एन दिलबाग सिंह का कॉलम: मायावती Vs अन्य दलित मुख्यमंत्री

देश मे दो चार दलित मुख्यमंत्री हुए है जैसे बिहार में कांग्रेस ने 1968 से 1972 के बीच भोला पासवान शास्त्री जी को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया और वो भी तीन बार में कुल मिलाकर सिर्फ 11 महीने, कांग्रेस ने राजस्थान मे 1980 मे जगननाथ पहाड़िया जी को लगभग 1 साल मुख्यमंत्री बनाया, महाराष्ट्र में कांग्रेस ने सुशील कुमार शिंदे जी को 2003 में लगभग दो साल तक मुख्यमंत्री बनाया, जेडीयू ने 2014 में जीतनराम मांझी जी को लगभग 8 महीने मुख्यमंत्री बनाया और कांग्रेस ने 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी जी को 6 महीने मुख्यमंत्री बनाया था. अगर, इन सभी का समय जोड़ दिया जाये तो मुश्किल से 5 साल का समय बनता है.

दुसरी तरफ दलितों की स्वतंत्र राजनीति में बसपा ने मायावती जी का चार बार मिलाकर लगभग 7 साल का मुख्यमंत्री काल देखा है जिसमे तीन बार भाजपा के सहयोग से शासन किया था. पहली बार 1995 में 4.5 महीने, दूसरी बार 1997 में 6 महीने और तीसरी बार 2002 में लगभग सवा साल. चौथी बार 2007 में बहनजी अपने बलबुते पर मेजॉरिटी लेकर आई थी. 2007 से 2012 की मेजॉरिटी सरकार में तो उन पर कोई दबाव नही था, इसीलिए सिर्फ भाजपा के सहयोग से बनी तीन बार के दबाव वाले शासनों में जो बहनजी ने काम किये थे, उनको भोला पासवान शास्त्री, जगन्नाथ पहाड़िया, सुशील कुमार शिंदे, जीतनराम मांझी और चरणजीत सिंह चन्नी के उन कामों से तुलना कीजिये जो उन्होने अपनी ही पार्टी की सरकारों में सबसे गरीब वर्ग यानी दलित आदिवासियों के हितों के लिए किये थे.

बहनजी को विभिन्न राज्यों के दलित भी पानी पी पीकर कोसते हैं. जबकि कारण बताने की बजाय उजूल-फिजूल बातें या माया का अंधभक्त कहकर खुद को दलितों का महारक्षक और महान बुद्धिजीवियों की श्रेणी में ला खड़ा कर देते हैं.

आज फैक्ट्स पर चर्चा करते हैं कि आजादी के 75 साल बाद दलितों ने सत्ता की ताकत पाने के लिए अपनी वोटों की कुछ कीमत भी समझी है या दलाली और चुनावी शोर के चलते दिमाग ना लगाने की कसम खाई है.

आपको बता दूँ बहनजी ने अपने 4.5 महीने के पहले शासन में ही 1.5 लाख गुंड़े-मवालियों को जेल में डालकर जनता को स्पष्ट संदेश दे दिया था कि अब दलितों,  शोषितों और वंचितों पर अत्याचार करने वालों की खैर नही. महापुरुषों के नाम सामाजिक योजनाओं का शुभारंभ करके गरीब वर्गो तक सुविधा पहुँचाने, बिना गड़बड़ी के नौकरियाँ निकालना आदि धड़ल्ले से किया गया था. जातिवादी मानसिकता वाले लोगों पर नकेल कसने के लिए एट्रॉसिटी कानून की धाराओं मे बेझिझक केस करने के आदेश देना; ये सभी काम भाजपा के सहयोग से बनी सरकारों में भी शुरू कर रखा था. दंगा रहित कानून का शासन तो उनकी खासियत रही ही है.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के निजी विचार हैं)

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