भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक सत्ता होती है, और जिनके पास सामाजिक सत्ता है, उनकी ही राजनीति में वाजिब भागीदारी या हुकूमत और आर्थिक सशक्तिकरण या वर्चस्व होता है! चुनावी लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता क्षणिक होती है, जबकि सांस्कृतिक सत्ता दीर्घजीवी। यह सांस्कृतिक सत्ता ही समाज को दिशा देती है, जीवन-शैली रचती है, इतिहास को गढ़ती है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है।
इतिहास साक्षी है कि जहां कहीं भी किसी समुदाय की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान स्थापित हुई, वहां राजनीतिक सत्ता या तो उसके अधीन हो गई या फिर उसको हर मामले में महत्त्व देती है। राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय, सिविल सोसायटी और सचिवालय—ये सभी संस्थान उसी समुदाय के वर्चस्व में आते हैं जिसकी सांस्कृतिक अस्मिता स्वतंत्र और मजबूत होती है। भारत में चाहे ब्राह्मण हों, मुस्लिम, ईसाई, सिख या पारसी—सभी ने अपनी सांस्कृतिक पहचान के बल पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व कायम रखा है। साथ ही, दलितों की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान न होने के कारण ही उसको राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, साहित्यिक व शैक्षणिक वंचना से गुजरना पड़ा।
लेकिन यह भी सत्य है कि राजनीतिक (व आर्थिक) सत्ता ही स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम होती है। बिना राजनीतिक शक्ति के सांस्कृतिक जागरण अधूरा रह जाता है। इतिहास के पन्नों में सम्राट अशोक का उदाहरण चमकता है। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अपनी राजनीतिक सत्ता का उपयोग कर बौद्ध धम्म को न केवल भारत में, बल्कि एशिया के विभिन्न हिस्सों में फैलाया। उनके शिलालेख और स्तंभ आज भी गवाह हैं कि कैसे राजनीतिक शक्ति से धम्म की विजय हुई—मैत्री, करुणा और समानता के सिद्धांतों को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया गया। सम्राट अशोक की राजनीतिक सत्ता ने बौद्ध धर्म को दीर्घजीवी सांस्कृतिक शक्ति प्रदान की। मध्यकालीन और आधुनिक भारत में राजनीतिक सत्ता की बदौलत ही इस्लामी व ईसाइयत संस्कृति भारत में मजबूत हुई और आज भी इस्लाम व ईसाइयत की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान की वज़ह से उसे भाजपा की हिन्दुत्व वाली सरकार भी नजरंदाज नहीं कर पा रही है।
इसी क्रम में आज के भारत में हिन्दुत्व का उदय देखिए। भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकारों में हिन्दुत्व विचारधारा को मजबूती मिली। राम मंदिर आंदोलन से लेकर विभिन्न नीतियों तक, राजनीतिक सत्ता ने हिन्दू सांस्कृतिक पहचान को मुख्यधारा में स्थापित किया, जिससे यह दीर्घजीवी हो गई। आज हिन्दुत्व न केवल राजनीतिक एजेंडा है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रतीक बन चुका है।
इसी सत्य को उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के छोटे से शासनकाल ने सिद्ध किया। आदरणीया बहन मायावती जी के नेतृत्व वाली बसपा की हुकूमत में, मात्र सात वर्षों में, बहुजन समाज को एक नई, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान मिली। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, गौतम बुद्ध, ज्योतिबा फुले, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जी जैसे महान संतों-गुरूओं और नेताओं के सम्मान में भव्य स्मारक, पार्क और मूर्तियां स्थापित की गईं। लखनऊ और नोएडा में बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर मेमोरियल पार्क, दलित प्रेरणा स्थल, बौद्ध शांति उपवन जैसे स्थल दलित-बहुजन इतिहास, साहित्य, संस्कृति और शौर्य के प्रतीक बने। दलित-बहुजन समाज के राष्ट्र निर्माण में योगदान को मुख्यधारा के इतिहास में स्थान मिला। बौद्ध धर्म और अम्बेडकरवादी विचारधारा को नई ऊर्जा मिली, जिससे दलित-बहुजन समाज में आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव का संचार हुआ। दलित-बहुजन समाज का आर्थिक सशक्तिकरण हुआ। यह सब राजनीतिक सत्ता के बल पर संभव हुआ—बसपा की स्वतंत्र राजनीति ने बहुजन समाज को वह ऐतिहासिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति दी जिसके लिए वह सदियों से संघर्षरत है।
अध्ययन से स्पष्ट है कि राजनीतिक (व आर्थिक) सत्ता और सांस्कृतिक (सामाजिक) सत्ता एक-दूसरे की पूरक हैं। राजनीतिक सत्ता सांस्कृतिक सत्ता को मजबूत करने का सबसे सशक्त माध्यम है और सांस्कृतिक सत्ता संबंधित समुदाय की राजनीतिक सत्ता को स्थायित्व प्रदान करती है, समुचित भागीदारी को सुनिश्चित करती है।
इसलिए, दलित-बहुजन समाज यदि ब्राह्मणी संस्कृति की गोद में बैठकर सामाजिक सम्मान, सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक सशक्तिकरण और राजनीतिक हुकूमत का सपना देखता रहेगा, तो वह सपना कभी साकार नहीं होगा। दलित-बहुजन समाज को अपनी स्वतंत्र सामाजिक और सांस्कृतिक अस्मिता के लिए आत्मनिर्भर नेतृत्व—आदरणीया बहन मायावती जी—और स्वतंत्र राजनीति—बहुजन समाज पार्टी—के माध्यम से ही आगे बढ़ना होगा। केवल यही वह मार्ग है जो बहुजन समाज को स्वतंत्र राजनैतिक सत्ता प्रदान करेगा, जिसके बल पर सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति के रास्ते से समतामूलक समाज की स्थापना संभव होगी। यह स्वतंत्र सांस्कृतिक (समतावादी) जागरण ही भारत राष्ट्र के निर्माण का आधार बनेगा—सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय!


