एन दिलबाग सिंह का कॉलम: ED CBI और बहनजी

देश के सवर्णो, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और मुस्लमानों में जो लोग भाजपा, कांग्रेस, आप, सपा, राजद या रालोद आदि के घोर समर्थक है, उनकी मायावती यानि बहनजी के बारे मे एक राय जरूर है कि वो ईडी, सीबीआई से डरकर भाजपा के कंट्रोल में है, भाजपा की बी टीम है, भाजपा की कठपुतली है, भाजपा ने खरीद लिया है, भाजपा जैसा चाहे उसको नचा सकती है, वो भाजपा की तरफ से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनेगीं, नही-नही वो तो उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार बनेंगी वगैरा वगैरा.

बिकाऊ लोग सबको बिकाऊ समझते है. भूला ना करो, वो मान्यवर साहेब की वो शिष्या है जिसको मान्यवर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उनके घर तक पहुँच गये थे क्योंकि उनको असली हीरे की पहचान थी.

कभी इन लोगों के मुँह से सुना है कि कानून-व्यवस्था के मामले में उनका पूरे देश में कोई मुकाबला नही कर पाया. कभी किसी से सुना है कि 44 साल की बेदाग राजनीति में केंद्र में मंत्रीपद के लिए नही झुकी, कभी कोई कहता है कि उन्होने तीन बार भाजपा के साथ सरकार बनाकर भी भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन कभी नही किया. बल्कि, मौका मिलते ही एक वोट से अटल बिहारी वाजपेई से प्रधानमंत्री का पद छीन लिया था. कभी किसी से सुना है कि तीन बार भाजपा के साथ मिलकर चुनावी फायदा लेने वाली ममता बैनर्जी और तीन बार बीच में ही भाजपा के सहयोग से बनी गठबंधन सरकार में विचारधारा से समझौता न करने की एवज में मुख्यमंत्री पद छोड़ने वाली बहनजी का कोई मुकाबला हो ही नही सकता. और तो छोड़िये, दलित समाज सबसे ज्यादा बंदरो की तरह उछलता है, इन लोगों की जुबान अपने-अपने राज्यों के चुनाव तक में मुँह नही खुलता. लेकिन, यूपी पर इनकी पैनी निंगाहे रहती हैं.

वो तो पहले भी ईडी, सीबीआई आदि सब भुगत चुकी है और तकरीबन मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक से क्लीन चिट मिल चुकी है. वो तो फिर भी पिछले 44 साल से बसपा की आधार स्तम्भ बनी हुई है, वरना मंत्रीपद तो आज भी उनको बड़े आराम से मिल सकता है.

आप सवाल खुद से करो ना कि तुम लोग क्यों बिके हुए हो? ईडी, सीबीआई का डर है क्या तुमको भी? तुम मत डरो ईडी, सीबीआई से, तुम लोगों की इतनी औकात भी नही है कि ईडी, सीबीआई परेशान करे. ईडी, सीबीआई तुम लोगों की समस्या नही है, इनकी सही स्पैलिंग याद कर लो वही काफी है क्योंकि इनफोर्समेंट, डायरैक्टोरेट, ब्यूरो और इंवेस्टिगेसन की स्पैलिंग तुम्हारे नामों की तरह सिम्पल नही है बहकावार्थियों.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के निजी विचार हैं)

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