18.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

एन दिलबाग सिंह का कॉलम: ED CBI और बहनजी

देश के सवर्णो, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और मुस्लमानों में जो लोग भाजपा, कांग्रेस, आप, सपा, राजद या रालोद आदि के घोर समर्थक है, उनकी मायावती यानि बहनजी के बारे मे एक राय जरूर है कि वो ईडी, सीबीआई से डरकर भाजपा के कंट्रोल में है, भाजपा की बी टीम है, भाजपा की कठपुतली है, भाजपा ने खरीद लिया है, भाजपा जैसा चाहे उसको नचा सकती है, वो भाजपा की तरफ से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनेगीं, नही-नही वो तो उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार बनेंगी वगैरा वगैरा.

बिकाऊ लोग सबको बिकाऊ समझते है. भूला ना करो, वो मान्यवर साहेब की वो शिष्या है जिसको मान्यवर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उनके घर तक पहुँच गये थे क्योंकि उनको असली हीरे की पहचान थी.

कभी इन लोगों के मुँह से सुना है कि कानून-व्यवस्था के मामले में उनका पूरे देश में कोई मुकाबला नही कर पाया. कभी किसी से सुना है कि 44 साल की बेदाग राजनीति में केंद्र में मंत्रीपद के लिए नही झुकी, कभी कोई कहता है कि उन्होने तीन बार भाजपा के साथ सरकार बनाकर भी भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन कभी नही किया. बल्कि, मौका मिलते ही एक वोट से अटल बिहारी वाजपेई से प्रधानमंत्री का पद छीन लिया था. कभी किसी से सुना है कि तीन बार भाजपा के साथ मिलकर चुनावी फायदा लेने वाली ममता बैनर्जी और तीन बार बीच में ही भाजपा के सहयोग से बनी गठबंधन सरकार में विचारधारा से समझौता न करने की एवज में मुख्यमंत्री पद छोड़ने वाली बहनजी का कोई मुकाबला हो ही नही सकता. और तो छोड़िये, दलित समाज सबसे ज्यादा बंदरो की तरह उछलता है, इन लोगों की जुबान अपने-अपने राज्यों के चुनाव तक में मुँह नही खुलता. लेकिन, यूपी पर इनकी पैनी निंगाहे रहती हैं.

वो तो पहले भी ईडी, सीबीआई आदि सब भुगत चुकी है और तकरीबन मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक से क्लीन चिट मिल चुकी है. वो तो फिर भी पिछले 44 साल से बसपा की आधार स्तम्भ बनी हुई है, वरना मंत्रीपद तो आज भी उनको बड़े आराम से मिल सकता है.

आप सवाल खुद से करो ना कि तुम लोग क्यों बिके हुए हो? ईडी, सीबीआई का डर है क्या तुमको भी? तुम मत डरो ईडी, सीबीआई से, तुम लोगों की इतनी औकात भी नही है कि ईडी, सीबीआई परेशान करे. ईडी, सीबीआई तुम लोगों की समस्या नही है, इनकी सही स्पैलिंग याद कर लो वही काफी है क्योंकि इनफोर्समेंट, डायरैक्टोरेट, ब्यूरो और इंवेस्टिगेसन की स्पैलिंग तुम्हारे नामों की तरह सिम्पल नही है बहकावार्थियों.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के निजी विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...