एन दिलबाग सिंह का कॉलम: मैं भी अम्बेड़करवाद का हत्यारा हूँ

लोगों में अम्बेड़करवाद की कितनी समझ है, ये भी बहुत बड़ी पहेली है. विरोध के नाम पर ब्राह्मण का विरोध कर देना और अपनी जाति समुह मे जय भीम और दूसरे जाति समुहों में राम-राम बोल देना – ये बिल्कुल भी अम्बेड़करवाद नही है.

सीधी और सरल भाषा में अगर कहा जाये तो अम्बेड़करवाद का मतलब सिर्फ “जय भीम” कहना मात्र नही है, इसका मतलब तार्किक बनना है, आत्म सम्मानी बनना है, शोषण के खिलाफ़ खड़े हो जाना है, साइंटिफिक दृष्टिकोण को अपनाते हुए कुरीतियों और पाखण्ड़ों को पूरी तरह से नकार देना हैं. ये लम्बी यात्रा है, लोगों को “राम-राम” से “जय भीम” तक आने में लगभग एक सदी का समय लगा है. इनको जातिवादी और कुंठित मानसिकता के कुछ लोग “भीमटे” भी कहते हैं, उनसे मेरा विनम्र निवेदन है कि वो बाबासाहेब अम्बेड़कर के विचारों को अपनी जातिय कुंठा से बाहर निकलकर समझने का प्रयास करें, उनके लिए भी बेहतर होगा.

सदियों से हिंदू धर्म की जातिवादी व्यवस्था के नीचले पायदान पर बेवजह अमानवीय पीड़ा सहता हुआ दलित व आदिवासी समाज आज भी ब्राह्मणवाद पर लगभग पूरी तरह से निर्भर है. आज तक भी अपने खुद के ही बच्चों के नाम तक रखने के लायक खुद को नही समझते हो, अपनी मेहनत की कमाई से बने घरों में गृह प्रवेश के लिए खुद से मुहूर्त तक नही निकाल सकते हो, अपने बच्चों की शादी की तारीख तक तय खुद नही कर पा रहे हो और मानसिक गुलामी छोड़े बिना तुम बातें करते हो सामाजिक और राजनीतिक क्रांति की. ये कैसे हो सकता है दोस्तों? धार्मिक धारणाओं में बंधकर आप अतार्किक धार्मिक धारणाओं का विरोध कैसे कर पाओगे और जब तक आप अपनी मानसिक गुलामी से लव यू-लव यू करते रहोगे तब तक उन पर सवाल भी कैसे कर पाओगें?

आपको ये समझना ही होगा कि हमारा दुश्मन ब्राह्मण नही है, बल्कि वो व्यवस्था है जिसको ब्राह्मणवाद कहते हैं, जिस व्यवस्था के तुम पूरी तरह से मानसिक गुलाम हो चुके हो जिस व्यवस्था पर तुम आस्था के परदे लगा कर परम्परा बना चुके हो. आप नजर उठाकर देखिये, उस व्यवस्था का तो ब्राह्मण भी गुलाम है, बनिया भी गुलाम है और ठाकुर भी गुलाम है लेकिन वो इस व्यवस्था मे जातिवाद और छुआछात में शोषक बना रहा है. इसिलिये उसको ब्राह्मणवाद से दिक्कत नही है. ठीक उसी प्रकार पिछड़े वर्ग को भी ब्राह्मणवाद से ज्यादा दिक्कत नही रही, इसलिये वो कभी पक्ष मे बोलता है, तो कभी इसके विरोध में बोलता है.

क्या सवर्ण समाज ने सती प्रथा, लड़कियों को लड़कों के बराबर ना मानना, पुरूषों में बहुविवाह, लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने की ब्राह्मणवाद द्वारा पोषित सोच को नही झेला है. लेकिन, वो जातियों में ऊँच-नीच में खुद को ऊँचा मानकर ये पितृसत्तात्मक समाज इस बटवारे को भी खुशी-खुशी पचा गए, भले ही उनके परिवारों की औरतें/लड़कियाँ भी इस ब्राह्मणवाद के कारण सदियों तक जानवरों वाला गुलामों वाला जीवन जीती रही हो. पत्थर की मूर्ती को माँ कहकर पूजने से औरतों को सम्मान मिल जाता तो बात ही क्या थी.

दलित, आदिवासी और पिछड़ों को आरक्षण से दिक्कत नही है, ठीक वैसे ही कुछ वर्गों को ब्राह्मणवाद से दिक्कत नही है. ये जरूरी नही कि हर सवर्ण वर्ग का व्यक्ति ब्राह्मणवाद को मानता भी हो, अगर मानता रहता तो समाज में सुधार कैसे होता? आप खुद को पहले समझिये, अपनी मानसिक गुलामी वाली सोच को समझिये, अपने बच्चों का नाम तय करना सीखिये, अपने गृह प्रवेश के मुहूर्त, शादी की तारीख आदि तय करना सीखिये. यकीन करना सीखिये कि सभी दिन अच्छे हैं, मंगल, शनिवार के चक्कर से बाहर आ सकते हो. आप को यकीन करना ही होगा कि आप बिना पाखण्ड़ों के भी अच्छे फैंसले ले सकते हो. जिस दिन तार्किक विरोध करना और लोकतंत्र में अपनी वोट की कीमत को समझ जाओंगे, फिर समझ लेना कि तुम अम्बेड़करवादी होना सीख रहे हो.

वोट से सत्ता मिलती है और सत्ता से ताकत, बिना राजनीतिक ताकत के इतिहास में कभी किसी ने किसी को सम्मान नही दिया है. याद रखिये कि ताकतवर लोगों का ही इतिहास लिखा जाता है, गुलाम केकड़ों का नही. हर वक्त आपके लिए कोई फुले, पेरियार, अम्बेड़कर या काशीराम आने वाला नही है, आपको उनके विचारों को समझकर अपने अंदर ही फुले, पेरियार, अम्बेड़कर और काशीराम के सामाजिक और राजनैतिक विचारों को सशक्त बनाना होगा.

मैं इसी विचारधारा को अम्बेड़करवादी विचारधारा मानता हूँ और ये भी मानता हूँ कि हम सब मिलकर भी इस विचारधारा के सामाजिक और राजनैतिक रूप को बर्बाद करने के जिम्मेदार हैं, हत्यारें हैं हम इस विचारधारा के. सिर्फ जय भीम बोल देने से कोई अम्बेड़करवादी नही हो जाता, कोई नाम में अम्बेड़कर लगाने से भी अम्बेड़करवादी नही हो जाता. पहले तार्किक बनकर सोचना शुरू कर दीजिये, फिर समाज के विषय में भी सोचना समझना शुरू कीजिये, अम्बेड़करवादी विचार खुद ही बनने शुरू हो जायेंगे.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह; ये लेखक के अपने विचार हैं)

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