एन दिलबाग सिंह का कॉलम: अपनी सोच भी बदलो

मैंने सोशल मीडिया पर अनेको पोस्टों मे लिखा हुआ पढ़ा है कि आरक्षण से दलित वर्ग का आदमी कर्मचारी/अफसर बनकर अपने समाज से ही मुँह मोड़ लेता है. लेकिन कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है, शायद सोचने की जरूरत भी कभी महसुस नही होती होगी. पहले नही सोचा तो आज से ही सोचना शुरू कर दो.

इसका सबसे पहला कारण है कि दलित समाज मे आपस मे एक दूसरे की तरक्की देखकर खुश होने या मोटिवेट होने का रिवाज बिल्कुल ही नही है और ये मैं अपने निजी अनुभव के हिसाब से भी बता रहा हूँ.

आप अपनी अंदरूनी चिढ़ में भी इस समाज के कामयाब आदमी से दूरी बना लेते हो, वो आदमी जो आपकी टांग खींचने वाली केकड़ावृति को बचपन से ही देखता आया हो, वो भला अपनी नौकरी करे या तुम्हारे को खुश करने के जतन करे. मैंने तो अपनी निजी अनुभवों से यही पाया है कि अधिकतर दलित वर्ग के कर्मचारी/अफसर आपकी चुपके-चुपके अपने सरकारी कर्मचारी/अफसर होने की सीमाओं को बिना लांघते हुए मदद करते है और अच्छी खासी करते है.

मान्यवर कांशीराम का बनाया बामसेफ जिसको लोगों में सामाजिक और राजनैतिक चेतना के लिए जिस फंड की जरूरत होती थी, उसके लिए अच्छी खासी मदद भी ये सरकारी कर्मचारी और अफसर किया करते थे. आज भी बहुत से सरकारी अफसरों व कर्मचारियों में समाज के लिए लड़ने भिड़ने का जज्बा बाकी है, इसपर बेवजह संदेह ना करे. इनको लज्जित तो करते रहे ताकि समाज की अहमियत को ये लोग भुल ही ना पाए लेकिन, इनको समाज से तोड़कर फेंकने के प्रयास से बाहर निकले.

अगर आपको फिर भी लगता है कि दलित समाज के 100 फीसदी कर्मचारी/अफसर खराब है तो यकीन कीजिये, आप लोगों से ही बना हुआ दलित समाज भी कम से कम 100 फीसदी तो जरूर खराब है, इसमे भी सुधार की अपेक्षा कीजिये. कुछ मुद्दो पर आपका गुस्सा जायज हो सकता है लेकिन, आपको इस प्रकार की जनरल स्टेटमैंट देने से बचना चाहिए. आप 100 फीसदी की बजाय अधिकतर अफसर या कर्मचारी लिख सकते हो, वो ज्यादा सही रहेगा.

आपको याद दिला दुँ, इसी समाज से बाबासाहब और कांशीराम जैसे अफसर भी हुए हैं और उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर साथ देने वाले अनेकों कर्मचारी /अफसर जो अपनी सीमाओं की बाध्यताओं के बावजूद भी मान्यवर के सामाजिक मिशन मे जुड़कर अपना सहयोग देते आये हैं और आज भी समाज के उत्थान के लिए सोचते रहते है.

आपका दलित समाज केकड़ावृति वाला समाज है, उसके कर्मचारी या अधिकारी बहुत संघर्षो और अड़चनों को पार करते हुए वहाँ तक पहुँचे है और तकरीबन अपनी गरीबी और आर्थिक हालातों से लड़कर कामयाब हुए है – आप की भी जिम्मेवारी है कि उनको खुद से जोड़े रखे, उनको अपने से दुर रखने की गैर जरूरी कोशिशे ना करें. ये लोग मनुवाद से तो लड़ते ही है, समाज की छोटी सोच से भी लड़ते हैं.

ये लोग नियम कायदों मे बंधकर ही नौकरी करते हैं, इनको किसी राजनैतिक पार्टी का प्रचारक समझने की भुल ना करे, आप लोग भी उसकी सीमाओं की कद्र करना सीखिये. ये लोग अगर रिटायरमेंट के बाद समाज से जुड़ने की कोशिश करते है तो आप लोग क्यों इनका मनोबल तोड़ने का काम करते हो. ये अगर सिर्फ पद पाने की चाहत मे आते है तो पद मत दो लेकिन इनको अपने से दुर क्यों झटकना चाहते हो. अगर सरकारी नौकरी के बाद इस समाज का आदमी खराब हो जाता है तो आप कसम खाओ कि कम से कम अपने घर के बच्चो को तो पढ़ा लिखाकर सरकारी नौकरी कोई नही करने देंगे और सरकारी बनकर खराब होने से बचा लोगे.

किसी भी समाज के कर्मचारी या अफसर रिस्क लेने की कैपेसिटी में तब होते है जब वो समाज अपना राजनैतिक वजुद बचा पाने मे सक्षम हो या सामाजिक स्तर पर संगठित हो. क्या इस समाज ने अपनी वोटों से इतना राजनैतिक वजुद बना लिया है कि कोई अपनी सीमाओं से बाहर बेझिझक आकर मदद कर पाने की सोच पाए. और अगर किसी राज्य में राजनैतिक ताकत बनकर उभरे हैं तो क्या इस समाज के कर्मचारियों व अफसरों ने मोटिवेट होकर समाज का साथ नही दिया होगा. ये तो आप लोगों के बीच का ही आदमी है, इससे इतनी ही अपेक्षा करो जितनी वो झेल पाए, वो भी कायरों और केकड़ों के बीच मे ही पला बड़ा है.

आपकी जनसंख्या के मुकाबले वो तो 1-2 फीसदी भी सरकारी नौकरियों मे नही है, 98-99 फीसदी तो आप ही हो जिसने आजादी के 70 साल बाद भी अपनी वोटों को डर मे, लालच मे, शराब की बोतल मे मे, 500-700 रूपये मे या फिर अपने किसी सवर्ण या विजातीय रसुक वाले आदमी के कहने पर ही हमेशा वोट डाले है. बार-बार आईने को धोने से क्या होना है, अपने अंदर की सोच को भी सुधार कर आईने मे अपना सुंदर चेहरा देखो भाई. सिर्फ जय भीम कहने से काम खत्म नही हो जाता बल्कि वहाँ से तो शुरू होता है.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह, यह लेखक के निजी विचार हैं)

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