बात उन दिनों की है जब मैं अपनी MBA करके बड़ी कॉरपोरेट कंपनी में नौकरी करने लगा था. सब कुछ सामान्य चल रहा था मैं अपने घर आया हुआ था. सबके साथ बैठकर खाना खाया, हंसी मजाक हुआ, और सब सो गए.
अगली सुबह अचानक से माहौल ही बदल गया, आज से ठीक 16 साल पहले का दृश्य, मैंने देखा मेरे पिता की आंखों में आसूं हैं, मेरे ताऊ जी उदास है, पूरे इलाके में सन्नाटा छा गया, उस वक्त इंटरनेट इतना तेज नही था जैसे आज है. टीवी खोला तो पता चला, राजनीति का सबसे बड़ा नाम दुनिया से अलविदा हो गया है. पूरा समाज एक ठहरे हुए पानी का जैसा हो गया. क्या पिछड़ा, क्या दलित, क्या मुसलमान मानों सबका अगुवा चला गया हो. चारों ओर आंखें अश्रुपूर्ण हैं, आस-पास किसी के घर में चाय तक नहीं बनी, पिताजी आपने सुबह से पानी तक नहीं पिया, ऐसा तो मैंने तब भी नही देखा था जब दादी माँ नही रहीं थीं. क्या यह शख्स माता-पिता से भी ज्यादा स्थान रखते हैं.
उस दिन जो मेरे पिता जी ने मुझसे कहा वह शब्द मेरे लिए जीवन परिवर्तक बनें.
पिता जी ने कहा, “बेटा राम, तुम मेरे पुत्र हो, मैंने तुम्हे चलना सिखाया है, तुम्हारे भरण-पोषण के लिए अपनी क्षमता अनुसार कार्य किया है, तुम्हे उच्च शिक्षा तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया है, तुम्हे याद है, जब तुम्हे विद्यालय में कुछ बच्चे परेशान करते थे, तब मैंने तुम्हे बताया था की जितना झुकोगे उतना सताए जाओगे अपने हक की लड़ाई तुम्हे खुद लड़नी पड़ेगी और तुम्हारे लिए मैं एक ढाल बनकर सदैव खड़ा हूं, ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि तुम मेरे पुत्र हो, मेरा अंश हो, मेरे बाद तुम्हे ही इस परिवार और आने वाली पीढ़ी को संभालना है, हमारे पुरखों के संघर्ष से प्राप्त धरोहर को बचाना है. परंतु आज जो शख्स दुनिया को अलविदा कह गया है, हम उसके पुत्र नही हैं, उसके अंश नही, उसके बावजूद भी उसने बाबासाहेब अंबेडकर की मृत्यु के बाद राजनैतिक अनाथ हुए समाज को एक पिता की पूर्ण भूमिका के तहत हमे संगठित कर हक और अधिकार के लिए संघर्ष के पथ पर चलना सिखाया, हमारे भरण-पोषण के लिए अच्छे रोजगार और शक्तियों के लिए सत्ता पर काबिज होना सिखाया, सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति के लिए बहुजन समाज पार्टी नामक मूवमेंट शुरू किया, शोषितों को खुशहाल जीवन का मार्ग दिखाया.”
जानते हो राम, हमारे पुरखे एक कहावत कहा करते थे जिसने काशी देख ली उसने दुनिया देख ली, आज जो शख्स गया है, उसका नाम काशीराम है, वो पूरी काशी का राम है मतलब पूरी दुनिया का राम है.
जब तुम्हारा जन्म हुआ, उस समय कांशीराम बामसेफ़, डीएस-4 नाम से एक संगठन चलाया करते थे. मेरी मुलाकात उसी समय हुई थी, एक मुलाकात में मानो उन्होंने पूरे समाज का आइना दिखा दिया हो, हर दर्द और तकलीफ वो समेटे हुए थे, हर दुख और परेशानी का समाधान लिए हुए थे, मैंने बाबासाहेब अम्बेडकर को तो नही देखा पर लग रहा था जैसे उनकी छवि सामने हों. उनके एक-एक शब्द में जैसे ऊर्जा हो, एक बेहतर भविष्य की कल्पना की आकृति नजर के सामने आ रही थी और फिर जब उन्हें मौका मिला तो उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश ने देखा सामाजिक परिवर्तन कैसे होता है, शोषित जब राज करता है, तो कैसे रैदास जी के उस कथन को चरितार्थ करता है जिसमें उन्होंने कहा था “ऐसा चाहूं राज मैं मिले सबन को अन्न, छोट बड़ो सब सम्बसे, रैदास रहे प्रसन्न.”
मैंने उसी वजह से तुम्हारा नाम राम रखा है, पूरी काशी का राम तो एक ही हो सकता है, पर तुम मेरे राम हो सकते हो, जिस तरह काशीराम ने पूरे समाज को नई रौशनी दी है, मैं आशा करता हूं, तुम भी उसी रास्ते पर चलकर कुछ अच्छा करोगे राम.
पिता जी की सब बातें सुनने के बाद मेरे मन में न कोई सवाल था, न कोई जवाब, अब तक तो मैं भी अवाक, तालाब के ठहरे हुए पानी की तरह हो गया था. बस एक बात थी मन में “और जानना है कांशीराम जी के बारे में,” जिसके जीवन का समाज में इतना प्रभाव हो यकीनन मुझे अभी उनके बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है.
फिर क्या था उन्हे और उनके विषय में और जानने के लिए मैने उनके द्वारा लिखी गई किताब “चमचा युग” को पढ़ना शुरू कर दिया. उन्होंने अपनी एक मात्र पुस्तक में बाबासाहेब अंबेडकर की उन किताबों का उल्लेख किया जिनसे उनका जीवन परिवर्तन हुआ.
अब तक मान्यवर कांशीराम साहेब का जीवन एवं मिशन का विचार मेरे दिल और दिमाग में घर कर चुके थे. परंतु, अभी मिशन को और गहनता से जानना बाकी रह गया था, फिर मैने अध्यन शुरू किया, बाबासाहेब की उन 5 किताबों जिसका वर्णन साहब ने “चमचा युग” में किया था.
यह पांचों किताबें मेरे दिल के आज भी बहुत करीब हैं.
- भारत में जातियाँ: उनका तन्त्र, उत्पत्ति और विकास (1916)
- जाति का विनाश (1936)
- श्री गांधी और अछूतों का उद्धार (1943)
- कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया (1945)
- राज्य और अल्पसंख्यक (1947)
मान्यवर कांशीराम साहब के विषय में जितना पढ़ा जितना जाना, उतना कम लगने लगा, धीरे-धीरे नौकरी का ख्याल मन से कब गायब हो गया पता ही नही लगा, अब तक मन यह फैंसला कर चुका था. अब मुझे अपनी बड़ी कॉरपोरेट नौकरी की तरफ मुड़कर नही देखना है, अपने पुरखों के इस आंदोलन में पुनः योगदान के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित करता हूं और नौकरी से इस्तीफा दे दिया.
फिर शुरू हुआ जीवन का नया अध्याय
बहुजन समाज पार्टी में नौकरी से पहले बूथ अध्यक्ष, सेक्टर अध्यक्ष, विधानसभा महासचिव, जिला महासचिव बनाया गया था. पार्टी ने जो जिम्मेदारी दी, वह ईमानदारी से निभाई थी. इस्तीफ़ा देने के बाद फिर से पार्टी में काम करने के दौरान एक दिन बहनजी ने मेरी ईमानदार कार्यशैली को देखते हुए मुझे बुंदेलखंड का प्रभारी बना दिया, और फिर 2 वर्ष पूर्व मुझ जैसे साधारण से व्यक्ति को राज्यसभा का सांसद बना दिया. यह सब बहुजन समाज पार्टी में ही संभव हैं, आज मैं इस बात का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि यदि मान्यवर कांशीराम साहब सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति के लिए बहुजन समाज पार्टी नामक आंदोलन, मिशन, मूवमेंट खड़ा न करते तो क्या सामाजिक परिवर्तन का विचार लिए दलित समाज का सामान्य व्यक्ति राज्यसभा के पटल तक पहुंचने की बात तक सोच सकता था?
मान्यवर कांशीराम साहब, आज आपको गए हुए 16 वर्षों से ज्यादा हो गए हैं परंतु आप सिर्फ भौतिक रूप से ही ओझल हुए हैं आपकी सिखायी हुई हर एक बात अटल सत्य की तरह हम सब के साथ है. आपका दिखाया हुआ हर रास्ता आज भी प्रासंगिक हैं. आप जीवित है हमारी स्मृतियों में, आप एक विचार के तौर पर आज भी जीवित हैं.
आपने राजनीति शास्त्र का सबसे बड़ा अध्याय लिख कर राजनीतिक गुरुओं को भी दंडवत होने पर मजबूर कर दिया.
मुझे याद है सत्याग्रह नामक अखबार के एक संपादक ने अपने लेख में लिखा था, ” कांशीराम : जिन्हे समझने में अटल बिहारी वाजपेई भी चूक गए थे” आपको जितना पढ़ा जाए, कम ही लगता है, साहब.
आज आपके चरणों में आपके द्वारा किए गए त्याग बलिदान और संघर्ष के लिए शत-शत नमन करता हूं.
जिस तरह महामना ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, पेरियार, शाहू जी महाराज के कार्यों से सदियों तक आने वाली पीढ़ियां लाभान्वित हुई हैं. वैसे ही आपके द्वारा किए गए कार्यों से सदियों तक आने वाली पीढ़ियां लाभान्वित होंगी.
आज आपकी पुण्यतिथि है, नम आंखों के साथ आपके चरणों में मस्तक रख रहा हूं, मान्यवर साहब.
(लेखक: रामजी गौतम, बसपा सासंद)

