जब इतिहास के पन्नों को मिटाने की साजिशें रची जाती हैं, तब पत्थर बोल उठते हैं। वे पत्थर जो न केवल कठोर होते हैं, अपितु अमर भी। वे पत्थर जो समय की लहरों से डगमगाते नहीं, बल्कि समय को ही चुनौती देते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल—जिसे लोकप्रिय रूप से अम्बेडकर पार्क कहा जाता है—और अन्य समतामूलक स्मारक इसी कठोर संगमरमर की भाषा में लिखी गईं उन गौरवगाथाओं के साक्षी हैं, जिन्हें सदियों से दबाने का प्रयास होता रहा है।
इन मूर्तियों के निर्माण को लेकर उठने वाली बहसें मात्र धन की मात्रा या व्यय की आलोचना तक सीमित नहीं रहतीं। इनमें एक गहन वैचारिक संघर्ष छिपा है—एक ओर वे लोग जो इन पत्थरों को समता, स्वतंत्रता, सम्मान, बंधुत्व और दलित-बहुजन इतिहास की पुनर्स्थापना का प्रतीक मानते हैं; दूसरी ओर वे जो इन्हें सार्वजनिक धन का दुरुपयोग बताते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि इन मूर्तियों की वास्तविक कीमत न तो करोड़ों में गिनी जा सकती है, न ही केवल संगमरमर की टन में नापी जा सकती है। इनकी असली कीमत है—उन संघर्षों की, उन अपमानों की, उन सदियों की चुप्पी की, जो इन पत्थरों पर उत्कीर्ण होकर अब बोलने लगी है।
जब-जब शासक वर्गों ने दलित-बहुजन महानायकों के नामों को इतिहास की किताबों से मिटाने का प्रयास किया, तब-तब वंचितों को उन नामों को पत्थरों पर उकेरने के लिए बाध्य होना पड़ा। प्राचीन काल में सम्राट अशोक ने अपने शिलालेखों और स्तंभों पर धम्म के संदेश अंकित करवाए थे—न कि केवल अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए, अपितु इसलिए कि समता और न्याय की आवाज़ सदियों तक गूँजती रहे। ठीक उसी प्रकार, आधुनिक भारत में बहन कुमारी मायावती जी ने उन महानायकों—डॉ. भीमराव अम्बेडकर, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब, संत शिरोमणि गुरु रैदास, संत कबीर दास, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु आदि—के साथ-साथ बहुजन समाज की गौरवगाथा को संगमरमर के कठोर पत्थरों पर अंकित किया। यह केवल मूर्तियों का निर्माण नहीं था; यह एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण था, एक दृश्य इतिहास की रचना थी, जो उन लोगों के लिए आशा का प्रतीक बनी जो सदियों तक अदृश्य रहे।
ये मूर्तियाँ मात्र पत्थर नहीं हैं; ये प्रतिरोध की भाषा और समतामूलक समाज सृजन का आगाज़ हैं। जब कोई इनकी आलोचना करता है कि “पैसे से स्कूल-कॉलेज बन सकते थे”, तो वह यह भूल जाता है कि शिक्षा और सम्मान एक-दूसरे के पूरक हैं। जो समाज सदियों तक अपमानित रहा, उसके लिए दृश्य सम्मान भी उतना ही आवश्यक है जितना पुस्तकीय ज्ञान। ये पार्क और मूर्तियाँ उन बच्चों के लिए प्रेरणा-स्त्रोत हैं जो पहली बार किसी सार्वजनिक स्थान पर अपने जैसे चेहरों को देखते हैं—उन्हें महसूस होता है कि हम भी इतिहास का हिस्सा हैं, हम भी गौरव के अधिकारी हैं।
समतावादी विचारधारा के समर्थक इन मूर्तियों को ‘सशक्तिकरण‘ का माध्यम मानते हैं। वे कहते हैं कि जब तक दलित-बहुजन समाज को अपनी विरासत का गौरव नहीं मिलेगा, तब तक वह पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो सकता। दूसरी ओर, जातिवादी मानसिकता के पैरोकार इन्हें राजकोष का अपव्यय बताते हैं—क्योंकि उनके लिए इतिहास वही है जो सदियों से जातिवादियों द्वारा लिखा गया, जिसमें वंचितों की आवाज़ कभी स्थान नहीं पाती। शेष लोग, जो इस बहस को केवल ‘पत्थरों का व्यय’ समझते हैं, वे नासमझ नहीं, अपितु उस गहन सामाजिक यथार्थ से अनभिज्ञ हैं जो इन पत्थरों के नीचे दबी हुई है।
आज जब हम अम्बेडकर पार्क में खड़े होकर उन विशाल मूर्तियों को निहारते हैं, तो केवल संगमरमर की चमक नहीं दिखती—दिखता है एक ऐसा संकल्प जो कहता है: “हम मिटाए नहीं जा सकते। हमारी कहानी अब पत्थरों में लिखी जा चुकी है।” यह संकल्प आदरणीया बहन मायावती जी का है, जो स्वयं एक दलित महिला के रूप में उस संघर्ष की प्रतीक हैं। उन्होंने दिखाया कि सत्ता केवल शासन के लिए नहीं, बल्कि इतिहास पुनर्लिखन के लिए भी होती है।
अंततः, ये मूर्तियाँ न तो केवल व्यय हैं, न केवल विवाद। ये स्मृति हैं—उस स्मृति की, जो कभी मिटाई नहीं जा सकती। जब तक अन्याय रहेगा, तब तक ये पत्थर बोलते रहेंगे। और जब तक ये पत्थर बोलेंगे, तब तक सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति का संघर्ष जारी रहेगा—समतामूलक समाज सृजन के लिए।
यही है वह सच्ची कीमत—जो न तो नकदी में मापी जा सकती है, न ही आलोचना में समाप्त होती है।

