कांशीराम का किस्सा #04: जो लोग अपने आप को ‘चूहड़ा’ या ‘चमार’ कहलवाने में बेईज्ज़ती महसूस करते हैं, हो सकता है वे खुद को रविदास, कबीर और या फिर आंबेडकर से भी ऊँचा समझते हों

 उपरोक्त शब्द साहेब कांशीराम ने 2001 में, गुरु नानक भवन (अमृतसर) में उस वक़्त कहे थे जब कैडर कैंप के दौरान साहेब की और से बार-बार ‘चूहड़ा’ शब्द इस्तेमाल किये जाने पर नाराज़गी जताते हुए वाल्मीकि समाज के लोगों ने एतराज़ ज़ाहिर किया था.

दरअसल, हुआ कुछ इस तरह कि कैडर कैंप में जब साहेब ने लगभग 40 बार चूहड़ा शब्द इस्तेमाल किया तो कुछ वाल्मीकि समाज के लोग नाराज़ होकर बाहर चले गए. अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए उन्होंने साहेब का विरोध करने की तैयारी कर ली.

जब साहेब ने कैडर कैंप के दौरान चाय-पानी पीने की ब्रेक दी तो एक विक्रम लंकेश नाम के कार्यकर्ता ने मंच पर बैठे साहेब के कानों में चुपके से सारा माजरा समझा दिया.

साहेब बिना चाय-पानी पिए ही मंच पर माइक लेकर उठ खड़े हुए और इस मसले पर बोलना शुरू किया, “मुझे पता लगा है कि कुछ लोगों को मेरे द्वारा ‘चमार’ या ‘चूहड़ा’ शब्द का इस्तेमाल करने पर एतराज़ है.

वह समझने में असमर्थ हैं कि बाबासाहेब ने कहा था कि जिन लोगों को अपने इतिहास के बारे में जानकारी नहीं होती वह कभी भी नया इतिहास नहीं बना सकते. यदि मैं ‘चमार’ शब्द का या ‘चूहड़ा’ शब्द का इस्तेमाल करता हूँ तो इस लिए ताकि आप अपनी पृष्ठभूमि से जुड़ सको. कई शब्द ऐसे होते हैं जिनसे इतिहास बनते हैं. यह शब्द बोलने का मेरा मतलब भी यही है कि हमें पता लग सके कि दरअसल हम थे कौन, और अब क्या हैं और आगे क्या करना है!

रही बात मेरे द्वारा ‘चमार’ और ‘चूहड़ा’ शब्द इस्तेमाल करने की, तो जो लोग ‘चमार’ या ‘चूहड़ा’ शब्द कहलवाने में अपनी बेईज्ज़ती महसूस करते हैं तो हो सकता है वह लोग अपने आप को रविदास महाराज, कबीर महाराज और या बाबासाहेब से भी ऊँचा समझते हों. क्योंकि रविदास महाराज ने अपनी बाणी में अपने आप को सरेआम ‘चमार’ कहा है और इसी तरह ही कबीर महाराज ने अपने आप को ‘जुलाहा’ कहा है और बाबासाहेब ने अपनी ‘महार’ जाति पर जमकर गर्व किया है.

अगर (आपको) अपने आप को ऊँचा दिखाने का इतना ही चाव है तो अपने भीतर कई गुणा अधिक लायकी पैदा करनी होगी. लायकी पैदा करोगे तभी समाज आपकी इज्ज़त करेगा. एक इंसान गटर में घुसकर गटर की सफाई करता है. अगर वह खुद को कहे कि मैं तो वाल्मीकि भाईचारे में से हूँ तो उसके खुद के कह देने भर से व्यवस्था तो बदलने वाली नहीं है, क्योंकि दूसरों की नज़र में तो वह इंसान ‘चूहड़ा’ ही है या फिर ‘चमार’ है.

हो सकता है दूसरे लोग आपके सामने ये सब न कहें, लेकिन पीठ पीछे तो कहते ही होंगे. आप इतने लायक बन जाओ कि आपकी हिस्सेदारी शासन-प्रशासन में हो. फिर ‘चूहड़े-चमार’ कहलवाने में भी इज्ज़त होगी.


(स्रोत: मैं कांशीराम बोल रहा हूँ का अंश; लेखक: पम्मी लालोमजारा, किताब के लिए संपर्क करें: 95011 43755)

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