जातिगत जनगणना” को हरी झंडी दे दी है, वह जनगणना जिसकी माँग बहुजन समाज ने दशकों से की थी. लेकिन इस जीत का असली श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह हैं बहुजन आंदोलन के पथप्रदर्शक, मान्यवर श्री कांशीराम साहब और भारत की राजनीति में आत्म-सम्मान की प्रतिमूर्ति, आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी.

जातिगत जनगणना: बहुजन चेतना की पुनर्स्थापना

“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी”-यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में बहुजन समाज की हिस्सेदारी की माँग थी. यह माँग तब उठी जब बहुजन समाज हाशिये पर खड़ा था, संसाधनों से वंचित था, और सत्ता से बहिष्कृत था.

आज जब सरकार ने इस ऐतिहासिक माँग को स्वीकार किया है, तो यह स्पष्ट है कि राजनीति की धुरी अब उन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मान्यवर कांशीराम साहब ने सबसे पहले उठाए थे.

आदरणीय बहन जी: सिद्धांत से सत्ता तक

आदरणीय बहन मायावती जी, जिन्होंने मान्यवर साहब के आंदोलन को न केवल संभाला बल्कि उसे सत्ता तक पहुँचाया, वह इस जनगणना के संघर्ष की साक्षात साक्षी रही हैं. उन्होंने बार-बार संसद से लेकर सड़कों तक, इस बात को उठाया कि जब तक बहुजन की सटीक गिनती नहीं होगी, तब तक सामाजिक न्याय केवल भाषणों तक सीमित रहेगा.

यह उनकी ही नेतृत्व शक्ति का परिणाम है कि आज पूरा राजनीतिक विमर्श बहुजन मुद्दों पर केंद्रित हो चुका है.

विचारों की चोरी और नकल: मगर रोशनी ‘ओरिजनल’ की ही चमकती है

आज कुछ राजनीतिक दल “जितनी आबादी, उतना हक” जैसे नारे दे रहे हैं, और कोई बहुजन को “PDA” जैसे नए नामों में बाँध रहा है. लेकिन यह बात इतिहास ने साबित कर दी है-“ओरिजनल का अपना ही प्रकाश होता है, और उस प्रकाश से उजाला चुराकर भी, असली को चुनौती नहीं दी जा सकती.”

मान्यवर कांशीराम साहब ने जो कहा, जो जिया, और जो संगठित किया-वह आज भारत की राजनीति का केंद्रबिंदु बन चुका है.

बहुजन आंदोलन: जोश, सोच और सिद्धांत

यह निर्णय केवल कागज पर एक नीति नहीं है, यह बहुजन समाज की आत्मा की जीत है. यह उस संघर्ष की जीत है जो दशकों तक बहनजी ने बिना थके, बिना झुके, पूरी निष्ठा से लड़ा.

यह बहुजन समाज को वह मनोबल देता है, जिससे अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी कह सके-अब मेरा भी समय आएगा.

कांशीराम साहब और बहनजी: एक विचार, एक मिशन

मान्यवर कांशीराम साहब और आदरणीय बहन मायावती जी केवल नेता नहीं हैं, वे एक सिद्धांत, एक संघर्ष की गाथा, और एक जनक्रांति के स्तंभ हैं.

आज जब भारत में जातिगत जनगणना को स्वीकृति मिली है, तो वह केवल एक सरकारी निर्णय नहीं, बल्कि इन दोनों महापुरुषों के संघर्ष की वैचारिक विजय है.

इतिहास उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति के शिल्पकार के रूप में याद करेगा.

(लेखक: स्वतंत्र लेखनी, संपादन जीपी गौतम, ये लेखक के अपने विचार हैं)

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