क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध को नहीं स्वीकारा. आदि शंकराचार्य ने विष्णु अवतार मानने से भी इंकार कर दिया था. जगतगुरू रामभद्राचार्य ने तो यहां तक कहा कि मोदी नहीं समझे बुद्ध ने हमारा कितना नुकसान किया. ऐसा क्यों कि एक ओर अपना मानना है दूसरी ओर विरोध भी करना है?
क्षत्रिय बताने के पीछे क्या तर्क और तथ्य हैं? आपने कहां पढ़ा कि बुद्ध क्षत्रिय थे? यकीनन कई इतिहास की किताबों में और कई धार्मिक लोगों की बातों में? तो सबसे पहले यह समझ लीजिए कि बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करने के पीछे सबसे स्पष्ट तथ्य हैं पुराण. इन्हीं में बुद्ध के बारे में कई जिक्र हैं और कई प्रकार की छवि भी.
लेकिन समझना यह भी पड़ेगा कि इन्हीं पुराणों में तो रामानुजाचार्य से लेकर रानी विक्टोरिया का भारत में शासन स्थापित करने तक का भी जिक्र है. जब इनकी पौराणिक प्रामाणिकता स्वयं ही भ्रमित हैं तो फिर बाकी बातों का आकलन कीजिए. और हां कभी विष्णु का अवतार तो मुगल सम्राट अकबर को भी बताया गया था. उसका क्या?
अब बात करते हैं कि आख़िर बुद्ध कौन थे? तो बुद्ध खत्तिय थे. खत्तिय जो खेतिहर थे अर्थात किसान. वह इक्ष्वाकु वंश नहीं शाक्य वंश के थे. इखवाकु इसलिए हुए क्योंकि उनके पिता ईख की खेती करते थे. उपरोक्त चित्र जिसमें हल लगाता किसान है वह बुद्ध के पिता शुद्धोधन हैं और यह मूर्ति गांधार शैली की पाकिस्तान से मिली थी.

खेत से खेती, खेती से खेतिहर और क्षेत्र विशेष को खत तथा इससे जुड़े कागजातों को खतौनी कहने की परंपरा यहीं से संबंधित है. बाकी यह समझ लीजिए कि बुद्ध से जुड़े जितने भी पवित्र स्थल भारत में है जैसे सारनाथ, कौशांबी, नालंदा, तक्षशीला यह सब हालिया खुदाई में निकले हैं उससे पहले लोग बुद्ध को विदेशी समझते थे.
चीन, जापान, कोरिया इत्यादि देशों में बुद्ध का एकछत्र राज होने से यह भ्रम पैदा हुआ था. बाद में फ़ाह्यान, ह्वेनसांग इत्यादि की किताबों, चीन, श्रीलंका और तिब्बत की किताबों, कहानियों से बुद्ध और अशोक पुनर्जीवित हो सके. बुद्ध की विरासत सारी परिवर्तित हो चुकी थी और भारत के लोग अमूमन बुद्ध को भूल चुके थे.
अब बात करते हैं ऐतिहासिक तथ्यों पर तो डी. डी. कोसांबी ने कहा है कि “बुद्ध का विष्णु का अवतार घोषित करने के पीछे ब्राह्मणवादी समावेशन की रणनीति थी.” रोमिला थापर ने धार्मिक रणनीति बताया तो आर एस शर्मा ने अवतार बनाने के पीछे धीरे–धीरे बुद्ध को हाशिए पर धकेलने की रणनीति बताया.
इतिहासकार रामशरण शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएँ ” ( पृ. 81 ) में लिखा है कि खत्तिय उपाधि का मतलब खेतों का मालिक है. आगे लिखा है कि दूसरों के खेतों के रक्षक भी. इसलिए क्षत्रिय शब्द छत और क्षत्र तथा रक्षक से आया. दूसरे चित्र में जो छत्र है वह छत्रधारी उपाधि से है.
अर्थात सेनापति को यह उपाधि मिलती थी और सिर पर छत्र पहनाया जाता था जो कालांतर में क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत हो गया. मेगस्थनीज राजपूत जाति को नहीं जानता था, फाहियान और ह्वेनसांग भी राजपूत जाति से वाकिफ नहीं थे. ग्यारहवीं सदी में भारत आए अलबेरुनी को भी नहीं पता था कि राजपूत जैसी कोई जाति है.
बारहवीं सदी के कल्हण को भी राजपूत जाति का पता नहीं था. पंद्रहवीं सदी के महाराणा कुंभा के काल तक राजपूत जाति का कहीं उल्लेख नहीं है. हां महाराणा कुम्भा के बाद जो राजा के पुत्र को राजपूत कहने की परंपरा चली वहीं से आधुनिक राजपूत शब्दावली अस्तित्व में आई और खत्तिय से क्षत्रिय जाति भी स्थापित हो गई.
बाकी शाक्य गण के बुद्ध को इसी खत्तिय के आधार पर इतिहासकार क्षत्रिय बता देते हैं मगर उसी खत्तिय गण के कोलिय और मोरिय को क्षत्रिय बताने से वे भागने लगते हैं. जब ऐतिहासिक प्रमाण है कि कोली और मौर्य भी खत्तिय हैं तो उन्हें समस्या पैदा हो जाती है. अब यह भ्रम दोनों ओर है. एक तात्कालिक खत्तिय का क्षत्रिय बनने की ओर तथा दूसरा बुद्ध को क्षत्रिय बनाने की ओर.
डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जी लिखते हैं कि महापरिनिब्बान सुत्त में लिखा है कि मोरियों ने कहा कि गोतम बुध खत्तिय थे और हम भी खत्तिय हैं मतलब मोरिय खत्तिय थे। सुद्धोदन खत्तिय ने कोलिय राजा को संवाद भेजा कि हम भी खत्तिय हैं और आप भी खत्तिय हैं ( रांगेय राघव, यशोधरा जीत गई, पृ. 18) मतलब कोलिय भी खत्तिय थे। तो क्या शाक्य गण, कोलिय गण, मोरिय गण सभी राजपूत थे?
तथागत बुद्ध शाक्य गण के थे, जबकि उन्हें क्षत्रिय वर्ण का बताया जाता है. बौद्ध भिक्खु महामोग्गल्लान कोलिय गण के थे, जबकि उन्हें ब्राह्मण वर्ण का बताया जाता है. सम्राट असोक मोरिय गण के थे, जबकि उन्हें शूद्र वर्ण का बताया जाता है. गौतम बुद्ध की माता कोलिय वंश की थी. सम्राट असोक की पत्नी देवी शाक्य गण की थीं, जबकि उन्हें वैश्य वर्ण का बताया जाता है.
सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी. वह नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तिय से ब्याही गई थी. अब आप स्वयं भी आकलन कीजिए यदि बुद्ध विष्णु अवतार या हिंदू धर्म के अनुयाई होते तो बुद्ध के साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश इत्यादि भी विदेशों में जाते और जापान, कोरिया सहित तमाम बौद्ध राष्ट्रों को भी हिंदू राष्ट्र मानते? ये विरोधाभास और तथ्यों का अभाव क्यों है कभी सोचा है?
डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जी कहते हैं कि “ऐसा इसलिए कि भारत का इतिहास वर्ण – व्यवस्था से गण – व्यवस्था की ओर उल्टी दिशा में चलता रहे. वैदिक सभ्यता से बौद्ध सभ्यता की ओर उल्टी दिशा में चलता रहे.” वे आगे लिखते हैं कि मनुस्मृति से लेकर विष्णु पुराण तक में लिखा हुआ है कि ब्राह्मणों को नाम के आखिर में शर्मा, क्षत्रिय को वर्मा आदि लिखना चाहिए.
पढ़ा है कि मनुस्मृति, विष्णु पुराण आदि गुप्तकाल और गुप्तकाल से पहले की लिखी हुई किताबें हैं. गुप्तकाल और गुप्तकाल से पहले के कई राजाओं, लेखकों एवं अन्य लोगों के नाम प्रामाणिक तौर पर हमें ज्ञात हैं. अभी तक प्रामाणिक तौर पर एक भी शर्मा – वर्मा नामांत नाम, उपनाम हमें नहीं मिला.
इससे साफ होता है कि इन किताबों की रचना तब हुई होगीं, जब इस तरह की जातिगत उपाधियाँ प्रचलित हुई होंगी. अर्थात वर्णव्यवस्था ही नई नहीं है बल्कि बहुत सी धार्मिक स्थापनाएं नई है. खोज, शोध उल्टी दिशा में निकल आते हैं. आयेंगे ही जब उन्नीसवीं सदी से पहले हम सिन्धुघाटि सभ्यता से भी परिचित नहीं थे.
पहाड़ों में जितने भी उपनाम हैं वह समस्त उपाधियां रही हैं. जो वर्णव्यवस्था यहां आई वह बाहरी लोगों के आगमन के साथ तथा आदि शंकराचार्य के धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्व्यवस्था के पश्चात ही दिखाई पड़ती है. यही आलम पूरे देश में होना चाहिए. बुद्ध के समय या उससे पहले यह सब होता तो चीन, तिब्बत,,जापान, कोरिया वंचित ना रहते.
अंत में यही कि नालंदा की जितनी खुदाई थी उसके शोधकर्ता कहते हैं वह महज़ दस प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है. राखीगढ़ी से लेकर मोहनजोदड़ो तक कितना हो खुद सका. जब हम कुछ सदी पहले तक चक्रवर्ती राजा अशोक से भी परिचित नहीं थे. अशोक स्तंभ को महाभारत के भीम की लाठी कहते थे तो यह दावा भ्रमित ही है कि बुद्ध से पहले अन्य संस्कृति थी और वही आज की सनातन, वैदिक या हिंदू संस्कृति है. बाकी थोड़ा सोचने पर दबाव डालो बातें स्वतः ही समझ आएगी.
(लेखक: आर पी विशाल, ये लेखक के अपने विचार हैं)

