19.7 C
New Delhi
Wednesday, February 25, 2026

किस्सा कांशीराम का #8: सुखद अटे है! तेज़ भागो, पीछे दौड़ता मुनीम कमरे का किराया लेने आ रहा है

पुणे में साहेब के संघर्ष भरे दिनों की कहानी. साहेब को नौकरी से इस्तीफा देने के बाद पुणे के पंजा मोहल्ले डिंकन जिमखाना के भंडारकर इंस्टीट्यूट के बॉयज होस्टल में किराए पर लेने वाले कमरे का किराया देना मुश्किल हो गया. क्योंकि साहेब सुबह पांच बजे बिना कुछ खाए उठकर मिशन पर जाते थे. Movement Work Sun.

असल में उस संस्थान का डायरेक्टर ब्राह्मण था जिसका नाम ब्रिस्कर है. मालिक ने कमरा किराए पर लिया था, लेकिन मालिक कभी किराया देने नहीं आया. यही कारण है कि मालिक ने हर महीने शहर से किराया वसूलने के लिए विशेष रूप से अपनी मुनीम की ड्यूटी लगाई थी.

एक दिन साहेब 142, रास्तापेठ, पुणे स्थित बामसेफ के खुले कार्यालय में पहुंचे और मनोहर अटे से सदासिव पेठ स्थित एक छोटी सी प्रेस चलाने को कहा. बमसेफ संगठन का बुलेटिन इस प्रेस पर प्रकाशित किया गया. असल में साहेब देखना चाहते थे कि उस बुलेटिन की छपाई कैसे चल रही है.

साहेब का हुक्म सुनते ही मनोहर आटा तैयार हो गया. साहेब और मनोहर आते ही अपनी साइकिल से मेन रोड से सदासिव पेठ पहुंचे. बुलेटिन की छपाई देखकर साहब साइकिल पर वापस सड़क पर जा रहे थे. और साइकिल चलाते समय मनोहर अटे को भी बता रहे थे कि पुणे बहुत पुराना शहर है. बहुत सी गलियां हैं. लेकिन सबसे व्यस्त सड़कें भी यहीं हैं. अचानक साहेब ने छोटी सी गली में मनोहर अटे को जल्दी काट दिया और यह कहकर छुप जाते हैं कि मनोहर अटे जल्दी भागो!

पहले तो मनोहर अटे को इस बारे में कुछ समझ में नहीं आया. फिर ये भी साहेब के पीछे भागने लगे. साहेब के पास पहुँच कर मनोहर अटे ने पूछा कि इस भरी गली में छुप कर क्यों खड़े हो? साहेब ने जवाब दिया पीछे से कौन आ रहा है. मनोहर अटे ने पीछे मुड़कर देखा तो साहेब ने कहा कि उनके ऑफिस के मालिक का मुनीम कमरे का किराया लेने मेरे पीछे भाग रहा है. चलो दौड़े मनोहर अटे.

खैर कांशीराम की जेब में किराया नहीं है. ये कहकर साहेब भीड़ भरी गलियों से साइकिल चलाते हुए मेन रोड पर चले गए. याद रहे मनोहर अटे बहुजन आंदोलन के चिंतक और साहेब के संघर्ष भरे दिनों के साथी थे. अटे साहेब से 14 साल छोटा था. नागपुर के मनोहर अटे चार भाई और दो बहनों में सबसे छोटे थे.


(स्रोत: मैं कांशीराम बोल रहा हूँ का अंश; लेखक: पम्मी लालोमजारा, किताब के लिए संपर्क करें: 95011 43755)

Me Kanshiram Bol Raha Hu
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

पराये धन के सहारे नहीं, बहुजन के सहारे चलती है बसपा – बहनजी का अटल स्वाभिमान

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसके संस्थापक-मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जी तथा बहनजी द्वारा स्थापित बहुजन आंदोलन की मूल विचारधारा (आम्बेडकरवाद) आत्मनिर्भरता, मान-सम्मान, स्वाभिमान...

कौन सी BAMCEF? मान्यवर साहेब की असली – या ब्राह्मणवादी वित्त पोषित नकली?

आज बहुजन संगठनों की महामारी में, जब बहुजन समाज के कानों में 'बामसेफ' का नाम गूँजता है, तो हृदय में एक अनिवार्य प्रश्न उदित...

न बिकने वाला बहुजन: मान्यवर साहेब का अमर मंत्र, बसपा का अटल संकल्प

बहुजन आन्दोलन के महान प्रणेता, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब का वह उद्घोष आज भी बहुजन हृदय में गूँजता है—एक ऐसा संदेश जो न केवल...

‘समाज का कार्य, समाज के धन से ही हो सकता है, व्यक्तिगत से नहीं’ – बसपा आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का अमर सूत्र

बहुजन आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का मूल मन्त्र— "समाज का कार्य समाज के धन से ही सम्पन्न होता है, व्यक्तिगत से नहीं।" भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में कुछ...

कठोर पत्थर, अमर संदेश: बहनजी का इतिहास-लेखन

जब इतिहास के पन्नों को मिटाने की साजिशें रची जाती हैं, तब पत्थर बोल उठते हैं। वे पत्थर जो न केवल कठोर होते हैं,...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

बहनजी: जनकल्याण की अमर आवाज़

न भूखंड है, न सिंहासन है,न कोई राजमुकुट, न कोई ताज़ है,फिर भी शान से खड़ी हैं वो,भारत की एकमात्र बुलंद आवाज़ हैं। जिधर नज़र...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...