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Friday, January 9, 2026

धर्मांतरण का संनाद: दलित समाज की सुरक्षा और शक्ति

भारतीय समाज की गहन खोज एक मार्मिक सत्य को उद्घाटित करती है, मानो समय की गहराइयों से एक करुण पुकार उभरती हो—दलित समुदाय, जो अन्य समुदायों को पीछे छोड़ता हुआ, राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक समृद्धि के शिखर की तरफ त्वरित तीव्र वेग से गतिमान है, फिर भी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सुरक्षा के आलोक से वंचित, अंधेरे की गहन खाई में भटक रहा है। महामानव बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस गूढ़ सत्य को युगों पहले अपनी दूरदर्शी दृष्टि से हृदयंगम कर लिया था। उन्होंने दलितों के समग्र संरक्षण और सम्मानजनक जीवन की सिद्धि के लिए एक स्वायत्त धार्मिक पहचान (बौद्ध धम्म) को जीवन की सांस माना, जो उनके अस्तित्व को नवजीवन दे सके। जनगणना 2011 का दर्पण इस सत्य को और प्रखरता से उजागर करता है। भारत की धरती पर मुस्लिम जनसंख्या लगभग 19 करोड़, सिख 2.08 करोड़, जैन 44.51 लाख, पारसी 57,264, ईसाई 2.78 करोड़ और बौद्ध 85 लाख के आसपास सांस लेते हैं। ये समुदाय, संख्याबल में दलितों से कोसों पीछे, फिर भी अपने सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में एक अनुपम सुरक्षा और स्थिरता का चंद्रप्रकाश पाते हैं, जबकि दलित समाज, राजनीतिक शक्ति, शैक्षणिक उन्नति और सामूहिक आर्थिक समृद्धि के सूर्य से सुसज्जित होते हुए भी असुरक्षा की छाया में डूबा हुआ है।

क्या कभी वह करुण नाद कानों तक पहुंचा, जिसमें सिख, जैन, मुस्लिम, पारसी या ईसाई समुदाय की बहन-बेटियों पर सामूहिक दुष्कर्म या छेड़खानी की घटनाएं सामान्य हों? नहीं, यह एक दुर्लभ, मंद गूंज मात्र है, जो हवा में खो जाती है। इसके विपरीत, दलित समाज की बहन-बेटियां, मानो असुरक्षा की लहरों में डूबती-उतराती हों, हर दो घंटे में शारीरिक शोषण और हर घंटे में किसी न किसी अत्याचार की काली छाया का शिकार होती हैं। यह विडंबना तब और गहन, हृदयविदारक हो उठती है, जब हम देखते हैं कि दलित समाज राजनीतिक आकाश में सशक्त तारों-सा चमकता है, सरकारी तंत्र में उसकी सहभागिता का प्रकाश अन्य समुदायों को मात देता है, और सामूहिक आर्थिक समृद्धि की धारा भी अपेक्षाकृत प्रबल बहती है। फिर भी, उनकी बहन-बेटियां असुरक्षा के गहन सागर में क्यों डूब रही हैं? इस प्रश्न का उत्तर, मानो एक प्राचीन ऋचा, एकमात्र सत्य में गूंजता है—सांस्कृतिक (सामाजिक और धार्मिक) पहचान का अभाव, जो उनके अस्तित्व को अंधेरे की गहराई में धकेल देता है।

मुस्लिम समुदाय को एक दीपस्तंभ-सा देखें, जो तूफानों में भी अडिग खड़ा है। आज भारत में मुस्लिमों को प्रायः संकटग्रस्त चित्रित किया जाता है, उनके विरुद्ध अत्याचार की कथाएं हवा में तैरती हैं, मानो बादल छाये हों। किंतु, उनकी राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सरकारी तंत्र में उपस्थिति दलितों की प्रबल धारा के समक्ष मंद पड़ती है, फिर भी उनकी बहन-बेटियों पर सामूहिक दुष्कर्म जैसी घटनाएं एक दुर्लभ, क्षीण छाया-सी हैं। इसका रहस्य उनकी स्वायत्त सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान में निहित है—एक ऐसा आलोक, जो उन्हें सुरक्षा का कवच, शक्ति का आधार और आत्मसम्मान का अमृत प्रदान करता है। 

दूसरी ओर, दलित समाज, जो हजारों विधायकों, सैकड़ों सांसदों और लाखों अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ एक विशाल, सशक्त नदी-सा बहता है, फिर भी अपनी स्वायत्त सांस्कृतिक (सामाजिक एवं धार्मिक) पहचान से रिक्त, असहाय-सा डगमगाता है। दलितों की कोई स्वतंत्र धार्मिक-सांस्कृतिक धारा नहीं, और यही वह गहन अंधेरा है, जो उनकी असुरक्षा और उन पर हो रहे अत्याचारों की जड़ में सांस लेता है। 

सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, पारसी और ईसाई समुदाय, अपनी स्वतंत्र धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के चंद्रप्रकाश में आलोकित, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का अमृत पीते हैं, भले ही उनकी जनसंख्या का तारा मंद चमके। इसके विपरीत, दलित समाज, सांस्कृतिक (सामाजिक एवं धार्मिक) पहचान के अभाव में, अत्याचारों की उफनती लहरों से जूझता, कराहता रहता है। यही वह गहन घाटी थी, जिसे बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने अपनी दूरदर्शी दृष्टि से पहचाना और दलितों को बौद्ध धम्म में धर्मांतरण का आलोकमय पथ दिखाया। मान्यवर साहेब जी ने बौद्ध धम्म को दलित मुक्ति की अजस्र धारा माना, और बहनजी ने अपनी सरकार के दौरान बौद्ध स्मारकों के दीपों से दलितों को एक नवीन, गौरवमयी पहचान का आलोक देने का सार्थक प्रयास किया।

यह सत्य, मानो एक प्राचीन कथा, एक घर के चार झगड़ते भाइयों के दृष्टांत-सा हृदय में उतरता है। जब तक चारों झगड़ते भाई एक ही छत के नीचे सांस लेते हैं, कलह और असमानता की काली छाया उनके बीच मंडराती, उन्हें बांटती रहती है। किंतु, जैसे ही वे पृथक होकर अपनी स्वतंत्र पहचान की धारा बहाते हैं, संतुलन और सामंजस्य का सूर्य उनके जीवन को आलोकित कर देता है। ठीक उसी भांति, दलित समाज को ब्राह्मणवादी व्यवस्था की दमघोंटू छाया से मुक्त होकर अपनी स्वायत्त सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का सृजन करना होगा। यह पहचान, एक अभेद्य कवच-सी, उनकी बहन-बेटियों की सुरक्षा को अटल करेगी, और उन्हें मान-सम्मान, स्वाभिमान और शांति का स्वर्णिम आलोक देगी, मानो एक नवीन सूर्योदय उनके जीवन को प्रज्वलित करे। दलितों का बौद्ध धम्म में धर्मांतरण, भारत के राष्ट्र निर्माण की विशाल नदी में एक प्रबल, प्रखर एवं अतिमहत्वपूर्ण सहयोगी, पावन धारा बन, समृद्धि और गौरव का संनाद करेगा।

अतः, दलित समाज के लिए बौद्ध धम्म में धर्मांतरण केवल एक धार्मिक कदम नहीं, अपितु सामाजिक और सांस्कृतिक मुक्ति की एक आलोकमय यात्रा है। यह वह अटल नींव है, जो उन्हें न्याय, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और वैज्ञानिकता की पवित्र धारा पर आधारित एक मानवीय समाज की सृष्टि की ओर ले जाएगी। दलितों की सच्ची मुक्ति का सूर्य तभी उदित होगा, जब वे अपनी स्वायत्त सांस्कृतिक सत्ता का दीप प्रज्वलित करेंगे, और ब्राह्मणवादी गुलामी की जंजीरों को तोड़, मुक्त आकाश में स्वाभिमान के पंखों से विहार करेंगे। यही वह गहन, आलोकित पथ (बौद्ध धम्म) है, जो भारत के दलितों को सच्चे अर्थों में मानवता, सम्मान और समृद्धि के उज्ज्वल, अनंत क्षितिज की ओर ले जाएगा।

(01.06.2025)


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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