बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।
गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥
अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।
रागञ्चप दोसञ्चस पहाय मोहं, सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो।
अनुपादियानो इध वा हुरं वा, स भागवा सामञ्ञमस्स होति॥ (धम्मपद, यमकवग्ग, 19-20)
तथागत का उपदेश अत्यंत स्पष्ट है. जो व्यक्ति शास्त्रों का बहुत पाठ करता है, बहुत बोलता है, किंतु स्वयं प्रमाद में डूबा रहता है और धर्मानुसार आचरण नहीं करता, वह केवल शब्दों का भार ढोता है. वह उस ग्वाले के समान है जो दूसरों की गायें गिनता है, पर स्वयं दूध से वंचित रहता है. ऐसे व्यक्ति का श्रमणत्व/ भगवत् पद केवल नाम मात्र का होता है, वह वास्तविक साधना का भागीदार नहीं बनता.
इसके विपरीत, जो व्यक्ति शास्त्रों का थोड़ा ही उच्चारण करता है, किंतु धर्म के अनुरूप जीवन जीता है, राग, द्वेष और मोह का परित्याग करता है, सम्यक् प्रज्ञा से युक्त होकर चिंतारहित चित्त में स्थित रहता है और इहलोक तथा परलोक दोनों के प्रति आसक्ति से मुक्त होता है, वही वास्तव में श्रमणत्व/ भगवत् पद का अधिकारी है. उसके लिए धर्म वाणी नहीं, जीवित अनुभव बन जाता है.
इसलिए आवश्यक है कि हम केवल बोलने में न रुक जाएँ। बुद्ध-वचनों को जीवन में स्थान देना आरंभ करें, उन्हें अभ्यास और अनुशासन के माध्यम से आत्मसात करें। तथागत का प्रकाश तभी प्रभावी होता है, जब वह आचरण में उतरता है। वही प्रकाश अज्ञान में उलझी हुई जनता को प्रज्ञा की दिशा में संचरित करता है।
इसी संदर्भ में वियतनाम के वज्रयान परंपरा के आचार्य थिनले गुयेन थान का 10 जनवरी 2017 को फुओक थान ग्राम में दिया गया वक्तव्य विचारणीय है. उन्होंने कहा था कि जो लोग उच्च उत्साह के साथ आध्यात्मिक अनुसंधान की गहराइयों में उतरते हैं, वे बौद्ध परंपरा में विद्वान कहे जाते हैं. वे सिद्धांतों का विश्लेषण करते हैं, ग्रंथों का अनुवाद करते हैं, शोध लेखन करते हैं और नए दृष्टिकोण खोजते हैं. किंतु स्थिति तब दयनीय हो जाती है, जब प्रसिद्धि प्राप्त होने के बाद कुछ विद्वान अभिमान में डूब जाते हैं और अपने विचारों को इस प्रकार महिमामंडित करने लगते हैं, मानो वही ब्रह्मांड का केंद्र हों.
ऐसे विद्वानों की सबसे बड़ी दुर्बलता यह होती है कि वे अपने समकक्ष या उनसे अधिक सक्षम साथियों के प्रति ईर्ष्या और जलन का भाव पाल लेते हैं. जैसे ही आलोचना या उपेक्षापूर्ण वाणी का अवसर मिलता है, ये नकारात्मक प्रवृत्तियाँ संघर्ष का रूप ले लेती हैं. उनके इस व्यवहार के मूल में दो प्रकार की आसक्तियाँ कार्य करती हैं – स्वयं के प्रति आसक्ति और धर्म के प्रति आसक्ति.
यही दो दोष अनेक बौद्ध विद्वानों को प्रज्ञाज्ञानयुक्त मुक्ति से वंचित रखते हैं. इसका कारण यह है कि उन्होंने आरंभ से ही धर्म के सम्यक् मार्ग का अनुसरण नहीं किया. इसके विपरीत, एक साधारण व्यक्ति भी यदि सम्यक् मार्ग के अनुसार साधना को विकसित करता है, तो वह या तो इसी जीवन में मुक्त होगा अथवा भविष्य में मुक्ति का कारण बनेगा. वहीं कोई असाधारण प्रतिभा वाला व्यक्ति भी यदि धर्म के विपरीत चलता है, तो वह मुक्त नहीं होगा, बल्कि भवचक्र में पुनर्जन्म को ही पुष्ट करता रहेगा.
यह स्थिति इस तथ्य से स्पष्ट होती है कि ऐसे विद्वानों को साधना के अभ्यास से उत्पन्न अनुभव का बोध नहीं होता. वे तीक्ष्ण तर्कों के साथ किसी भी बौद्ध ग्रंथ का उद्धरण दे सकते हैं, किंतु जब उनसे अभ्यास से प्राप्त ज्ञान और प्रत्यक्ष अनुभूति के विषय में पूछा जाता है, तो वे स्वयं भ्रम में पड़े दिखाई देते हैं.
धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है। बोलना सरल है, जीना कठिन. तथागत का पथ वही है, जहाँ वाणी मौन में विलीन हो जाए और जीवन स्वयं उपदेश बन जाए.
(लेखक: विकास सिंह, ये लेखक के अपने विचार हैं)

