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Saturday, February 7, 2026

ओपिनियन: बसपा की गद्दी कांटों का ताज

बाबासाहेब डा० अम्बेडकर के हमारे बीच से जाने के बाद मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने ऐसे समय में अपना घर, परिवार, सम्पत्ति सब कुछ त्याग कर इस मूवमेंट को खड़ा किया था, जब उस समय की सत्ता धारी ताकतें बाबासाहेब डा० अम्बेडकर के नाम निशान को मिटाने में पूरी ताकत लगा रही थीं.

यह बार-बार दुहराने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि आज जो बाबासाहेब डा० अम्बेडकर के नाम का और काम का डंका देश के कोने-कोने से लेकर पूरी दुनिया में बज रहा है, उसकी स्थापना के हकदार मान्यवर कांशीराम साहेब ही हैं. इसमें भी कोई दो राय नहीं हो सकतीं कि बहन कुमारी मायावती जी को तलाशने और नेतृत्व क्षमता तराशने में मान्यवर कांशीराम साहेब का ही करिश्मा रहा.

उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दौर में तत्कालीन समय, काल और परिस्थितियों के मद्देनजर बहन कुमारी मायावती जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का काम किया. यह प्रकृति का भी नियम है और हालात भी लगातार बदलते हैं, लेकिन राजनीति में परिस्थितियों के तेजी से बदलने के सबसे ज्यादा मामले देखे जा सकते हैं. अतः समाज हित में समय, काल और परिस्थिति के हिसाब से निर्णय लिए जाते हैं जो कई बार तात्कालिक रूप से अप्रिय भी हो सकते हैं.

दलित/बहुजन समाज का नेतृत्व संभालना कांटों भरा ताज ही कहा जा सकता है. एक ओर बहुत बड़ी चुनौती है कि बसपा के जनाधार को न केवल बनाये रखना है बल्कि उसे बड़ी संख्या में MLAs/MPs की सीटें जीतने में भी बदलना है. जिस तरह से बसपा विरोधी ताकतें हताशा, निराशा और  नकारात्मकता फैला रही हैं उसे आशा, उमंग और उत्साह में बदलने के नये-नये उपाय करने होंगे. दूसरी मनुवादी कहें या गैर बराबरी वाली ताकतें कहें, बसपा को रोकने के लिए साम दाम दण्ड भेद जैसे हर हथकंडे अपनाने में और तेजी लायेंगी जिसका मुकाबला केवल और केवल मान्यवर कांशीराम साहेब के बताए रास्ते पर चल कर ही किया जा सकता है.

बहुजन समाज और खास तौर से दलित समाज में यही संदेश पहुंच चुका है कि, “बाबासाहेब का मिशन अधूरा, बीएसपी करेगी पूरा” इसके साथ ही “वोट हमारा, राज तुम्हारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा.” इन्हीं सब नारों को बसपा के युवा घोषित उत्तराधिकारी को भी मजबूती तथा पूरी ताकत से आगे बढ़ाना होगा तभी दलित और बहुजन समाज का भरोसा जीता जा सकता है.

हममें से कुछ लोगों की ऐसी सोच हो सकती है कि इससे तो “परिवारवाद” को ही बढ़ावा मिलेगा तथा यह बसपा के बुनियादी सिद्धांत के विपरीत है, लेकिन एक गतिशील नेतृत्व उसे ही माना जाता है जो कि समय, काल और बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार समाज के व्यापक हित में महत्वपूर्ण निर्णय ले सके. जो भी निर्णय लिया गया है उसकी आलोचना अपने स्थान पर है, लेकिन यह शुभ संकेत है कि उत्तराधिकारी की घोषणा होने के पश्चात सोशल मीडिया पर देखने सुनने से पता चल रहा है कि अधिकांश पढे लिखे युवाओं में एक नये जोश और उत्साह का संचार हुआ है और उन्हें आशा है कि भाई आकाश आनंद आने वाले समय में हर प्रकार की कठिन से कठिन चुनौती का अपनी सूझ-बूझ और नेतृत्व क्षमता से मुकाबला करने में अवश्य ही कामयाब होकर समाज के सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई को आगे बढ़ाने का काम करेंगे.

(लेखक: सोशल मीडिया से प्राप्त लेख)

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