एन दिलबाग सिंह का कॉलम: मजबूत राजनीति मतलब सरकार में तवज्जो

जिस समाज या जाति की मजबूत राजनीति होती हैं, उसकी बातो को सरकार तव्वजो देती हैं. महाराष्ट्र में मराठा रिजर्वेशन के लिए मराठा लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, इसके चलते पुलिस के साथ झड़पे हुई और बहुत से मराठाओं पर केस भी हुए हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने 3 सीनियर पुलिस अफसरों को सस्पैंड करते हुए मराठा आरक्षण लागू करने का वायदा किया हैं और साथ में ही सभी प्रदर्शनकारीयों के केस वापस लेने को कहा हैं.

आरक्षण प्रतिनिधित्व का मामला हैं, अगर किसी वर्ग को प्रतिनिधित्व नही मिल रहा और वो सामाजिक, शैक्षणिक रूप से कमजोर हैं, तो संविधान में आरक्षण देने का प्रोविजन हैं. हालाँकि मेरा मानना है कि हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल और महाराष्ट्र में मराठों का प्रतिनिधित्व उनकी संख्या के अनुपात से कम तो किसी भी हालत में नही होगा.

अब बात करते हैं, प्रदर्शनकारीयों के सरकार द्वारा केस वापस लाने की, महाराष्ट्र के मराठाओं, गुजरात के पटेलों और हरियाणा के जाट प्रदर्शनकारीयों के केस वापस लेना कोई बड़ी बात नही हैं. इन कम्यूनिटीयों का मजबूत राजनैतिक वजूद है.  सरकार को हिलाने की ताकत रखते हैं. लेकिन, जब एससी-एसटी एट्रॉसिटी कानून को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कमजोर करने के विरोध में 2 अप्रैल 2018  में दलित आदिवासी प्रदर्शनकारियों पर देश भर के कई राज्यों मे हजारों केस लगे, तब तकरीबन सरकार चुप्पी साधे बैठ जाती हैं.

सबसे ज्यादा केस यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगे बताये जाते हैं, लेकिन, दलित आदिवासियों की तत्कालीन सरकारों ने केस वापस नही लिये. उसके बाद दिसम्बर 2018 में राजस्थान और मध्यप्रदेश में सरकार बदलकर कांग्रेस सरकार सत्ता में आई लेकिन, उन्होने भी केस वापस नही लिये. बहनजी राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकारों को बाहर से समर्थन दे रही थी. लेकिन, बार-बार कहने पर भी केस वापस नही लिये. ज्यादा दबाव बनाने की कोशिश की तो राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बसपा के सभी 6 विधायकों को लालच देकर कांग्रेस में विलय करवा लिया लेकिन, केस वापस नही लिये. इसी प्रकार मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार भी आश्वासन देती रही लेकिन, केस वापस नही लिये और उनकी सरकार भी बीच में ही गिर गई.

दलित आदिवासी प्रदर्शनकारियों पर केस लगने पर सभी सरकारों के फैसले ना लेने की नीयत साफ-साफ दिखती हैं, लेकिन दलित आदिवासी फिर भी अपनी सरकार और अपना राजनैतिक वजूद बनाने की कम ही सोच पाते हैं.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; यह लेखक के अपने विचार हैं)

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