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मत-विमत

समता, समरसता और इनकी प्रासंगिकता

समता और समरसता दो ऐसे शब्द हैं जो भारतीय सामाजिक और दार्शनिक संदर्भ में गहरे अर्थ रखते हैं। ये दोनों अवधारणाएं सामाजिक व्यवस्था बनाने...

न्यायपालिका में आरक्षण: लोकतंत्र और विविधता का सवाल

भारतीय संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें विविधता को संरक्षित करने और सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान करने...

दलित-पिछड़ा गठजोड़ और बसपा: 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के संदर्भ में संभावित प्रभाव और भविष्य

बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) ने अपनी स्थापना से ही दलितों, पिछड़ों, और अन्य वंचित समुदायों के उत्थान और सशक्तिकरण को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया...

पड़ताल: ‘बसपा’ के खिलाफ ही दुष्प्रचार क्यों?

भारत में तमाम राजनीतिक दल सक्रिय हैं। कुछ मजबूती से सत्ता में तो कुछ विपक्ष में क़ायम हैं। सबके अपने-अपने मुद्दे और निहित उद्देश्य...

ग्रोक का अनफ़िल्टर्ड सच और भारत में सूचना का भविष्य

पिछले दो दिनों में, एआई की एक और नई शक्ति सामने आई है. सिर्फ़ दो महीने पहले, यह विचार कि ऐसा कुछ हो सकता...

बहुजन आंदोलन में उतराधिकारी की जरूरत

जब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का उल्लेख होता है, तो विरोधियों की उपस्थिति तो स्वाभाविक है ही, किंतु बहुजन समाज के स्वघोषित चिंतक, कार्यकर्ता...

हिन्दू-मुस्लिम नैरेटिव – राष्ट्र निर्माण में बाधक

"हिंदुत्व का कथित संकट और बहुजन समाज की चुनौती" पिछले कुछ दशकों से भारत में एक कथानक गढ़ा गया है कि हिंदुत्व संकट में है।...

चुनाव की आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति – The Proportional Representation Method of Election

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ विविधता अपने पूर्ण वैभव में प्रस्फुरित होती है। यहाँ असंख्य भाषाएँ, धर्म और हजारों जातियाँ एक अनुपम सांस्कृतिक...

राम की ख़ोज

भारतीय संस्कृति में दो राम: निर्गुण बनाम सगुण का दार्शनिक और सामाजिक विश्लेषण भारतीय संस्कृति में ‘राम’ के दो अलग-अलग स्वरूपों का उल्लेख मिलता है,...

राम और श्रीराम में फर्क है

राम और श्रीराम : निर्गुण बनाम सगुण का दार्शनिक और सामाजिक विश्लेषण भारतीय संस्कृति और परंपरा में ‘राम’ शब्द दो अलग-अलग संदर्भों में प्रकट होता...

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