ओपिनियन: मॉब लिंचिंग और कानून हाथ में लेना सभ्यता के विकास पर प्रश्न चिन्ह

महिला गरिमा पर आघात की घटना किसी भी समाज की औसत सोच के लिए चुनौती है. इस घटना पर मात्र पुलिस कार्यवाही से समाज को संतुष्ट नहीं होना चाहिए. समाज को आत्मावलोकन करना होगा, कारण और समाधान तय करने होंगे. समाधान को लागू करने में स्कूलों, ग्राम पंचायतों, धार्मिक केन्द्रों और एमप्लॉयर्स की भूमिका तय करनी होगी.

जिस समाज में अधिकतर लोगों को फेवरेबल डिस्क्रिमिनेशन में आनन्द आता हो वहां लिंगभेद, महिला उत्पीड़न, जाति उत्पीड़न, क्षेत्रवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता को खत्म करने के लिए और मानवीयता का प्रशिक्षण देने के लिए स्कूलों, ग्राम पंचायतों, धार्मिक केंद्रों और एम्पलॉयर्स को शामिल करना और बाध्य करना होगा कि वे अपने केंद्रों में अनिवार्य रुप से अपने समर्थकों/संपर्क में रहने वालों को लगातार प्रति सप्ताह विशेष आयोजन कर यूनिवर्सल मानवाधिकार घोषणापत्र, संवैधानिक मूल अधिकार, कर्तव्य, महिला उत्पीड़न, जाति उत्पीड़न, मॉब लिंचिंग, ऑनर किलिंग के खिलाफ जागरूकता, कानूनी सजा, केस स्टडीज के साथ अपने यहां आवागमन करने वालों को साप्ताहिक या मासिक प्रशिक्षण शिविर लगाकर बतायें.

हमारे बीट आरक्षी भी ऐसे कार्य ग्राम शान्ति समितियों के माध्यम से करा सकते हैं. इस प्रशिक्षण से यह लाभ होगा कि अगर कोई कानून हाथ में लेगा तो उसके हाथ रोकने वाले उसके आसपास भी होंगे जो मानवीय जिम्मेदारी को निभाएंगे और समाज और क्षेत्र को शर्मसार होने से बचायेंगे.

सम्राट अशोक के धम्ममहामात्र जो नैतिक शिक्षा के लिए उत्तरदाई थे का औचित्य ऐसे में सिद्ध होता है. मेरे द्वारा अपने क्षेत्राधिकारी खेरागढ़ कार्य काल के दौरान दहेज हत्या रोकने के लिए ग्राम प्रधानों, लेखपाल, बीट आरक्षित का सहयोग लिया गया जिससे दहेज हत्या में भारी कमी आई थी. इस प्रयोग की सफलता को तत्कालीन एस एस पी श्री राजीव कृष्ण ने सभी क्षेत्रों में लागू करवाया और आगरा जनपद की दहेज हत्याओं में भारी कमी दिखी.

(लेखक: डॉ बी पी अशोक आई पी एस, पी-एच.डी, डी.लिट. यह लेखक के अपने विचार हैं)

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