न बिकने वाला बहुजन: मान्यवर साहेब का अमर मंत्र, बसपा का अटल संकल्प

बहुजन आन्दोलन के महान प्रणेता, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब का वह उद्घोष आज भी बहुजन हृदय में गूँजता है—एक ऐसा संदेश जो न केवल चेतना जगाता है, अपितु आत्म-सम्मान की राजनीति का मूल मंत्र प्रदान करता है। 18 मार्च को आगरा के अम्बेडकर पार्क में, जब साइकिल रैली के साथ वे विशाल जनसमूह के समक्ष उपस्थित हुए, उनके शब्द अमृत-तुल्य थे, किंतु साथ ही कठोर सत्य की तरह तीक्ष्ण भी। उन्होंने कहा था—

“बहुत से नेता बड़े जोर जोर से बोलते थे और धुआंधार बोलते थे। जैसे कि बीपी मौर्या। वक्त आने पर कब धीरे से बिक गए, कांग्रेस ने उन्हें खरीद लिया, पता भी नहीं चला। यह सब क्यों होता है? कभी आपने इस बात पर गौर किया हैं। मैंने गौर किया है कि ‘जैसा समाज होता है, उसे वैसा ही नेता भी मिल जाता है।’ आप अपना कीमती वोट चुनाव के समय जरा-जरा से कुल्हड़ में बेंच देते हैं, तो फिर आपको बिकने वाले नेता ही मिलेंगे। मैं कांशीराम, धीरे-धीरे बोलता हूँ और धुआंधार भी नहीं बोलता हूँ, आपसे कभी कहा भी नहीं कि मैं नहीं बिकूंगा? अगर मैं बिक जाऊँ तो आप क्या करेंगे? इसका एकमात्र हल है, न बिकने वाला बहुजन समाज समाज तैयार करना। अगर आपने न बिकने बहुजन समाज तैयार कर लिया तो एक कांशीराम बिकता है, तुरंत ही आप दस कांशीराम तैयार कर लोगे और इस खरीद फरोख्त की प्रक्रिया पर लग़ाम लग जायेगी।”

यह वचन मात्र भाषण नहीं था; यह बहुजन समाज को दी गई एक आजीवन चुनौती थी। यह याद दिलाता था कि सत्ता की चाबी हाथ में आने से पूर्व समाज को स्वयं को इतना सशक्त, इतना जागृत और इतना अडिग बनाना होगा कि कोई लालच, कोई प्रलोभन उसे झुका न सके। मान्यवर साहेब ने स्वयं को उदाहरण बनाकर दिखाया कि नेता समाज का प्रतिबिंब होता है—यदि समाज बिकाऊ है, तो नेता भी बिकेगा; यदि समाज अटल है, तो कोई भी नेता बिकने की कल्पना भी नहीं कर सकता।

किंतु दुर्भाग्य से, इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि जब भी बहुजन शक्ति का उदय होता है, तब विभाजनकारी तत्व सक्रिय हो उठते हैं। 1986 के आसपास, जब बसपा के निर्माण की नींव मजबूत की जा रही थी, तब कांग्रेस के भय से कुछ तथाकथित बामसेफी तत्व लालच में पड़ गए। उन्होंने कांग्रेस के धन से बामसेफ को पंजीकृत करवा दिया—एक ऐसा कदम जो मूल बामसेफ की आत्मा के विरुद्ध था। मान्यवर श्री कांशीराम साहेब ने कभी बामसेफ को रजिस्टर्ड नहीं करवाया था, क्योंकि उनका लक्ष्य कर्मचारियों के माध्यम से समाज को शिक्षित-संगठित करना था, न कि कोई पंजीकृत संस्था बनाकर लाभ कमाना। परंतु इन बिके हुए तत्वों ने मान्यवर साहेब, बहन कु. मायावती जी तथा बसपा के पवित्र नाम का दुरुपयोग कर बहुजन समाज से धन उगाहा और मूल बामसेफ की छवि को धूमिल किया। परिणामस्वरूप, मान्यवर साहेब को बामसेफ से अलगाव अपनाना पड़ा—एक ऐसा निर्णय जो उनके लिए अत्यंत कष्टदायक रहा होगा, किंतु बहुजन मिशन के लिए अपरिहार्य था।

आज भी वही प्रवृत्ति जीवित है। कुछ लोग बहनजी पर “धन की देवी”, “दौलत की बेटी”, “टिकट बेचने वाली” जैसे घृणित, असत्य एवं अपमानजनक आरोप लगाकर ब्राह्मणवादी शक्तियों को अप्रत्यक्ष रूप से बल प्रदान कर रहे हैं। वे बामसेफ का नाम तो लेते हैं, किंतु समाज को जागृत करने के बजाय गुमराह करने में लगे रहते हैं। वे पंजीकृत बामसेफ के नाम पर, मुक्ति पार्टियों, भीम सेनाओं, आर्मियों आदि के रूप में विभिन्न गुट बनाकर बहुजन वोट को काट रहे हैं। वे दावा करते हैं कि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ रहे हैं, किंतु वास्तव में बसपा को कमजोर कर ब्राह्मणवादी दलों के हित साध रहे हैं।

बहुजन समाज के प्रत्येक सच्चे सपूत को यह समझना होगा कि बसपा कोई साधारण राजनीतिक दल नहीं है—यह बहुजन अस्मिता का प्रतीक है, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब की दूरदर्शिता का जीवंत रूप है, और बहन मायावती जी के नेतृत्व में बहुजन सत्ता का एकमात्र व्यावहारिक व सशक्त माध्यम है। यदि बसपा कमजोर हुई, तो बहुजन समाज स्वयं कमजोर हो जाएगा; यदि बसपा टूटी, तो बहुजन एकता का सपना चकनाचूर हो जाएगा।

अतः आज की घड़ी में बहुजन समाज को इन सभी विभाजनकारी, बिकाऊ एवं भ्रम फैलाने वाले तत्वों से पूर्ण सतर्क रहना होगा। इन्हें नेस्तनाबूत करना, इन्हें किनारे करना ही बहुजन हित में सर्वोपरि है। हमें चाहिए कि अपनी बसपा को अटल विश्वास से मजबूत करें, मान्यवर साहेब के उस अमर संदेश को हृदय में संजोएँ—“कभी न बिकने वाला समाज तैयार करो”—और बहुजन समाज की सशक्त, स्वतंत्र एवं सम्मानजनक हुकूमत की स्थापना करें।

यह मार्ग कठिन है, किंतु असंभव नहीं। क्योंकि जब बहुजन समाज एकजुट होता है, तब कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकती। यह सब मान्यवर साहेब, बहनजी और बसपा ने साबित किया है।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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