बहनजी के निर्णयों से “असहमति” हो सकती है लेकिन बहनजी को नकारा नही जा सकता है

14 अप्रैल पर पूरे देश मे विशाल रूप से बाबा साहब का जन्मोत्सव मनाया गया. जबकि;

#1. आजादी के बाद कोंग्रेस ने ज़बरदस्ती शिक्षण संस्थानों में पाठ्यक्रम में उन लोगों को सम्मलित किया जो कोंग्रेस से जुड़े रहे ओर बाबा साहब की तरफ ध्यान न जाये.

#2. कोंग्रेस आजादी के 35 से 40 सालों तक इसमे सफल रही क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र के एससी संघटनो को खरीद लिया, जो केवल कोंग्रेस के तलवे चाटते थे. इससे बाबा साहब का दायरा महाराष्ट्र तक सीमित हो गया, बस जनरल नॉलेज के एक प्रश्न की “ड्राफ्टिंग कमेटी” का चेयरमैन कौन था तक सीमित हो गए.

#3. उसके बाद एक मसीहा के रूप में मान्यवर साहेब कांशीराम जी का आगमन हुआ जिन्होंने बाबा साहब को महाराष्ट्र से बाहर निकालकर उत्तर भारत के घर-घर में पहुचा दिया. जिसका प्रभाव हुआ कि एक स्वतंत्र “एससी वर्ग में राजनैतिक व सामाजिक चेतना” का विकास हुआ, वो इस स्तर तक हुआ कि इस वर्ग ने अपने महत्व, मनोबल को उच्च किया, जिसके कारण “कोंग्रेस ने 40 साल जो पाठ्यक्रम में रटवाया” वो विफल हो गया ओर देश ने बाबा साहब के सम्पूर्ण समाज व देश को दिए योगदान को जाना.

#4. लेकिन मान्यवर साहब बिना “बहन कुमारी मायवती जी” के अधूरे है. यह मान्यवर साहब इसलिए कर पाए क्योंकि उनके साथ बहनजी थी, एक महिला ओर वो भी दबंग ने एक अलग ही आकर्षण इस बहुजन आंदोलन के प्रति उतपन्न किया, गली गली, मोहल्ले में केवल मायावती जी को देखने व सुनने व फिर चौपालों और घरो में उसकी चर्चा करने का चलन हुआ, जब चौपालों ओर घरो में चर्चा हुई तब डॉक्टर अम्बेडकर को लोगो ने जाना, उनके योगदान को जाना ओर शिक्षा के महत्व को समझा, जिसके कारण वर्तमान में मूंछो को तांव देने वाले दलित तक दिख रहे है, बहनजी से पहले मूंछो पर तांव देना मतलब अपने पूरे परिवार पर आक्रमण करवाने समान था.

#5. इसलिए जो सोचते है कि मायावती राजनीतिक रूप से खत्म हो चुकी है, उन्हे समझ जाना चाहिए कि; “मायावती एक पूरे वर्ग के स्वाभिमान, मनोबल की जड़ में खड़ी है, जब तक एक पूरा समाज मनोबल युक्त रहेगा, तरक्की करता रहेगा , अपना महत्व बताता रहेगा तब तक मायावती रूपी जड़ की चर्चा होगी, और यह सामाजिक चर्चा है, डॉक्टर अम्बेडकर राजनीतिक रूप से विफल रहे क्योंकि उनके खिलाफ षड्यंत्र जारी रहे , लेकिन समाजिक रूप से बाबा साहब का रुतबा 14 अप्रैल को पता चल जाता है. उसी प्रकार सामाजिक रूप से मान्यवर व बहनजी ने अपना अलग मुकाम बाबा साहब की तरह बना लिया है जो जब तक सूरज चाँद रहेगा, तब तक याद किया जाता रहेगा”

#6. डॉक्टर अम्बेडकर की विचारधारा “असहमति” सिखाती है व व्यक्तिगत भक्ताई का विरोध करती है, व तार्किक, तथ्यात्मक योग्यता विकसित करने का आह्वान उस स्तर तक करती है जिसमे आप बाबा साहब के किसी कार्य से असहमत तक हो सकते है. इसलिए यह ठीक है कि बहनजी के निर्णयों जिसमे मुख्यतः “आकाश आनन्द व आनन्द” से हम असहमत है लेकिन इसके आधार पर; “समाज को मनोबल देने वाली जड़ निर्माता से असहमत नही हो सकते है.”

(लेखक – विकास कुमार जाटव: यह लेखक के निजी विचार हैं)

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