13.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

ओपिनियन: दलित छात्रा की मौत और संस्थागत असंवेदनशीलता: एक सन्नाटा जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरता है

दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों के भीतर एक बार फिर वह खामोशी गूंज उठी है, जो हर उस छात्र के दिल में बसी है, जो वंचित, हाशिए पर पले समाज से निकलकर ऊँचे सपनों के साथ इस तथाकथित ज्ञान के मंदिर में कदम रखता है। वह खामोशी सिर्फ एक मृत्यु की नहीं है वह उन अनकहे आहों की आवाज़ है, जो वर्षों से इन संस्थानों के गलियारों में भटकती आई हैं, पर जिन्हें सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।

19 वर्षीय दलित छात्रा की आत्महत्या की खबर एक साधारण समाचार की तरह आई और चली गई।
पर यह कोई ‘एक घटना’ नहीं थी, यह उस गहरे संस्थागत अन्याय, असंवेदनशीलता और जातिगत संरचना का पर्दाफाश करती है, जो आज भी हमारे शैक्षणिक संस्थानों की नींव में छिपी हुई है।

यह छात्रा देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की थी एक ऐसी जगह, जहाँ पहुँचने के लिए उसने न जाने कितने संघर्ष झेले होंगे, कितनी उम्मीदें बुनी होंगी, और कितनी बार अपने परिवार की आँखों में उस सपने की चमक देखी होगी, जो “शिक्षा से सम्मान” का प्रतीक माना गया था। लेकिन दिल्ली की चकाचौंध, जिसे अक्सर “अवसरों का शहर” कहा जाता है, वहीं उसकी ज़िंदगी का सबसे अंधेरा मोड़ बन गई। वह गोविंदपुरी के एक छोटे से किराए के कमरे में रहती थी, एक कमरा जो शायद उसके लिए “घर” नहीं, बल्कि “संघर्ष का ठिकाना” था। वहीं से उसकी निर्जीव देह मिली एक ऐसी देह, जो समाज की ठंडी व्यवस्था से हार गई, पर अपने दर्द की कहानी छोड़ गई। वह केवल किसी की बहन नहीं थी, वह उस समुदाय की बेटी थी, जो सदियों से संघर्ष, अपमान और असमानता की परतों में घिरा हुआ है; जिसके बच्चों को आज भी बराबरी के हक के लिए लड़ना पड़ता है, जिसकी बेटियों को आज भी संवेदनशीलता की जगह तिरस्कार और अविश्वास का सामना करना पड़ता है। वह बेटी सिर्फ खुद के लिए नहीं लड़ी थी। वह हर उस दलित छात्रा का प्रतीक थी, जो शिक्षा को अपनी मुक्ति का रास्ता समझती है, पर अंततः उसी शिक्षा व्यवस्था में अपमान, अलगाव और मानसिक यातना का शिकार बन जाती है। उसकी मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी जगहें सच में “समानता और स्वतंत्रता” का प्रतीक हैं? या फिर यहाँ भी वे अदृश्य दीवारें खड़ी हैं, जो जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति के आधार पर छात्रों को बाँट देती हैं?

उसके कमरे की दीवारें शायद अब भी उस सन्नाटे की गवाह होंगी, जिसमें एक छात्रा ने अंतिम साँस लेने से पहले यह महसूस किया होगा कि इस व्यवस्था में उसके लिए कोई जगह नहीं बची। और यह सन्नाटा केवल उसकी मृत्यु का नहीं, बल्कि उस प्रणाली के पतन का है, जो हर बार संवेदना से अधिक औपचारिकता को प्राथमिकता देती है।

यह छात्रा JNU छात्रसंघ (JNUSU) के president पद के उम्मीदवार राज रतन राजोरिया की बहन थी, और उसकी मृत्यु ने न केवल एक परिवार को तोड़ दिया, बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों के भीतर छिपी उस व्यवस्थागत असंवेदनशीलता को भी उजागर कर दिया, जो आज भी वंचित तबके के छात्रों को मानसिक और सामाजिक रूप से तोड़ती है।

BAPSA के आरोप — संस्थागत असंवेदनशीलता की परतें

बहुजन छात्र संगठन BAPSA (Birsa Ambedkar Phule Students’ Association) ने इस घटना को एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक संस्थागत विफलता (Institutional Failure) बताया।
संगठन ने कहा कि —

  1. दिल्ली विश्वविद्यालय की संस्थागत लापरवाही (Institutional Apathy), और
  2. पुलिस की प्रक्रियागत चूक (Procedural Lapses)
    इस दुखद घटना के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं।
    उनके अनुसार, यह घटना यह दिखाती है कि विश्वविद्यालयों में दलित और वंचित वर्गों के छात्र अब भी मानसिक स्वास्थ्य सहायता, संवेदनशील वातावरण और समान अवसरों से वंचित हैं। जातिगत भेदभाव का बोझ उनके मनोबल को हर दिन तोड़ता है।

पुलिस की लापरवाही — मानवीयता का अभाव

घटना स्थल पर जब पुलिस पहुँची, तब कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। परिवार ने डॉक्टर बुलाने की अपील की, पर पुलिस ने ठंडे लहजे में कहा — “अब बहुत देर हो चुकी है।” पुलिस ने मृतका के भाई से ही कहा कि वह उसकी धड़कन जांचे, और फिर मौखिक रूप से उसे मृत घोषित कर दिया गया।

ऐसा अमानवीय व्यवहार न केवल एक परिवार के दर्द का अपमान है, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा भी दिखाता है, जो दलित पीड़ा को हमेशा औपचारिकता में समेट देती है।

शव का प्रबंधन — संवेदना की कमी

अगले दिन शव परिवार को सौंप दिया गया, और वे मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में अंतिम संस्कार के लिए रवाना हुए। परंतु इस पूरी प्रक्रिया में भी पुलिस और प्रशासन ने मानवीय गरिमा का पालन नहीं किया।

राज रतन राजोरिया की स्थिति — एक भाई, एक उम्मीदवार

जिस दिन यह हादसा हुआ, उसी दिन राज रतन राजोरिया को JNU में president पद के लिए अपना भाषण देना था। लेकिन बहन की मौत की खबर ने सबकुछ थाम दिया। हालाँकि JNU के सभी संगठनों और उम्मीदवारों ने एक स्वर में संवेदना व्यक्त करते हुए डिबेट स्थगित (Postpone) कर दी, यह उस छात्र एकता का प्रमाण था, जो वर्ग और विचारधारा से परे जाकर मानवता की पुकार को सुनती है।

महिला पुलिसकर्मी की अनुपस्थिति — प्रक्रिया का उल्लंघन

आगे राज रतन राजोरिया ने यह भी आरोप लगाया कि पूरी पुलिस टीम में कोई महिला अधिकारी मौजूद नहीं थी। सिर्फ एक महिला, वो भी क्राइम डिपार्टमेंट से, सबूत जुटाने के लिए आई थी।

यह न केवल कानूनी प्रक्रिया की अवहेलना थी, बल्कि महिला सुरक्षा और संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न उठाती है। उन्होंने आगे बताया कि शव छठी मंज़िल पर था, पर न कोई पर्याप्त स्टाफ था, न स्ट्रेचर। सीढ़ियाँ तंग थीं, व्यवस्था लाचार। आख़िरकार, शव को कंबल में लपेटकर नीचे लाना पड़ा। यह दृश्य न केवल दर्दनाक था, बल्कि इस देश के “समानता के मंदिर” की असलियत उजागर करता था। यह व्यवस्था की क्रूरता को स्पष्ट दिखाता है।

विश्वविद्यालय की असमान नीतियाँ

BAPSA ने दिल्ली विश्वविद्यालय की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय में सिर्फ 0.71% से 1% छात्रों को ही होस्टल सुविधा मिलती है।
बाकी वंचित वर्ग के छात्र महंगे, असुरक्षित किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं, जहाँ सुरक्षा, मानसिक सहयोग और स्थायित्व का अभाव है। उच्च फीस, इंटरव्यू-आधारित चयन और “लोकल गार्जियन” की अनिवार्यता ये सभी नीतियाँ गरीब और वंचित छात्रों को हाशिये पर धकेलती हैं।

एक मौत, कई सवाल…

यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि संस्थागत उपेक्षा (Institutional Apathy) का परिणाम है।
यह उस तंत्र की असफलता की कहानी है, जो हर बार कहता है — “सब बराबर हैं”,
पर व्यवहार में हर दलित, हर गरीब, हर वंचित छात्र को “कमतर” महसूस कराता है। पुलिस की असंवेदनशीलता, विश्वविद्यालय की खामोशी और प्रशासन की उदासीनता
तीनों ने मिलकर एक और सपने को दफन कर दिया।
यह घटना सवाल छोड़ती है कि कब तक “समानता” सिर्फ संविधान की किताबों में रहेगी? और कब एक दलित छात्रा बिना डर और भेदभाव के सिर्फ “छात्रा” बनकर जी सकेगी?

संवेदनशीलता बनाम जातिवादी तंत्र

राज रतन राजोरिया, जो जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में president पद के उम्मीदवार थे, उसी दिन अपनी बहन की मृत्यु की खबर पाकर टूट गए। जेएनयू के अन्य संगठनों ने एकजुटता दिखाते हुए डिबेट स्थगित कर दी यह कदम छात्र राजनीति में मानवीय संवेदना का दुर्लभ उदाहरण था।
लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि क्यों हर बार दलित छात्र ही तंत्र की उदासीनता का शिकार होते हैं?
राष्ट्र निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने चेताया था —
“जाति एक मानसिक अवस्था है, जो समानता के विचार को नष्ट कर देती है।”

आज भी वही मानसिक अवस्था विश्वविद्यालयों की नीतियों, प्रशासनिक व्यवहार और छात्र-जीवन की वास्तविकताओं में दिखाई देती है।

मानसिक स्वास्थ्य और असमानता

शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र (Counselling Centres) मौजूद हैं,
परंतु दलित और वंचित समुदायों के छात्रों के लिए वे अक्सर अप्रवेशनीय और असुरक्षित बन जाते हैं।
कई बार शिक्षक, प्रशासक या काउंसलर भी अनजाने में जातिगत पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं, जिससे पीड़ित छात्र और अधिक अलगाव महसूस करता है। यह सामाजिक बहिष्करण मनोवैज्ञानिक हिंसा में बदल जाता है, और अंततः कई छात्र अवसाद, आत्महत्या या आत्म-निराशा की ओर धकेले जाते हैं।

यह सवाल केवल मौत का नहीं, तंत्र की सोच का है।
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या विश्वविद्यालय केवल ‘योग्य’ और ‘सुविधासंपन्न’ वर्ग के लिए बने हैं? क्या दलित छात्रों के लिए अब भी “बराबरी का माहौल” सिर्फ संविधान के पन्नों में सीमित है?
और क्या पुलिस और प्रशासन की संवेदनशीलता सिर्फ कागजों तक सीमित है?

एक नई सामाजिक चेतना की आवश्यकता
यदि वास्तव में भारत को एक समतामूलक राष्ट्र बनना है, तो शिक्षा संस्थानों से शुरुआत करनी होगी।
जरूरत है —

  1. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभ व्यवस्था,
  2. सस्ती और सुरक्षित छात्रावास सुविधाएँ,
  3. संवेदनशील प्रशासनिक प्रशिक्षण,
  4. और जाति पर आधारित भेदभाव की सख्त निगरानी।
    जैसा कि सामाजिक परिवर्तन की महानायिका बहन कुमारी मायावती जी ने कहा था —
    “सच्चा लोकतंत्र तभी संभव है, जब समाज के सबसे नीचे बैठे व्यक्ति को भी बराबरी और सम्मान का हक मिले।”

अंत में बस यही कहना चाहूँगी कि यह मृत्यु सिर्फ एक छात्रा की नहीं, बल्कि उस उम्मीद की है, जो हर दलित बच्चा लेकर विश्वविद्यालयों की चौखट पार करता है
कि शायद यहाँ उसे बराबरी मिलेगी। लेकिन जब व्यवस्था ही पक्षपाती हो, तो शिक्षा भी अधूरी रह जाती है।
आज जरूरत है कि समाज, सरकार, विश्वविद्यालय और हर संवेदनशील नागरिक इस सन्नाटे को सुनें क्योंकि हर बार जो मरता है, वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होता,
बल्कि एक सपना होता है, जो समता की राह देखता था।

(लेखक: दीपशिखा इंद्रा, सोशल एक्टिविस्ट)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...