सतीश चंद्र मिश्रा: बहुजन आंदोलन का एक निष्ठावान सिपाही

बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और कानूनी सलाहकार सतीश चंद्र मिश्रा पर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं। कुछ लोग उनके बीएसपी के प्रति समर्पण और ईमानदारी पर शंका करते हैं। लेकिन यह सब बेबुनियाद आरोप हैं — विरोधियों द्वारा फैलाए गए झूठ, जिनका मकसद केवल बीएसपी को कमजोर करना है। जबकि सच यह है कि सतीश मिश्रा बीएसपी के एक निष्ठावान, ईमानदार और प्रतिबद्ध सिपाही हैं।

बीएसपी 2012 से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है। इतने वर्षों में कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए — वे लोग भी जिन्हें बीएसपी ने ज़मीन से उठाकर नेता बनाया, जिन्हें समाज में पहचान और सम्मान दिलाया। मगर सतीश मिश्रा ने कभी पार्टी नहीं छोड़ी। उन्होंने हर दौर में पार्टी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहकर यह साबित किया कि उनका राजनीति में होना किसी स्वार्थ का हिस्सा नहीं, बल्कि एक विचारधारा के प्रति समर्पण है।

अगर उनका कोई निजी स्वार्थ होता तो अब तक वो किसी सत्ता दल के साथ खड़े दिखते। लेकिन उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना और बहन कुमारी मायावती जी के नेतृत्व में अडिग बने रहे।

राज्यसभा में बहुजनों की बुलंद आवाज

जब देश में किसान आंदोलन चल रहा था, तो राज्यसभा में सबसे ज़ोरदार आवाज अगर किसी ने किसानों के हक़ में उठाई, तो वो श्री सतीश मिश्रा जी थे। उन्होंने तीनों काले कानूनों का खुलकर विरोध किया और आखिरकार सरकार को एक साल बाद वो कानून वापस लेने पड़े।

वहीं जब देश के तमाम बहुजन नेता सपा, कांग्रेस और भाजपा के पिछलग्गू बने घूम रहे थे, उस समय श्री सतीश मिश्रा जी संसद के उच्च सदन में SC, ST, OBC और अल्पसंख्यकों के हक़-अधिकारों के लिए मजबूती से आवाज़ उठा रहे थे।

2022 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की। ब्राह्मण सम्मेलन कराए, जिनमें ज़बरदस्त जनसैलाब उमड़ा। लेकिन चुनावी नतीजे कुछ और रहे — यह बात अलग है, पर उनकी मेहनत में कोई कमी नहीं थी।

ब्राह्मण होकर भी बहुजन हित की आवाज़

ब्राह्मण होते हुए भी सतीश मिश्रा जी हमेशा SC-ST आरक्षण के पक्ष में मुखर रहे हैं। 21 अगस्त 2024 के भारत बंद को उन्होंने खुलकर समर्थन दिया। आज तक सपा, भाजपा, कांग्रेस या किसी भी पार्टी का कोई ब्राह्मण नेता ऐसा नहीं कर पाया है।

69 हज़ार शिक्षक भर्ती घोटाले में जब आरक्षण की अनदेखी की गई, तब सत्ता में न होते हुए भी बीएसपी ने यह मुद्दा उठाया और सतीश मिश्रा को इलाहाबाद हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई की ज़िम्मेदारी दी। उन्होंने ज़िम्मेदारी निभाई और कोर्ट ने नई सूची बनाने का आदेश दिया — यह संघर्ष बहुजन हितों की जीत थी।

सतीश मिश्रा का 2017 में संसद में दिया गया भाषण ज़रूर सुनना चाहिए। यह भाषण बहुजन इतिहास का एक दस्तावेज़ है।

मुख्य बिंदु:

  • रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या पर सवाल।
  • ऊना कांड में दलितों की पिटाई का मुद्दा।
  • सहारनपुर और शब्बीरपुर की दलित बस्तियों को जलाने की निंदा।
  • जब आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी को राज्यसभा में बोलने से रोका गया, तो सतीश मिश्रा ने पूरे सदन को आड़े हाथों लिया — बिना किसी डर के।

विरोधियों को सतीश मिश्रा से ही दिक्कत क्यों?

सपा के माता प्रसाद पांडेय, भाजपा के बृजेश पाठक, कांग्रेस और RJD के तमाम ब्राह्मण नेताओं से किसी को परेशानी नहीं। लेकिन जब एक ब्राह्मण बीएसपी में रहकर बहुजन आंदोलन के साथ मजबूती से खड़ा होता है — तो वह पूरे ‘झूठे सेक्युलर– मनुवादी तंत्र’ को चुभने लगता है। सतीश मिश्रा का बीएसपी में बने रहना, विरोधियों के लिए एक करारा तमाचा है। तमाम अफवाहों, झूठ और साजिशों के बावजूद वे आज भी बहन मायावती जी के साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं।

(लेखक: स्वतंत्र लेखनी; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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