दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम हुआ। यह मात्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेनाओं का युद्ध नहीं था; यह हजारों वर्षों की दासता, अत्याचार और अस्पृश्यता की जंजीरों को तोड़ने का महासंग्राम था। अछूत कहे जाने वाले महार योद्धाओं ने, जिन्हें पेशवाई शासन में अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं, अपनी वीरता से जातिवादी व्यवस्था को चुनौती दी। यह युद्ध अंग्रेजों की सामरिक विजय तो था, किंतु उससे कहीं बड़ा था – यह जातिवाद की पराजय और मानवीय गरिमा की जय का प्रतीक था!
1 जनवरी 1818 को हुआ यह युद्ध तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का निर्णायक अध्याय बना। पेशवा की 28000 सैनिकों की विशाल सेना के सामने मात्र 500 अछूत ब्रिटिश सैनिक थे। बारह घंटे चले इस भयंकर संघर्ष में अछूतों ने अप्रत्याशित वीरता दिखाई। खोने को कुछ नहीं था उनके पास – न सम्मान, न स्वतंत्रता। पाने को था मात्र आत्मसम्मान और बराबरी का अधिकार। इस महान युद्ध में अछूतों ने पेशवा सेना को गाजर-मूली की भांति काट कर मानवतावादी मूल्यों की पुनर्स्थापित किया। ब्रिटिशों ने इस विजय के सम्मान में 1822 में भीमा नदी के किनारे काले पत्थर का भव्य विजय स्तंभ का निर्माण कराया, जिस पर शहीद अछूत योद्धाओं के नाम अंकित हैं। यह स्तंभ आज भी खड़ा है – अन्याय के विरुद्ध विद्रोह का जीवंत साक्षी!
महाराष्ट्र के अछूत समुदाय में यह विजय एक लोकप्रिय कहावत बन गई – “हम तो छप्पन काटने वाले हैं!” यह ओजपूर्ण उद्घोष मनुवादी अत्याचारों पर अछूतों की विजय का प्रतीक है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1927 में इस विजय स्तंभ का दर्शन किया और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। तब से हर वर्ष 1 जनवरी को लाखों दलित एवं वंचित समाज के लोग यहां एकत्र होते हैं, ‘जय भीम’ के नारों से आकाश गुंजाते हैं। यह मात्र स्मृति नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का अमर संकल्प है!
पेशवाई शासन ब्राह्मणवादी अत्याचार का प्रतीक था। अस्पृश्यों पर अमानवीय प्रताड़ना, उन्हें छूने मात्र से अपवित्र मानना – यह सब सहते-सहते महारों का आक्रोश उस दिन फूट पड़ा। बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के शब्दों में, “अस्पृश्य यदि साफ वस्त्र पहने, छत डाले, शिक्षा ले, धर्म बदले या सम्मानजनक नाम रखे – तो हिंदू समाज क्यों क्रुद्ध होता है?” क्योंकि यह उसकी शास्त्र-सम्मत व्यवस्था पर प्रहार था। भीमा कोरेगांव ने सिद्ध किया कि दमित समाज जब उठ खड़ा होता है, तो कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकती।
किंतु आज भी यह गौरवगाथा चुनौतियों से घिरी है। 2018 में द्विशताब्दी समारोह के दौरान हुई हिंसा ने पुराने घावों को कुरेद दिया। लाखों शांतिप्रिय लोग जब विजय स्तंभ पर श्रद्धासुमन अर्पित करने आए, तो कुछ असामाजिक तत्वों ने हमला किया। यह मात्र संयोग नहीं था; यह बढ़ती दलित चेतना को कुचलने का प्रयास था। बाबासाहेब की चेतावनी स्मरणीय है – ‘जैसे-जैसे वंचित समाज शिक्षित, समृद्ध और सवाल करने वाला बनेगा, वैसे-वैसे ऐसे टकराव बढ़ेंगे।’ किंतु भीमा कोरेगांव का संदेश अमर है: ‘जातिवाद की जड़ें कितनी भी गहरी हों, वीरता और एकता उन्हें उखाड़ फेंक सकती है!’
भीमा कोरेगांव भारतीय समाज को लोकतांत्रिक बनाने की उस महान लड़ाई का प्रेरक अध्याय है। यह हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता मात्र राजनीतिक नहीं, सामाजिक व आर्थिक भी होनी चाहिए। आज जब हम इस विजय का जश्न मनाते हैं, तो साथ ही यह भी संकल्प लें कि– ‘जाति की दीवारें गिरेंगी, मानवता की जय होगी!’


