‘सामाजिक परिवर्तन’ से ही होगा भारत राष्ट्रनिर्माण

न्याय को कई तरह से विभक्त करके देखा जा सकता है जैसे कि सामाजिक न्याय, राजनैतिक न्याय, आर्थिक न्याय, सांस्कृतिक न्याय, शैक्षणिक न्याय आदि। न्याय, कोई भी हो, वह तात्कालिक व्यवस्था के अधीन होती है। यदि व्यवस्था ही गैर-बराबरी की है तो इस व्यवस्था में बराबरी के सिद्धांत के तहत न्याय कैसे संभव है? यदि व्यवस्था ही जातिवादी है तो जीवन के हर क्षेत्र के हर पायदान पर जातिवाद आधारित अत्याचार, अनाचार, शोषण से कब तक बचा जा सकता है? जातिवादी व्यवस्था में जाति को किनारे करके न्याय कैसे मिल सकता है? विषमतावादी समाज में समता आधारित स्वतंत्रता, बंधुत्व जैसे मानवीय आदर्शों, मूल्यों एवं सिद्धांतों की कल्पना कैसे ही जा सकती है? स्पष्ट है कि जातिवादी व्यवस्था में न्याय भी जातिवादी होगा। इसलिए हर दृष्टिकोण से शोध करने के बाद ही बहनजी ने जाति को लिखा है कि – 

भारत में तो जात-पात एक विकट और विकराल समस्या है और मनुवाद आधारित यह जाति-व्यवस्था तमाम बुराइयों की जननी है, जड़ है। अर्थात यह जाट-पात न केवल घातक बल्कि राष्ट्रद्रोही तत्व है, क्योंकि ये हमारे सामाजिक जीवन की समरसता और ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देती है।[1]

जाति किस तरह अमानवीय एवं राष्ट्रद्रोही है, को बयान करते हुए आगे बहनजी लिखतीं है कि –

‘ये जात-पात इसलिए भी राष्ट्रद्रोही है, क्योंकि ये एक जाति के लोगों में दूसरे जाति के लोगों के प्रति नफ़रत, भेद और ईर्ष्या पैदा करता है। कम-से-कम आज़ादी के 60वें साल में तो हमें इस सच्चाई को अपने दिलों-दिमाग में बैठा लेनी चाहिये। यही सब कारण है कि हम लोग बहुजन समाज पार्टी के बैनर तले जात-पात का बीजनाश कर एक जाति-विहीन भारतीय समाज व्यवस्था बनाने के ले प्रयासरत और संघर्षरत हैं।’[2]

इसलिए यदि स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व आधारित न्याय चाहिए, शासन-प्रशासन चाहिए, व्यवस्था चाहिए तो स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व आधारित व्यवस्था को स्थापित करना होगा। स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व आधारितव्यवस्था को स्थापित करने हेतु मौजूदा मनुवादी व्यवस्था को ध्वस्त करना होगा। समतावादी व्यवस्था स्थापित करना होगा। तभी पूरे देश के सभी नागरिकों की स्वतंत्रता को कायम रखा जा सकता है। व्यक्ति-व्यक्ति के बीच बंधुत्व को स्थापित किया जा सकता है। हर किसी के साथ समतावादी न्याय किया जा सकता है क्योंकि न्याय व्यवस्था के अधीन है। जब व्यवस्था समतावादी होगी तो न्याय खुद-ब-खुद समतावादी होगा।

फिलहाल आज सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के दौर में जहां पूरे देश की राजनीति को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ करके मनुवादी शक्तियां सत्ता की चाबी अपने हाथ में लेना चाहती हैं तो वही देश की पचासी फ़ीसदी आबादी वाले बहुजन समाज को उनके मूल मुद्दे ‘सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति’ से भटकाकर उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ तक सीमित करने की जद्दोजहद कर रही हैं ताकि इस देश में मनुवादी व्यवस्था को कायम रखा जा सके। यदि कुछ समय के लिए मनुवादियों के सामाजिक न्याय को स्वीकार भी कर लिया जाय तो भी इस बात की कोई गारेंटी नहीं है कि सामाजिक न्याय के तहत शोषित समाज को न्याय मिलता ही रहेगा।

इन सब को ध्यान में रखते हुए ‘सामाजिक न्याय’ के बजाय ‘सामाजिक परिवर्तन’ के महत्व और इन दोनों के व्यवहारिक अंतर को रेखांकित करते हुए मान्यवर साहेब कहते हैं कि –

‘हम ‘सामाजिक न्याय’ नहीं चाहते हैं। हम ‘सामाजिक परिवर्तन’ चाहते हैं। सामाजिक न्याय सत्ता में मौजूद व्यक्ति पर निर्भर करता है। मान लीजिए, एक समय में कोई अच्छा नेता सत्ता में आता हैं और लोग सामाजिक न्याय प्राप्त करते हैं और खुश होते हैं लेकिन जब एक बुरा नेता सत्ता में आता है तो वह फिर से अन्य में बदल जाता है। इसलिए हम संपूर्ण सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं।’[3]

फिलहाल सामाजिक न्याय के नाम पर रचे गए इस षड्यंत्र में शामिल कांग्रेस, भाजपा, सपा, राजद, टीएमसी, आप, जदयू आदि भारत में ‘सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति’ के आन्दोलन की वाहक बसपा के खिलाफ दुष्प्रचार करते हुए बहुजन समाज को गुमराह करना है ताकि देश में जातिवादी व्यवस्था को यथास्थित रखा जा सके। इस षड्यंत्र में मनुवादी दलों के साथ-साथ बहुजन समाज की तमाम पिछड़ी जातियों के स्वार्थी नेता, उनकी परिवारवादी पार्टियाँ व उनके मुखिया इन मनुवादी दलों के हाथ की कठपुतली बनकर बहुजन समाज को उनके सकारात्मकमूल मुद्दे से भटकाकर पूरे देश में ‘सामाजिक न्याय’ की रट लगाकर बहुजन समाज को उनके दुश्मनों के हाथ में बेचने का कार्य किया है। आज बहुजन समाज की आम जनता ही नहीं बल्कि तमाम तथाकथित पढ़े-लिखे व बुद्धिजीवी लोग भी मनुवादी दलों व उनके सहयोगी पिछड़ी जातियों के कुछ नेताओं की चंगुल में फंस करके ‘सामाजिक न्याय’ की रट लग रहे हैं। इन सब के बीच सबसे दुखद पहलू यह है कि इन तथाकथित पढ़े-लिखे बहुजन समाज के लोगों को भी ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ के बीच भेद करने की समझ आज भी नहीं आ पाई है। बहुजन समाज को भटकाव से बचाकर बाबासाहेब के मिशन पर केन्द्रित करने हेतु मनुवादियों एवं चमचे के चरित्र को बेनकाब करते हुए बहन जी लिखती है कि –

‘सारे देसी-विदेशी बुद्धिजीवी वर्ग अभी तक हमारे फिलासफी को बारीकी से समझ और परख नहीं पाए हैं। उनके लिए सामाजिक न्याय ही सब कुछ है जबकि मेरी नजर में यह मात्र एक छलावा है – बहुजन समाज को हजारों वर्ष की तरह आज भी गुमराह बनाए रखने का एक मनोवैज्ञानिक हथियार। मैं और मेरी पार्टी तथाकथित ‘सामाजिक न्याय’ पर कतई भरोसा नहीं करते, विश्वास नहीं रखते। लोग ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ में भेद नहीं कर पाए हैं। या फिर ये कहें कि इस गहरे भेद को जनता के सामने, समाज के समक्ष लाना ही नहीं चाहते, क्योंकि इसके बड़े दूरगामी परिणाम निकलेंगे।’[4]

फिलहाल, बहुजन आंदोलन से जुड़े लोगों को इस बारे में शुरुआत से ही अच्छी जानकारी है। और, बहुजन समाज पार्टी के लोग, इसके कार्यकर्ता व समर्थक पूरे देश में यथासंभव प्रयास करते हुए जन-जन के बीच जाकर देश में ‘सामाजिक परिवर्तन’ की क्रांति हेतु सतत संघर्ष कर रहे हैं। इन सब के बीच बहनजी बहुजन आंदोलन के मूल मुद्दों को ध्यान में रखते हुए बहुजन समाज के लिए ‘ब्लू बुक’ में बड़े स्पष्ट तौर पर ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। बहनजी लिखतीं हैं कि –

‘सामाजिक न्याय’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ को एक वाक्य में अगर हम परिभाषित करें तो कहा जा सकता है कि मैला सर पर धोने के बजाय गाड़ी पर ढुलवाया जाये, यह ‘सामाजिक न्याय’ है जबकि हमारा कहना है कि मैला हमारे समाज का व्यक्ति या कोई खास जाति या समुदाय के लोग ही क्यों ढूंढेंगे? केवल वे ही इस गंदे काम को क्यों करें, अन्य लोग क्यों नहीं? केवल एक ही विशेष जाति के लोगों को यह काम नहीं करना चाहिए। यह ‘सामाजिक परिवर्तन’ का द्योतक है। मेरा ख्याल है कि एक साफ सुधरी मानसिकता वाले व्यक्ति को इस उदाहरण से समझ जाना चाहिए कि ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सामाजिक परिवर्तन’ में क्या मूल अंतर है।’[5]

सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन के बीच के महत्वपूर्ण अन्तर को रेखांकित करते हुए आगे बहनजी लिखतीं हैं कि –

एक और प्रमुख अंतर यह है कि ‘सामाजिक न्याय’ का अर्थ है हजारों-हजार साल से चली जा रही सामाजिक ना-इंसाफी और अमानवीय व्यवस्था जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘मनुवादी व्यवस्था’ कहा जाता है, को आज के आधुनिक युग में भी कायम रखना है जबकि ‘सामाजिक परिवर्तन’ का साफ और सीधा अर्थ यह है कि इस गैर-इंसानी, शोषणकारी, ‘मनुवादी व्यवस्था’ को बदलकर इंसाफ पर आधारित और व्यक्ति-और-व्यक्ति के बीच भेद न करने वाली ‘मानवतावादी-शासन व सामाजिक-व्यवस्था’ स्थापित करना।[6]

भारत राष्ट्रनिर्माण हेतु जरूरी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही बसपा ने अपना लक्ष्य, अपना एजेंडा, अपना मैनुफेस्टों ही भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति रखा है। बाबासाहेब साहेब के भारत में जिस तरह से मान्यवर साहेब, बहनजी और बसपा ने भारत की राजनीति में ही नहीं बल्कि भारत की सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक संरचना और आम लोगों में मानवीय हको को लेकर चेतनात्मक समझ पैदा किया है उसके मद्देनजर ही सभी निष्पक्ष एवं मानवीय विद्वानों, चिंतकों, विश्लेषकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मान्यवर साहेब, बहनजी एवं बसपा को क्रमशः  सामाजिक परिवर्तन के महानायक, सामाजिक परिवर्तन की महानायिका एवं सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति के आन्दोलन के नाम से रेखांकित किया है।

भारत राष्ट्रनिर्माण के मद्देनजर कम से कम अब बहुजन समाज को समझ जाना चाहिए कि उनकी भलाई किसमें है? सामाजिक न्याय को अपना मुद्दा बनाने से बचाना चाहिए। सामाजिक न्याय वालों को गले लगाना, वोट करना, और सत्तासीन करना मतलब कि देश में मनुवादी व्यवस्था को कायम रखना है। सामाजिक न्याय में उलझाने वाले सभी लोग मन, विचार और चरित्र से मनुवादी है। इसलिए ये मनुवाद को किसी भी कीमत पर बनाये रखना चाहते हैं। सामाजिक परिवर्तन के आन्दोलन को रोकना चाहते हैं। ऐसे में बहुजन समाज के लोगों को सामाजिक न्याय’ वाले नेताओं और दलों से सतर्क रहना चाहिए, दूर रहना चाहिए। और, अपने सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को सतत मजबूत करते रहना चाहिए। सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति के आंदोलन की वाहक बहुजन समाज पार्टी और इसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी के साथ पूरे विश्वास के साथ अडिगता पूर्वक खड़े रहना चाहिए क्योंकि भारत में ‘सामाजिक परिवर्तन’ करके ही भारत राष्ट्र निर्माण किया जा सकता है।

स्रोत :

[1] बहनजी, मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेन्ट का सफरनामा,‌भाग-2, पेज नंबर- XXIV

[2] बहनजी, मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेन्ट का सफरनामा,‌भाग-2, पेज नंबर- XXIV

[3] रजनीकान्त इन्द्रा, A-LEF Series-3, राष्ट्रनिर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-2, पेज नंबर-226

[4] बहनजी, मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेन्ट का सफरनामा,‌भाग-2, पेज नंबर- XXI

[5] बहनजी, मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेन्ट का सफरनामा,‌भाग-2, पेज नंबर- XXII

[6] बहनजी, मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेन्ट का सफरनामा,‌भाग-2, पेज नंबर- XXII


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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