स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन की क्रूरता को उजागर करता है। 1 जनवरी 1948 को वर्तमान झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के खरसावां हाट मैदान में ओड़िशा मिलिट्री पुलिस ने बिना चेतावनी निहत्थे आदिवासी प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें सैकड़ों से लेकर हजारों निर्दोष लोग मारे गए। आजाद भारत का यह नरसंहार “स्वतंत्र भारत का जलियांवाला बाग हत्याकांड[1]” के नाम से जानी जाती है। यह घटना तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में चल रही रियासतों के एकीकरण नीति के दौरान घटी, जहां भारत के एकीकरण की “लौह पुरुष” वाली छवि के पीछे सरदार पटेल की सांमतपरस्त और आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों के दमन की छाया स्पष्ट दिखाई देती है।

आदिवासियों की स्वशासन और अलग राज्य की मांग ब्रिटिश काल से गहन थी। 1855 के संथाल विद्रोह में सिद्धू-कान्हू ने “हमारी माटी, हमारा राज” का नारा दिया, जबकि बिरसा मुंडा ने 1890 के दशक में “अबुआ दिशोम, अबुआ राज” (हमारा देश, हमारा शासन) का उद्घोष किया। बस्तर जैसे क्षेत्रों में आज भी “मावा नाटे, मावा राज” जैसे नारे जीवित हैं। 1930 के साइमन कमीशन ने आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रशासन की सिफारिश की। 1938 में ऑक्सफोर्ड शिक्षित और 1928 ओलंपिक हॉकी टीम के कप्तान मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी महासभा का गठन हुआ, जो अलग आदिवासी राज्य की मांग करती थी। इन मांगों को बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर रचित भारतीय संविधान में पांचवीं और छठी अनुसूची के रूप में मान्यता मिली। जयपाल सिंह मुंडा इस संघर्ष के प्रतीक बने, जिन्होंने संविधान सभा में आदिवासी अधिकारों की मजबूत वकालत की।
स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल को रियासतों के विलय की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी मिली। खरसावां और सरायकेला छोटी रियासतें थीं – खरसावां मात्र 400 वर्ग किलोमीटर से कम क्षेत्रफल वाली, खनिज संसाधनों से समृद्ध और मुख्यतः हो तथा मुंडा आदिवासी बहुल। इनके शासक ओड़िया भाषी थे और निज कारणों से ओड़िशा में विलय चाहते थे। 1947 के अंत में इनका ओड़िशा में विलय तय हुआ, जो 1 जनवरी 1948 से प्रभावी होना था। लेकिन आदिवासी इसका कड़ा विरोध कर रहे थे – वे न बिहार में विलय चाहते थे, न ओड़िशा में; उनकी मांग अलग झारखंड राज्य की थी।

इस विरोध को संगठित करने के लिए जयपाल सिंह मुंडा के आह्वान पर 1 जनवरी को खरसावां के साप्ताहिक हाट मैदान में विशाल जनसभा बुलाई गई। दूर-दराज के गांवों से 50,000 से अधिक आदिवासी इकट्ठे हुए – पुरुष, महिलाएं, बच्चे शामिल। कई लोग केवल जयपाल सिंह को देखने-सुनने आए थे। ओड़िशा प्रशासन ने अशांति की आशंका से भारी पुलिस बल तैनात किया। भीड़ के उत्साह और विशालता से घबराकर ओड़िशा मिलिट्री पुलिस ने बिना चेतावनी के गोलीबारी शुरू कर दी। 11 जनवरी 1948 के अपने भाषण में जयपाल सिंह मुंडा ने मार्मिक वर्णन किया कि हाट मैदान में लाशें बिछी थीं, घायल पानी और मदद के लिए तड़प रहे थे, लेकिन क्षेत्र सील कर दिया गया। शाम तक शवों को ट्रकों में लादकर जंगलों और नदियों में फेंक दिया गया।
मृतकों की संख्या आज भी विवादास्पद है। ओड़िशा सरकार का आधिकारिक आंकड़ा मात्र 35 था, लेकिन गवाहियां, जयपाल सिंह के वर्णन और स्रोत जैसे पूर्व रियासत शासक पी.के. देओ की किताब “मेमॉयर ऑफ ए बाइगोन एरा” में 300 से 2,000 तक का अनुमान है। कई घायल इलाज न मिलने से मरे। कई जांच समितियां गठित हुईं, लेकिन कोई अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई और दोषियों की पहचान नहीं हो सकी। सरदार पटेल की भूमिका अप्रत्यक्ष लेकिन केंद्रीय थी – विलय प्रक्रिया कांग्रेस की केंद्र सरकार की नीति का हिस्सा थी और वे गृह मंत्री के रूप में उत्तरदायी थे। हालांकि गोलीबारी ओड़िशा पुलिस ने की, परन्तु सामंती रियासतों के प्रति नरमी और आदिवासियों के प्रति लौह नीति के तहत विलय प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभाने वाले समंती सरदार पटेल ने 3 जनवरी 1948 के कलकत्ता भाषण में घटना की निन्दा की आड़ में लीपापोती की। यही वजह है कि आदिवासी समुदाय उनकी “लौह नीति” को आदिवासी इच्छाओं की अनदेखी के लिए जिम्मेदार मानता है। घटना के बाद जन दबाव से मई 1948 में दोनों रियासतें बिहार में विलय कर दी गईं।
इस हत्याकांड की स्मृति आज भी आदिवासी समाज में जीवित है। खरसावां में शहीद स्मारक बना हुआ है, जहां हर साल 1 जनवरी को हजारों लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और इसे “काला दिवस” या “शहादत दिवस” मनाते हैं। हाल ही में, 1 जनवरी 2026 को झारखंड के आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शहीदों के परिवारों की पहचान और सम्मान के लिए न्यायिक जांच आयोग गठित करने की घोषणा की – यह 78 वर्ष बाद न्याय और मान्यता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
खरसावां गोलीकांड राष्ट्र निर्माण की जटिलताओं, वंचित समुदायों की अनदेखी और पुलिसिया दमन के खतरों को रेखांकित करता है। 2000 में झारखंड राज्य का गठन आदिवासियों की सदियों की लड़ाई की आंशिक विजय था, लेकिन ऐसे ऐतिहासिक घाव आज भी आदिवासी क्षेत्रों में अशांति और अविश्वास के कारणों में गूंजते हैं। यह घटना हमें चेताती है कि सच्चा एकीकरण सहमति और सम्मान पर आधारित होता है, न कि बल प्रयोग पर।
(01-01-2026)
[1] प्रथम विश्व युद्ध में लड़कर वापस लौटे दलित (अछूत) सैनिक, जो जाति व्यवस्था से पीड़ित थे, स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) में माथा टेकना चाहते थे। किंतु जातिवादी सिख पुजारियों ने उन्हें अछूत होने के कारण प्रवेश नहीं दिया। इस अपमान से व्यथित होकर इन दलितों ने जलियांवाला बाग में जातिवाद और जाति व्यवस्था के खिलाफ एक शांतिपूर्ण जन सभा का आयोजन किया। इस सभा में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल हुए; कई महिलाएं तो अपने दूधमुंहे शिशुओं के साथ आई थीं।
जातिवादियों ने जनरल डायर को गलत सूचना दी कि यह सभा अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह है, जबकि वास्तव में यह जाति व्यवस्था के खिलाफ थी—वह व्यवस्था जो हिंदुओं से निकलकर सिख समाज तक फैल चुकी थी। जनरल डायर की गलती यह थी कि उन्होंने बिना जांच-पड़ताल के सवर्ण सिखों के बहकावे में आकर अछूतों की इस सभा पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं, जिसमें दूधमुंहे बच्चों सहित हजारों लोग शहीद हो गए। अंततः, अछूत समुदाय में जन्मे महान क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह ने लंदन जाकर जनरल डायर के स्थानापन्न माइकल ओ’ड्वायर की हत्या कर बदला लिया।
महावीर शहीद उधम सिंह को जातिवादी सरकारों ने कभी सम्मान नहीं दिया, लेकिन जब बहनजी (बहन मायावती जी) के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी, तो उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में उधम सिंह के नाम पर एक जिला बनाकर उन्हें सम्मानित किया—उधम सिंह नगर, जो पहले उत्तर प्रदेश में था और अब उत्तराखंड में है।
दुखद यह रहा कि जनरल डायर को गलत सूचना देने वाले जातिवादी जीवित बच गए और अपने मकसद में सफल भी हो गए। साथ ही, जातिवादी इतिहासकारों ने इसे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह बताकर प्रचारित किया, जिससे अछूतों की इस महान जन सभा के मूल उद्देश्य—जातिवाद के खिलाफ संघर्ष—को दबा दिया गया।इस ऐतिहासिक अन्याय में जातिवादी वर्णवादी मोहनदास करमचंद गांधी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही।


