10.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

पड़ताल: ‘बसपा’ के खिलाफ ही दुष्प्रचार क्यों?

भारत में भाजपा, आप, कांग्रेस, सपा, राजद, अकाली दल, शिवसेना आदि तमाम राजनीतिक दल सक्रिय हैं। इतने सारे राजनीतिक दल होने के बावजूद ये सभी मिलकर बसपा के खिलाफ ही दुष्प्रचार क्यों करते हैं?

भारत में तमाम राजनीतिक दल सक्रिय हैं। कुछ मजबूती से सत्ता में तो कुछ विपक्ष में क़ायम हैं। सबके अपने-अपने मुद्दे और निहित उद्देश्य हैं जिसमें ज्यादातर तो एक परिवार की मिल्कियत बनकर रह गई है, जैसे – कांग्रेस, सपा, राजद, अकाली दल, शिवसेना आदि। भारत में इतने सारे राजनीतिक दल होने के बावजूद ये सभी मिलकर बसपा के खिलाफ ही दुष्प्रचार क्यों करते हैं? क्यों, इन तमाम दलों से लेकर तमाम सामाजिक संगठनों एवं मीडिया (मनु व बहुजन मीडिया) तक बसपा के खिलाफ नकारात्मक नैरेटिव चलाकर बसपा के खिलाफ सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचार करके देश की भोली-भाली जनता को गुमराह करते हैं? देश में इतने बड़े पैमाने पर सभी दल, संगठन व मीडिया मिलकर बसपा के खिलाफ ही दुष्प्रचार क्यों करते हैं? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है जो जनता को खुद से करना ही चाहिए। फिलहाल, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खिलाफ दुष्प्रचार के कई संभावित कारण हो सकते हैं, जो राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया से जुड़े हैं।

सबसे पहले, बसपा प्रथमत: समानतामूलक समाज सृजन हेतु संघर्षरत आन्दोलन है, राजनीतिक दल बाद में। बसपा एक ऐसी पार्टी है जो मुख्य रूप से दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों संग अकिलियतों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है। यह जाति-आधारित (मनुवादी) राजनीति करने वाले प्रभावशाली समूहों और पार्टियों के लिए चुनौती है, जो अपनी सत्ता और प्रभाव को बनाए रखना चाहते हैं। इस वजह से, विरोधी दल और उनके समर्थक बसपा को कमजोर करने के लिए नकारात्मक प्रचार का सहारा लेते हैं।

दूसरा, भारतीय मीडिया में ऊँची जातियों का वर्चस्व और उनकी जातिवादी मानसिकता, मीडिया द्वारा बसपा के खिलाफ दुष्प्रचार के महत्वपूर्ण कारण हैं। अगर मीडिया के कथानक (Narrative) को कुछ खास समूह (सवर्ण जातियां) नियंत्रित करते हैं, तो बसपा जैसे दल जो इस ढांचे (मनुवादी) को चुनौती देते हैं, उनके खिलाफ पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग लाज़मी है।

उदाहरण के लिए, मायावती के शासनकाल में भ्रष्टाचार के मिथ्या आरोपों को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, जबकि उनके जनहितकारी कार्यों को कमतर दिखाया जाता है या फिर मीडिया से ग़ायब ही कर दिया जाता है। मीडिया के इस रवैए को मान्यवर कांशीराम साहेब ‘ब्लैक आउट’ कहते थे। यही कारण है कि तथाकथित मुख्यधारा मीडिया तंत्र बसपा के सदैव खिलाफ रहती है, ‘ब्लैक आउट एवं ब्लैक मेल’ करती है। इनके इसी चाल-चरित्र के कारण मान्यवर साहेब ने ‘मनी-मीडिया-माफिया’ को देश, लोकतंत्र और शोषित समाज का शत्रु कहते हैं।

साथ ही, खुद को बहुजन मीडिया कहने वाले लोग भी संसाधन विहीन हैं। उनमें अधिकांश पत्रकार पूरी तरह से हारे हुए और निराश हैं जो मोबाइल और माइक को जिविका का साधन मात्र मानते हैं। यही वज़ह है कि लोगों के बीच पहुंच बनाने, सब्सक्राइबर्स बढ़ाने, लाइक-शेयर- कमेंट के लिए शुरुआत में बसपा, बहनजी पर न्यूज़ चलाते हैं और जब बहुजन समाज में इनकी पहचान बन जाती है, लोगों का भरोसा बन जाता है तो ये सभी बहुजन मीडिया वाले खुद को निष्पक्ष पत्रकार बताकर बसपा विरोधी ताकतों के हाथों चंद पैसों में बिक जाते हैं। बहुजन समाज मुख्यधारा मीडिया पर तो बिल्कुल भरोसा नहीं करता है लेकिन बहुजन मीडिया के पत्रकार बहुजन समाज से ही होते हैं तो बहुजन इन पर आसानी से भरोसा कर लेता है। इसलिए ये बहुजन मीडिया वाले कांग्रेस, सपा, राजद आदि मनुवादी दलों के इशारे (पैसों) पर बहुजन समाज को बसपा के खिलाफ भड़काते हैं। यही वजह है कि बहुजन समाज के लिए बहुजन मीडिया, मुख्यधारा मीडिया से ज्यादा घातक साबित हो रहा है। इसलिए बहुजन समाज को सभी तरह की मीडिया (मनु व बहुजन मीडिया) से सावधान रहते हुए सिर्फ बहनजी, बसपा प्रेस विज्ञप्ति एवं बहनजी के ट्वीट पर ही भरोसा करें।

तीसरा, राजनीतिक रणनीति के तहत बसपा को ‘भाजपा की B-टीम’ जैसे आरोपों से बदनाम किया जा रहा है, खासकर विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस और सपा द्वारा। यह मिथ्यारोप कि BSP वोट बांटकर अप्रत्यक्ष रूप से BJP को फायदा पहुंचाती है, इसके खिलाफ एक आम कथानक गढ़कर दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है जिसे परम आदरणीया बहनजी ने सिरे से खारिज कर दिया है।

फिलहाल उत्तर प्रदेश में सपा के संदर्भ में हकीकत यही है कि यदि यादव उम्मीदवार भाजपा से खड़ा है तो उस क्षेत्र सभी यादव एकमुश्त भाजपा को वोट करते हैं। यह तथ्य है जो श्री रामचन्द्र यादव (271- रूदौली विधानसभा) की जीत को परिभाषित करती है।

अंत में, बसपा के खिलाफ दुष्प्रचार का एक कारण यह भी है कि यह पार्टी संविधान निहित ‘न्याय – समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व’ के सिद्धांतों को मजबूती से उठाती है, जो सभी मनुवादी शक्तियों के हितों के खिलाफ जाता है। जब कोई संगठन व्यवस्था को बदलने की कोशिश करता है, तो उसे बदनाम करने की कोशिश स्वाभाविक है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि दलित नेतृत्व, वो भी महिला दलित नेतृत्व, उसमें भी चमार समाज की महिला नेतृत्व, सहजता व सहर्ष किसी भी मनुवादी को स्वीकार नहीं है। इसीलिए यूपी में नारा लगता है कि ‘यूपी की मजबूरी है, बहनजी जरूरी है‘। मतलब कि दलित, दलित साहित्य, स्वतंत्र दलित राजनीति और सबसे महत्वपूर्ण बहनजी जैसा नेतृत्व जातिवादियों (मनुवादियों) को खुशी-खुशी स्वीकार्य नहीं है। यही वजह है कि भारत में तमाम राजनीतिक दल होने के बावजूद सब मिलकर सिर्फ और सिर्फ बसपा के खिलाफ दुष्प्रचार करते हैं।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


Buy Now LEF Book by Indra Saheb
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...