बहुजन आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का मूल मन्त्र—
“समाज का कार्य समाज के धन से ही सम्पन्न होता है, व्यक्तिगत से नहीं।”
भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में कुछ वाक्य ऐसे होते हैं जो केवल शब्द नहीं रह जाते, अपितु पूरे आन्दोलन की आत्मा बन जाते हैं। “समाज का काम समाज के पैसे से ही हो सकता है, व्यक्तिगत से नहीं”—यह कथन बहुजन समाज की वह अटल नीति है, जिसने सदियों की गुलामी, शोषण और पराधीनता की जंजीरों को तोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया। यह केवल आर्थिक सूत्र नहीं, प्रत्युत एक दार्शनिक प्रतिज्ञा है—कि जब तक बहुजन अपनी आर्थिक शक्ति को स्वयं के उत्थान में नहीं लगाएगा, तब तक न उसकी राजनीतिक स्वर गूँजेगी, न सामाजिक परिवर्तन की नींव अटल होगी।
मान्यवर कांशीराम साहेब—जिन्हें बहुजन हृदय से ‘साहेब’ पुकारता है—ने इस सिद्धान्त को अपने जीवन का केन्द्र बिन्दु बनाया। उन्होंने देखा कि शासक वर्ग की राजनीति धनबल पर टिकी है, जबकि बहुजन की शक्ति संख्याबल में निहित है—किन्तु वह संख्याबल आर्थिक रूप से विखण्डित, निर्बल और परतन्त्र रहा है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सामाजिक-राजनीतिक जागरण की ज्योति प्रज्वलित की, परन्तु कांशीराम ने उस ज्योति को आर्थिक आत्मनिर्भरता का ईंधन प्रदान किया। उन्होंने ‘पे बैक टु सोसाइटी‘ (Pay Back to Society) का मन्त्र दिया—अर्थात् जो व्यक्ति समाज से शिक्षित हुआ, नियोजित हुआ, सशक्त हुआ, उसे समाज को लौटाना चाहिए। यह लौटाना व्यक्तिगत दान की संकीर्णता नहीं, अपितु सामूहिक संघर्ष का अंश है।
मान्यवर साहेब ने BAMCEF, DS-4, BRC और अन्ततः बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के माध्यम से यह व्यवस्था स्थापित की कि बहुजन समाज के प्रत्येक सक्षम सदस्य को—चाहे वह एक रुपया दे, दस रुपये दे या सौ—अपने छोटे-छोटे आर्थिक योगदान से आन्दोलन को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने बार-बार दोहराया कि यदि कोई आन्दोलन बाहरी धन, व्यक्तिगत सम्पत्ति या किसी एक व्यक्ति की कृपा पर टिका रहेगा, तो वह कभी स्वतन्त्र निर्णय नहीं ले सकेगा। समाज का कार्य तभी सार्थक होता है, जब समाज स्वयं उसका स्वामी बने—न कि कोई एक व्यक्ति, परिवार या बाहरी शक्ति।
बहनजी—जिन्हें मान्यवर साहेब ने अपने विचारों का उत्तराधिकारी बनाया—ने इसी सिद्धान्त को व्यावहारिक धरातल पर उतारा। बसपा का संगठनात्मक ढाँचा इसी आत्मनिर्भर राजनीति पर खड़ा हुआ। लाखों कार्यकर्ताओं ने न केवल मतदान किया, अपितु चन्दे, श्रम, समय और समर्पण से पार्टी को खड़ा किया। यह ‘आत्मनिर्भर राजनीति‘ का जीवन्त प्रमाण है—जहाँ बहुजन समाज ने सिद्ध किया कि हमारी मुक्ति बाहरी दया, सहानुभूति या किसी बड़े धनकुबेर की सहायता पर नहीं, अपितु अपनी सामूहिक शक्ति पर निर्भर है। बसपा ने चाहे सत्ता संभाली हो या गठबंधन किया हो, वह सदैव अपनी शर्तों पर ही हुआ है—क्योंकि उसकी जड़ें बहुजन समाज की आर्थिक और वैचारिक आत्मनिर्भरता में थीं।
आज जब हम इस मन्त्र को पुनः स्मरण करते हैं, इतिहास की तरफ रुख करते हैं तो स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत धन से चले आन्दोलन कितने भी भव्य क्यों न दिखें, वे अन्ततः व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या बाहरी प्रभावों का शिकार हो जाते हैं। किन्तु समाज के धन से चला आन्दोलन समाज की ही सम्पत्ति बन जाता है—उसमें कोई एक मालिक नहीं होता, अपितु समस्त बहुजन उसका संरक्षक, साझेदार और उत्तरदायी होता है।
बसपा का यह अटल सिद्धान्त बाबासाहेब के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ के विस्तारित रूप है। मान्यवर कांशीराम साहेब जी ने इसे आर्थिक आयाम दिया—’संगठित रहो’ का अर्थ केवल राजनीतिक एकता नहीं, अपितु आर्थिक एकजुटता भी है। जब तक बहुजन समाज अपनी कमाई का एक अंश अपने आन्दोलन में नहीं लगाएगा, तब तक वह पराधीन ही रहेगा—चाहे कितने भी विधायक-सांसद क्यों न चुन ले।
अतएव, बहुजन समाज इस मन्त्र को हृदय में अंकित करो—’समाज का काम समाज के पैसे से ही हो सकता है, व्यक्तिगत से नहीं’। यही आत्मनिर्भरता का सच्चा मार्ग है, यही बहुजन आंदोलन का अटल आधार है, और यही बाबासाहेब, मान्यवर साहेब तथा बहनजी के दिखाए उस सपने की पूर्ति का एकमात्र साधन है—जहाँ बहुजन न केवल मतदाता बने, अपितु सत्ता का सच्चा साझीदार व स्वामी बने।


