यह प्रश्न केवल संघी या भाजपाई ही नहीं पूछते हैं बल्कि कांग्रेसी, गांधीवादी, वामपंथी, ब्राह्मणवादी, मनुवादी, मुस्लिम इत्यादि तक सब पूछते हैं. ख़ासकर जिन्होंने आज़ादी के आंदोलन को ठीक से पढ़ा नहीं या ऐतिहासिक पहलुओं को ठीक से समझा नहीं वह इस तरह के वाट्सएप ज्ञान को प्रसारित, प्रचारित करते रहते हैं.
जवाब जानने से पहले कुंठाओं को शांत करना होगा अन्यथा कभी कुछ नहीं जान सकोगे. उसके लिए भगतसिंह के उदाहरण से शुरू करते हैं कि क्या भगतसिंह ने देश को आज़ाद कराया? यदि कुंठित विचारों के हिसाब से सोचेंगे तो भगतसिंह को 1931 में फांसी हो गई थी तो उनका आज़ादी में क्या योगदान?
इसी तरह सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु 1945 में हो गई थी तो उनका भी क्या योगदान? महात्मा गांधी जी ने तो कहा था कि पाकिस्तान मेरी लाश में बनेगा लेकिन भारत की आज़ादी से ठीक एकदिन पहले पाकिस्तान का निर्माण हो गया था और आज़ादी के लिए भी कोई गोली, डंडा नहीं खाया तो उनका भी क्या योगदान?
जानते हो यह उदाहरण निहायती अतार्किक और गैरजरूरी हैं लेकिन उतना नहीं जितना आप यह कहो कि बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर का आज़ादी में क्या योगदान? आपको यदि भारत तथा इसके सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक व्यवस्था की समझ नहीं है तो इसी तरह के उल जलूल प्रश्न या कुतर्क देकर आत्मसंतुष्टि हासिल करते रहेंगे.
डॉ अम्बेडकर हो या मंगल पांडे हो अंग्रेजों के साथ काम करना आजीविका का सवाल है और उसमें भी शूद्रों का अंग्रेजों के साथ काम करना एक क्रांति से कम नहीं था वरना मुगलों ने भी भारत पर राज किया लेकिन शूद्रों को हर चीज़ से वंचित तथा सवर्णों को हर चीज़ में सम्मिलित रखा. साथ ही हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखा.
अकबर के दरबार में बीरबल, टोडरमल, चंद्रभान इत्यादि कौन जाति थे? कोई एक शुद्र का नाम नहीं मिलेगा क्यों? अंग्रेजों ने भारत पर कोई उपकार नहीं किया लेकिन वर्णव्यवस्था पर प्रहार करके शूद्रों के लिए कई द्वार खुले जिसका लाभ बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर को भी मिला. जो अपना प्रवेश द्वार समझता है वह अपने पीछे खड़ी भीड़ को प्रवेश हेतु आमंत्रित तो करेगा?
देश की बड़ी आबादी की लड़ाई किसी आज़ादी की लड़ाई से कमतर नहीं थी और इस लड़ाई के लिए वह केवल हिन्दू, मुस्लिम से ही नहीं लड़ रहे थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत से भी टकरा रहे थे. उनके ज्ञापन, पत्र और आंदोलन आज भी इसके प्रमाण हैं. फिर महिलाएं जिन्हें आधी आबादी कहा जाता है उनके लिए मुक्ति मार्ग डॉ अम्बेडकर के योगदान से ही सम्भव हुआ बशर्ते वह रुढ़िवादी परम्पराओं पर प्रहार ही हो.
किसी भी व्यक्ति का योगदान इस देश को बनाने में कम नहीं है बशर्ते वह नेता हो या फिर साधारण व्यक्ति सिवाय अधिकांश राजाओं व उनके समर्थकों, अंग्रेजों के मुखबिरों और जिन्ना प्रशंसकों को छोड़कर. डॉ अम्बेडकर का टकराव भले ही सबसे था लेकिन अपने समर्थकों को हमेशा केवल यह कहा कि We are Indian firstly and lastly. विपरीत परिस्थितियों में यही योगदान आधुनिक भारत का निर्माण है.
(लेखक: आर पी विशाल; ये लेखक के अपने विचार हैं)

