12.7 C
New Delhi
Friday, January 9, 2026

जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी: जातिगत जनगणना पर बहुजन विचारधारा की विजयगाथा

भारत की राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण आया है-जिसे बहुजन आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक जीत के रूप में देखा जा सकता है. कैबिनेट ने “जातिगत जनगणना” को हरी झंडी दे दी है, वह जनगणना जिसकी माँग बहुजन समाज ने दशकों से की थी. लेकिन इस जीत का असली श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह हैं बहुजन आंदोलन के पथप्रदर्शक, मान्यवर श्री कांशीराम साहब और भारत की राजनीति में आत्म-सम्मान की प्रतिमूर्ति, आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी.

जातिगत जनगणना: बहुजन चेतना की पुनर्स्थापना

“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी”-यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में बहुजन समाज की हिस्सेदारी की माँग थी. यह माँग तब उठी जब बहुजन समाज हाशिये पर खड़ा था, संसाधनों से वंचित था, और सत्ता से बहिष्कृत था.

आज जब सरकार ने इस ऐतिहासिक माँग को स्वीकार किया है, तो यह स्पष्ट है कि राजनीति की धुरी अब उन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मान्यवर कांशीराम साहब ने सबसे पहले उठाए थे.

आदरणीय बहन जी: सिद्धांत से सत्ता तक

आदरणीय बहन मायावती जी, जिन्होंने मान्यवर साहब के आंदोलन को न केवल संभाला बल्कि उसे सत्ता तक पहुँचाया, वह इस जनगणना के संघर्ष की साक्षात साक्षी रही हैं. उन्होंने बार-बार संसद से लेकर सड़कों तक, इस बात को उठाया कि जब तक बहुजन की सटीक गिनती नहीं होगी, तब तक सामाजिक न्याय केवल भाषणों तक सीमित रहेगा.

यह उनकी ही नेतृत्व शक्ति का परिणाम है कि आज पूरा राजनीतिक विमर्श बहुजन मुद्दों पर केंद्रित हो चुका है.

विचारों की चोरी और नकल: मगर रोशनी ‘ओरिजनल’ की ही चमकती है

आज कुछ राजनीतिक दल “जितनी आबादी, उतना हक” जैसे नारे दे रहे हैं, और कोई बहुजन को “PDA” जैसे नए नामों में बाँध रहा है. लेकिन यह बात इतिहास ने साबित कर दी है-“ओरिजनल का अपना ही प्रकाश होता है, और उस प्रकाश से उजाला चुराकर भी, असली को चुनौती नहीं दी जा सकती.”

मान्यवर कांशीराम साहब ने जो कहा, जो जिया, और जो संगठित किया-वह आज भारत की राजनीति का केंद्रबिंदु बन चुका है.

बहुजन आंदोलन: जोश, सोच और सिद्धांत

यह निर्णय केवल कागज पर एक नीति नहीं है, यह बहुजन समाज की आत्मा की जीत है. यह उस संघर्ष की जीत है जो दशकों तक बहनजी ने बिना थके, बिना झुके, पूरी निष्ठा से लड़ा.

यह बहुजन समाज को वह मनोबल देता है, जिससे अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी कह सके-अब मेरा भी समय आएगा.

कांशीराम साहब और बहनजी: एक विचार, एक मिशन

मान्यवर कांशीराम साहब और आदरणीय बहन मायावती जी केवल नेता नहीं हैं, वे एक सिद्धांत, एक संघर्ष की गाथा, और एक जनक्रांति के स्तंभ हैं.

आज जब भारत में जातिगत जनगणना को स्वीकृति मिली है, तो वह केवल एक सरकारी निर्णय नहीं, बल्कि इन दोनों महापुरुषों के संघर्ष की वैचारिक विजय है.

इतिहास उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति के शिल्पकार के रूप में याद करेगा.

(लेखक: स्वतंत्र लेखनी, संपादन जीपी गौतम, ये लेखक के अपने विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...

ओपिनियन: दलित छात्रा की मौत और संस्थागत असंवेदनशीलता: एक सन्नाटा जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोरता है

दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों के भीतर एक बार फिर वह खामोशी गूंज उठी है, जो हर उस छात्र के दिल में बसी है, जो...

Opinion: समाजिक परिवर्तन के साहेब – मान्यवर कांशीराम

भारतीय समाज सहस्राब्दी से वर्ण व्यवस्था में बंटा है. लिखित इतिहास का कोई पन्ना उठा लें, आपको वर्ण मिल जायेगा. ‌चाहे वह वेद-पुराण हो...

एससी, एसटी और ओबीसी का उपवर्गीकरण- दस मिथकों का खुलासा

मिथक 1: उपवर्गीकरण केवल तभी लागू हो सकता है जब क्रीमी लेयर लागू हो उपवर्गीकरण और क्रीमी लेयर दो अलग अवधारणाएँ हैं. एक समूह स्तर...

कर्नाटक में दलित आरक्षण का 6:6:5 फॉर्मूला तय; जानिए किसे कितना मिला आरक्षण?

बेंगलुरु: कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मंगलवार रात लंबी कैबिनेट बैठक में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 17% आरक्षण को तीन हिस्सों में बांटने...