23.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

फेमिनिज्म स्त्री का नही पुरुषों का चैप्टर है

यह फेमिनिज्म दरअसल पुरुष के पढ़ने का चैप्टर था जिस से कि स्त्री की सहजता की यात्रा प्राकृतिक रूप से आगे बढ़ती और सुंदर समाज का निर्माण होता! स्त्रियों का मूड स्विंग प्रकृति जनक होने के बावजूद यह व्यवस्था जनक अधिक है जिसे न व्यवस्था समझना चाहती है न पुरुष!

स्त्री अपनी प्रकृति से जूझती समस्त प्रकृति से सामंजस्य बैठाने की कशमकश में जीवन गुजार देती है. अपनी प्रकृति में उसकी शारीरिक बनावट और शरीर मे होने वाले बदलाव हैं. पुरुष को ऐसे बदलाव का सामना नही करना पड़ता. जैसे वह जन्म लेता है वैसे ही पेड के तने जैसे बढ़ता रहता है खड़ा रहता है और एक दिन गिर जाता है. स्त्री के अनेक झंझावात हैं जिनसे वह अकेली जूझती है. माँ या कोई अन्य मित्र स्त्री यदि स्त्री के साथ नही है तो यह अकेलापन उसके लिए अनेक तरह से त्रासद होता है.

इस पूरे झंझावात में किसी भी दौर में पुरूष उसका मित्र नही होता. चाहे स्त्री किसी भी उम्र के झंझावात झेल रही हो. भाई, पिता स्त्री झंझावातों के मित्र नही हैं. यहाँ तक कि पति भी इन झंझावातों का मित्र नही. जबकि वह स्त्री देह का मालिक करार दिया गया है!

स्त्री अपनी प्रकृति से जुदा नही हो सकती. यह प्रकृति ही स्त्री प्रकृति है, यह प्रकृति ही उसकी प्रकृति है. इस प्रकृति में अनेक पड़ाव हैं और हर पड़ाव की अपनी प्रकृति है जिसमे स्त्री को एकदम ढलना होता है और बाहरी प्रकृति बाहरी दुनिया से सामंजस्य बैठाए रखना पड़ता है. हर पड़ाव के अपने मूड स्विंग हैं जिन्हें स्त्री खुद ही मैनेज करती है. वह बाहरी दुनिया से ही नही लड़ रही होती मात्र, वह अपनी प्रकृति से भी लड़ रही होती है. स्त्री होना प्राकृतिक रूप से पुरुष होने से भिन्न है. यदि सामाजिक रूप से उसे भिन्न न समझा जाता तो वह अपनी प्रकृति सहज होकर जीत लेती और उस सहजता से एक अलग तरह की मनुष्यता का निर्माण होता.

फेमिनिज्म दरअसल पुरुष के समझने का चैप्टर है जिसे मजबूरन स्त्री का कोर्स बना दिया गया है. प्राकृतिक रूप से जैसी वह है उसके स्वाभाव को समझने की कोई स्कूलिंग पुरुष की नहीं की गयी है, तमाम स्कूलिंग रिवर्स हुई है कि जो बात पुरुष को समझानी थी वह स्त्री को मजबूरन समझायी गयी और रिवर्स स्कूलिंग का परिणाम हमारे सामने है! लड़की जैसे ही 12 साल की होती है मायें या साथ वाली स्त्रियां अतिरिक्त अलर्ट हो जाती हैं! लड़की में आ रहे बदलाव की वजह से वह अधिक चंचल हो जाती है, हमे सिखाया गया है कि मासिक शुरू होते ही लड़की की सेक्स इच्छाएं बढ़ने लगती हैं! 12 साल की लड़की जो अभी बचपन को भी ठीक ढंग से जी नहीं पायी, हमारी शिक्षाएं और लालन पालन उसे एकदम स्त्री में बदलने की ट्रैनिग में लग जाता है! 12 साल की लड़की अपने भाई पिता या कजिन के साथ सट कर भी बैठ जाए तो उसे अलग बैठने की हिदायते मिलनी शुरू हो जाती हैं! इसमें गलती स्त्री (मां) की नहीं है! स्त्री भी तो उसी समाज और माहौल से सीखी है! वह स्त्री भी तो लड़की थी किसी समय! उसने भी 12-14 बरस की उम्र में यौन दुर्भावनाएं झेली हैं! स्त्री क्यों नहीं बैठ सकती आपके पास, क्योंकि उसे पुरुष पर विश्वास नहीं है और पुरुष को यह नहीं सिखाया गया है कि मासिक धर्म शुरू होने के बाद स्त्री में जो चंचलता है वह सेक्स निमंत्रण नहीं होता, बल्कि उतनी सी बच्ची को सेक्स के मायने भी पता न होते अगर यह समाज इतना संकीर्ण और असहज न होता!

स्त्री जैसे-जैसे बढ़ती है उसे अपने ही मूड के साथ नूरा कुश्ती करनी पड़ती है! स्त्रियों की आम शिकायत है कि उन्हें पुरुष समझ नहीं पाते और एक मूढ़ कहावत फिजाओं में तैरने लगी है कि स्त्री को तो खुद ईश्वर नहीं समझ पाए, आम आदमी की क्या बिसात! मुझे लगता है स्त्री को समझना सबसे आसान है, पुरुष उसे उसकी प्रकृति के हिसाब से अगर समझे, वह अपनी प्रकृति के हिसाब से जब सब हिसाब लगाता है तब वह स्त्री प्रकृति के खिलाफ चल रहा होता है!

यह समाज स्त्री प्रकृति के उलट रचा गया समाज है क्योंकि उसकी रचना में स्त्री का कहीं कोई रोल नहीं रहा! इस पूरे समाज को पुरुष ने रचा क्योंकि धर्म, ग्रन्थ, शास्त्र सब उसी के हाथ थे, और वह स्त्री प्रकृति को नहीं जानता था! श्री कृष्ण ने पुरुष द्वन्द्वो की गीता तो कह डाली लेकिन स्त्री द्वन्द्वो पर एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं जिसे पुरुष पढ़ कर स्त्री को समझ सके! धर्म ग्रन्थ भी स्त्री को बाऊंड करने के ग्रन्थ हैं जो खुद स्त्री से डरे हुए प्रतीत होते हैं! वे स्त्री के सहज मित्र नहीं बन सके और परिणाम हमारे सामने है कि स्त्री और पुरुष सहज मित्र नहीं हैं! वे जरूरतों के लिए जुड़े हुए प्रतीत होते हैं, स्वाभाविकता से जुड़े हुए प्रतीत नहीं होते!

कोई भी व्यवस्था जब किसी जीव के रिवर्स होती है तो उसे अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए उसी व्यवस्था को आत्मसात करना पड़ता है और वह व्यवस्था क्योंकि उसके खिलाफ होती है. इसलिए यह संभव नहीं कि उसे हमेशा जीया जा सके! इस व्यवस्था में स्त्री घुट रही है, आत्मसात करने के दो परिणाम सामने आये, एक तो स्त्री घुटने लगी और बीमार होती गयी, आंकड़े बताते हैं कि व्यवस्था, मेडिकल, समाज और धर्म पुरुष आधारित होने की वजह से मुल्क की 40 साल औसत की अस्सी प्रतिशत महिलाएं बीमार हैं! यकीन मानिये हर घर की महिला बीमार है लेकिन वह अपनी बीमारी से भी वैसे ही जूझ लेती है जैसे वह अपनी प्रकृति जूझती है! पुरुष उसकी बीमारी के प्रति भी संजीदा नहीं है! वहीँ यदि पुरुष को हल्का सर दर्द भी हो तो स्त्री काम से छुट्टी लेकर पुरुष के सिरहाने बैठ जाती है! यह स्त्री और पुरुष की प्रकृति का फर्क है! पुरुष को बस इतना सा फेमिनिज्म समझना था जो वह नहीं समझा क्योंकि पुरुष के लिए स्त्री जैसी कोई स्कूलिंग किसी भी स्तर पर नहीं है!

रिवर्स व्यवस्था होने का दूसरा परिणाम यह हुआ कि जागरूकता के जमाने में स्त्री अपने लिए स्पेस मांगने लगी है! अपने लिए स्पेस का अर्थ सिर्फ यही है कि वह अपनी प्रकृति के साथ जीना चाहती है! और पुरुष यदि उस प्रकृति में बाधा बनता है तो वह पुरुष से संघर्ष करने का रास्ता चुनती है, यही फेमिनिज्म है जिसका विस्तार विश्वविद्यालयों में हो रहा है और फेमिनिज्म के कुछ सहायक शब्द विकसित होते हुए फेमिनिज्म का विशाल शब्दकोश निर्मित हो गया है! यह फेमिनिज्म दरअसल पुरुष के पढ़ने का चैप्टर था जिस से कि स्त्री की सहजता की यात्रा प्राकृतिक रूप से आगे बढ़ती और सुंदर समाज का निर्माण होता! स्त्रियों का मूड स्विंग प्रकृति जनक होने के बावजूद यह व्यवस्था जनक अधिक है जिसे न व्यवस्था समझना चाहती है न पुरुष! और यह सिर्फ मनुष्यों में ही है कि स्त्री की यह समाज उतनी वैल्यू नहीं करता जितनी पुरुष की करता है अन्यथा हम बाकी किसी फीमेल जीव की वैल्यू मेल से अधिक ही करते हैं! और बाकी किसी फीमेल जीव में मूड स्विंग स्त्री के मूड स्विंग से कम होता है क्योंकि वह प्राकृतिक रूप से सहज जीवन जीती हैं! पुरुष पर यदि इतनी सामजिक बंदिशे डाल दी जाएँ तो यकीनन पुरुष का विद्रोह अत्यधिक विद्रूप होगा! सहजता दरअसल हर जीव का हक़ है, यही आज़ादी है! स्त्री को असहज जीवन दे कर रिवर्स व्यवस्था में हम स्त्री से क्या हासिल कर लेंगे यह समाज को समझना चाहिए और बदलाव रूप में अपने बेटों को स्त्री का दोस्त होने की शिक्षा देनी चाहिए! स्कूल में पढ़ाई में स्त्री होने का मर्म पढ़ाया जाए और घर में पुरुष संजीदा हों तो हमारी बेटियों को हम सहज सुरक्षित जीवन दे सकते हैं! उनका स्पेस उन्हें देने की पहल पुरुष को करनी होगी, स्त्री हमारी शानदार जीवन सहयोगी है, लेकिन उसका अपना स्पेस है उस पर हम पुरुष काबिज हैं यही फेमिनिज्म है जो हम पुरुष जान कर भी नहीं जान रहे! मुझे यह भी लगता है कि स्त्री को समझने के लिए विज्ञान को जरुरी रूप में अध्ययन में शामिल कर लेना चाहिए और धर्म ग्रंथों की नजर से स्त्री को समझना अब छोड़ देना चाहिए!

(लेखक: वीरेंदर भाटिया; ये लेखक के अपने विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...