12.8 C
New Delhi
Sunday, January 11, 2026

किस्सा कांशीराम का #11: आज मैं तुम्हें खाना नहीं खिला सकता, क्योंकि आज मेरी जेब में पैसे नहीं हैं

आपकी अंतरात्मा को झकझोर देने वाला ये वाक्या 1985 में हुए बिजनौर (उत्तर प्रदेश) उपचुनाव का है, हुआ यूं कि कुमारी मायावती बिजनौर उपचुनाव से बीएसपी की उम्मीदवार थीं. लेकिन पैसे की कमी भी बहुत ज्यादा चल रही थी.

ऐन. टी. घोरमोडे उस भयानक दौर को आंखों में आंसू लेकर याद करते हैं और बताते हैं कि एक दिन रात का समय था. कार्यकर्ता,  साहेब के आसपास बैठे थे लंगर की कोई व्यवस्था नहीं थी.

साहेब- ने बहुत दुखी मन से अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि आज मेरी जेब में एक भी पैसा नहीं है. आप जाओ किसी ढाबे पर खाना खा लिजिए ओर जिस दिन मेरे पास पैसा होगा, मैं उनको दे दूंगा. इसके बाद साहेब ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संदेश में कहा कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो सीधे तौर पर हमारे दुश्मनों को फ़ायदा होगा. अगर एक-दो दिन में पैसे का इंतजाम नहीं किया तो मैं आंदोलन छोड़ दूंगा.

साहेब की बातों का कार्यकर्ताओं पर इतना असर हुआ कि काफी हद तक पैसों की भरपाई हो गई. कुमारी मायावती मीरा कुमार को कड़ी टक्कर देने में सफल रही. इसका मतलब है कि कुमारी मायावती 63000 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं.

जब के राम विलास पासवान तीसरे स्थान पर पहुंच गए. मीरा कुमार के उपचुनाव जीतने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मीरा कुमार के पिता जगजीवन राम को बुला कर अपमान किया और कहा कि अगर आपके पास व्यक्तित्व होता तो कांग्रेस को आपकी बेटी को जिताने के लिए इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती.


(स्रोत: मैं कांशीराम बोल रहा हूँ का अंश; लेखक: पम्मी लालोमजारा, किताब के लिए संपर्क करें: 95011 43755)

Me Kanshiram Bol Raha Hu
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...

ओपिनियन: दलित छात्रा की मौत और संस्थागत असंवेदनशीलता: एक सन्नाटा जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरता है

दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों के भीतर एक बार फिर वह खामोशी गूंज उठी है, जो हर उस छात्र के दिल में बसी है, जो...

डीग में बसपा का संगठन समीक्षा एवं प्रशिक्षण शिविर, राजस्थान में मजबूती का संकल्प

डीग (भरतपुर), 30 सितंबर 2025 — बहुजन समाज पार्टी द्वारा आज विधानसभा स्तरीय संगठन समीक्षा एवं प्रशिक्षण शिविर का आयोजन नगर (डीग) में किया...

Opinion: समाजिक परिवर्तन के साहेब – मान्यवर कांशीराम

भारतीय समाज सहस्राब्दी से वर्ण व्यवस्था में बंटा है. लिखित इतिहास का कोई पन्ना उठा लें, आपको वर्ण मिल जायेगा. ‌चाहे वह वेद-पुराण हो...

बिहार चुनाव 2025: BSP की तैयारी पूरी समीक्षा बैठक में महत्वपूर्ण फैंसलें

बिहार चुनाव: आगामी कुछ महीनों में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने चुनावी रणनीति को अंतिम रूप...