18.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

एन दिलबाग सिंह का कॉलम: सत्ता इतिहास और वैचारिकी

संघर्ष और हवा हवाई बातों मे बहुत फर्क होता है. आज के दौर मे संघर्ष का जो सबसे ताकतवर तरीका सामने आया है, वो तरीका वैचारिकी का है वरना अम्बेड़कर या काशीराम जैसे लोगों ने ना कभी तलवार चलाई है और ना ही किसी भाले से लड़े है. लेकिन, अपने विचारों से बहुत बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव रखकर गए है.

इसलिए, विचारों की ताकत को समझो, ये फालतु की हवा हवाई बातें शोषितों, दलितों, आदिवासीयों और पिछड़ों के किसी काम की नही है, इन लोगों को नई दिशा सिर्फ बाबा साहेब अम्बेड़कर जैसे महापुरूषों के विचार ही दे सकते है.

बिना बात की अकड़ और हेकड़ी से शोषितों व वंचितों को कुछ हासिल नही होना, आज तक हुआ भी नही है – सिवाय पुलिस केस, कोर्ट कचहेरी के चक्कर, आपसी रंजिश और बदले की आग मे हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ ही मिलनी है. फिर भी कुछ समझ मे ना आए तो बैठकर सोचना की हथियारों के बलबुते नक्सलियों ने आजतक क्या हासिल कर लिया – उनमे भी तो अधिकतर अपने ही देश के गरीब दलित आदिवासी भाई बहन शामिल है.

समाज की ताकत उसकी संगठित ताकत होती है, उसका इतिहास होता है और इतिहास भी उन्ही का जिंदा और गौरवशाली होता है जिनकी सत्ता होती है. अपने बाप भाईयों को मारकर और सत्ता की ताकत के बलबुते प्रजा का दमन करके भी राजा महाराजा अपना मनचाहा इतिहास शिलालेखों, मुद्राओं आदि पर अंकित करवा गए है.

इतिहास हमेशा ताकतवर लोगों का ही लिखा जाता है. गरीब और मजदुरों का तो जिन्दगी की आखिरी सांस तक रोजी रोटी के लिये सिर्फ संघर्ष मिलता है. राजा की जय जयकारे लगाने के लिए पहले भी भीड़ लगती थी और आज लोकतंत्र के राजाओं के लिए भी जयकारे लगाने वालों की भीड़ की कोई कमी नही है.

इतिहास गवाह है, राजा के ऐसो-आराम उस समय भी चलते थे जब अकाल और भुखमरी से आम लोग घुट घुटके जी नही रहे थे, बल्कि घुट घुटकर मर रहे थे . कमाल की बात तो ये थी कि मजदुरों और गरीबों को राजा मे हमेशा अपना अन्नदाता और खुदा नजर आता था. क्योकि, धर्म के ठेकेदार सत्ता के साथ मिलकर मलाई चाटने का काम करते थे और जनता को धर्म के नाम बनी सच्ची झुठी कहानियों मे उलझाये रखते थे. फिर भला गरीब जनता का भला कैसे हो सकता था.

जब देश मे आपातकाल जैसी स्थिति बनती तो मलाई खाने वाले धर्म के ठेकेदार आदि उन राजाओं के और ज्यादा जयकारे लगवाते थे, राजा को जनता का भगवान तक बताने का काम करते थे, ताकि कोई विरोध ना करे. देश मे ना तो कभी राजाओं के ऐसो आराम बंद हुए और ना ही कभी गरीब और मजदुरों का सही मे भला हुआ. फिर पता नही धरती पर कहाँ से कार्ल मार्क्स, फुले, मार्टिन लुथर, अम्बेड़कर, पेरियार और काशीराम जैसे लोगों ने जन्म लिया और धीरे-धीरे गरीब और मजदुरों के हलों की बातें नारों मे बदलती चली गयी. बहुत कुछ बदला, राजा भी बदले और राजा बनने के तरीके भी बदले. राजशाही का स्थान जनता के वोटों से चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारों ने ले लिया.

समय बीतता चला गया और इन महान विचारकों के विचार भी धीरे-धीरे सत्ता के सामने बिना आवाज के दम तोड़ने लगे. एक बार फिर वोटों से चुने हुए राजाओं के जय जयकारे गुंजने लगे है और कमाल की बात तो ये है कि आज भी नारे लगाने वालो में वही मजदूर, गरीब और नौकरीपेशे वाला मध्यमवर्गीय वर्ग ही है. राजा पहले अपना गुणगान करवाने के लिए भांडो की टीम रखते थे, आजकल ये काम मीडिया और सोशल मीडिया करती है . काम पुराना ही है लेकिन तरीके मॉडर्न हो चुके हैं.

लेकिन, एक बात सच ये भी है कि लोकतंत्र मे वैचारिकी का द्वंद कभी भी पुरी तरह से नही मरता है, वो जब भी आवाज तेज करता है, जमी जमाई सत्ता उखड़ने लगती है. पहले राजा सेना के बल पर प्रदेश जीतता था और आज जनता की खामोशी भी सबकुछ छीन लेने की ताकत रखती है. इस खामोशी की आवाज को सुनने की कोशिश कीजिये, भविष्य की धुंधली-धुंधली तस्वीर और साफ नजर आने लगेगी.

समय आ गया है कि वंचितों, शोषितों को भी अपनी वोट से राजा चुनते वक्त विचारधारा को भी चुने, जो विचारधारा सही मे उनके हकों के लिए खड़ी हो, उनको मजबुत बनाये, ताकतवर बनाये और खुद उस सामाजिक सोच मे बदलाव के साथ मजबुती से खड़े नजर आये. बाबा साहेब और मान्यवर जैसे महापुरुषों का संघर्ष और विचारधारा कोई युज एंड थ्रो का आइटम नही है बल्कि, बड़े साम्राज्य की मजबूत नींव है, करोड़ों लोगों की उम्मीदे हैं.

(लेखक: एन दिलबाग सिंह, यह उनके निजी विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...