ओपिनियन: मनुस्मृति भारत की सबसे निकृष्ट किताब

मनुस्मृति ब्राह्मण मर्दों को भूदेवता का दर्जा देती है और शूद्रों एवं महिलाओं को इंसानी दर्जा भी नहीं देती है. यह बहुसंख्यक इंसानों के प्रति निर्ममता और क्रूरता का दस्तावेज है. इसके हर पन्ने पर नफरत ही नफरत भरी है.

मनुस्मृति (Manusmriti Book) भारत की सबसे अमानवीय एवं निष्कृट किताब है, जो बहुसंख्यक शूद्रों एवं महिलाओं की गुलामी का दस्तावेज है. मनुस्मृति में बहुसंख्यक इंसानों के प्रति जितनी नफरत है शायद ही दुनिया के किसी किताब में मौजूद हो. भारत को बीमार एवं पतनशील समाज बनाने में यदि किसी एक किताब का सर्वाधिक योगदान है, तो उस किताब का नाम मनुस्मृति है.

यह किताब ब्राह्मण मर्दों को भूदेवता का दर्जा देती है और शूद्रों एवं महिलाओं को इंसानी दर्जा भी नहीं देती है. यह बहुसंख्यक इंसानों के प्रति निर्ममता और क्रूरता का दस्तावेज है. इसके हर पन्ने पर नफरत ही नफरत भरी है.

दुखद यह है कि आज के भारत के मालिक संघ-भाजपा के नायकों की यह प्रिय किताब है.

यह इतनी निकृष्ट दर्जे की किताब है कि डॉ. आबेडकर जैसे करुणाशील एवं पुस्तक प्रेमी महामानव को भी इसे जलाना पड़ा.

मेरी नजर में भारत की सबसे उत्कृष्ट और महान किताब डॉ. आंबेडकर की “जाति का विनाश है.” जिसमें उन्होंने भारत की बीमारी की मूल जड़ वर्ण-जाति व्यवस्था और उसका समर्थन करने वाले ग्रंथों, संस्थाओं और व्यक्तियों के विचारों का सुंसंगत, तार्किक एवं वैज्ञानिक आधार पर जवाब दिया है और स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर आधारित नए भारत के निर्माण का आधार तैयार किया है.

स्वतंत्रता, समता एवं बंधुता आधारित नए आधुनिक भारत के निर्माण की नींव डालने वाली किताब जाति का विनाश है.

पढ़ना दोनों को चाहिए. मनुस्मृति को इसलिए कि आज जिसे हिंदू संस्कृति कहते हैं और उसके आदर्श ग्रंथों में एक कितना मनुष्य विरोधी है.

जाति का विनाश इसलिए जिससे यह पता चल सके कि वर्ण-जाति व्यवस्था ने किस कदर भारतीयों को बीमार बना दिया है और इस बीमारी का क्या इलाज है? और कैसे इस बीमारी (वर्ण-जाति) से मुक्त होकर समता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारित भारत का निर्माण किया जा सकता है.

(स्रोत: सिद्धार्थ रामू जी की फेसबुक पोस्ट; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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