वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर ‘फर्जी मामलों’ की बाढ़ आ जाएगी.
लेकिन जब हम यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियमन 2026 की तुलना 2012 के विनियमनों से करते हैं, तो सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है.
रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे छात्रों की स्मृति को समर्पित, यह विश्लेषण उन 10 कारणों को रेखांकित करता है कि क्यों ये नए नियम एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के विरुद्ध हैं:
1. आईआईटी और आईआईएम का बाहर होना
सबसे बड़ी बाधा धारा 3(1)(n) में है. ये नियम आईआईटी (IITs), आईआईएम (IIMs) और अन्य प्रमुख संस्थानों पर लागू नहीं होते क्योंकि वे अपने स्वयं के अधिनियमों से संचालित होते हैं. जबकि जातिगत भेदभाव और आत्महत्याओं के सबसे गंभीर मामले इन्हीं शीर्ष संस्थानों से सामने आते हैं, यूजीसी 2026 उन्हें इस जवाबदेही से मुक्त रखता है.
2. ‘भेदभाव’ की परिभाषा का विलोपन
2012 के विनियमनों में ‘भेदभाव’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया था, जिसमें उत्पीड़न, रैगिंग और प्रतिकूल व्यवहार शामिल थे. 2026 के नियमों में इस स्पष्टता को हटा दिया गया है, जिससे अब विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों के पास यह विवेकाधीन शक्ति होगी कि वे किसे भेदभाव मानें और किसे नहीं.
3. प्रवेश प्रक्रिया में सुरक्षा का अभाव
2012 की धारा 3(2)(a) विशेष रूप से एससी/एसटी के लिए थी, जो आरक्षण नीति के उल्लंघन, प्रवेश न देना, दस्तावेजों को रोकना और अतिरिक्त धन की मांग करने जैसे भेदभावों पर रोक लगाती थी. नए नियमों में इन विशिष्ट सुरक्षा कवच को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है.
4. कक्षा में होने वाले अपमान पर चुप्पी
पुराने नियमों की धारा 3(2)(b) में कक्षा में जाति के नाम पुकारने, छात्रों को ‘आरक्षित श्रेणी’ के रूप में लेबल करने, जातिगत टिप्पणी करने या प्रयोगशाला और खेल सुविधाओं में भेदभाव करने पर कड़ा प्रतिबंध था. नए नियमों से “उत्पीड़न” और “प्रतिकूल व्यवहार” जैसे शब्द ही गायब हैं.
5. मूल्यांकन और अंकों में भेदभाव
2012 के नियमों की धारा 3(2)(c) उत्तर पुस्तिकाओं के गलत मूल्यांकन और आरक्षित वर्ग के छात्रों के परिणाम घोषित करने में देरी जैसे भेदभाव को रोकती थी. यह धारा जातिवादी मानसिकता वाले प्रोफेसरों के लिए एक डर का काम करती थी, जिसे अब हटा दिया गया है.
6. फेलोशिप में पक्षपात
पीएचडी छात्रों को फेलोशिप के स्तर पर सबसे अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है. 2012 की धारा 3(2)(d) इस भेदभाव को रोकती थी, जिसे अब हटाकर शोधार्थियों को असुरक्षित छोड़ दिया गया है.
7. हॉस्टल और सामाजिक अलगाव
हॉस्टल में अलगाव, कैंटीन और खेल के मैदानों जैसे साझा संसाधनों के उपयोग में भेदभाव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से बाहर रखे जाने जैसे मुद्दों पर 2012 की धारा 3(2)(e) बहुत सख्त थी. अब इसे बहुत कमजोर कर दिया गया है.
8. सामाजिक बनाम आर्थिक विकलांगता का भ्रम
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने आदित्य नारायण पांडे बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया था कि एससी/एसटी/ओबीसी की सामाजिक अक्षमताएं, ईडब्ल्यूएस (EWS) की आर्थिक वंचना से भिन्न और स्थाई हैं. नए नियमों में ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगों और सामान्य वर्ग की महिलाओं को एक ही ‘इक्विटी सेल’ में शामिल कर दिया गया है. यह न केवल एससी/एसटी के प्रतिनिधित्व को कम करेगा, बल्कि सामान्य वर्ग की महिलाओं या ईडब्ल्यूएस श्रेणी के माध्यम से एससी/एसटी/ओबीसी छात्रों के खिलाफ फर्जी मामले दर्ज करने का एक उपकरण भी बन सकता है.
9. संपर्क अधिकारियों (Liaison Officers) की अनुपस्थिति
डीओपीटी (DoPT) के दिशा-निर्देशों के अनुसार एससी, एसटी और ओबीसी के लिए अलग-अलग संपर्क अधिकारी अनिवार्य हैं। 2026 के नियमों में संयुक्त सचिव स्तर के इन अधिकारियों को ‘इक्विटी सेल’ का हिस्सा बनाने का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है.
10. साझा ‘इक्विटी सेल’ का नुकसान
एक साझा सेल एससी-एसटी के प्रतिनिधित्व के लिए हानिकारक है. कर्नाटक के उदाहरण की तरह, जहाँ अल्पसंख्यकों को एक समूह में शामिल किया गया, यह उन समुदायों की विशिष्ट समस्याओं की अनदेखी करता है जिनके पास साक्ष्यों (थोरट समिति, सेंथिल कुमार समिति आदि) के आधार पर भेदभाव के ठोस प्रमाण हैं. एक साझा सेल तभी प्रभावी हो सकता है जब उसमें एससी-एसटी-ओबीसी का प्रतिनिधित्व कम से कम 50% से 75% हो.
निष्कर्ष: यूजीसी के इन नए विनियमनों पर दोबारा विचार करना अनिवार्य है. यह समानता की ओर एक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के संवैधानिक वादे से पीछे हटना है.
(लेखक – नेथ्रपाल, आईआरएस ऑफिसर)

