12.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

बौद्ध स्थलों की पुकार: इतिहास की रोशनी और आज का अंधकार

आज हम एक ऐसी सच्चाई से पर्दा उठाने जा रहे हैं, जो न केवल हमारी चेतना को झकझोर देती है, बल्कि हमारे समाज की ऐतिहासिक समझ, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत पर भी गहरे सवाल खड़े करती है। सवाल यह है: क्या भारत के वे बौद्ध स्थल, जिनसे कभी ज्ञान और शांति की रोशनी फूटी थी, आज पाखंड, व्यापार और उपेक्षा का शिकार हो चुके हैं?

2600 साल पुरानी विरासत की आज की विडंबना

बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर—ये वे तीर्थ स्थल हैं जहाँ तथागत बुद्ध ने क्रमशः ज्ञान प्राप्त किया, पहला उपदेश दिया और परिनिर्वाण प्राप्त किया। लेकिन आज की रिपोर्टें बता रही हैं कि इन स्थलों पर भिक्षुओं की जगह टूरिज्म प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दी जा रही है। बोधगया के महाबोधी मंदिर का 10 करोड़ रुपये का बजट भिक्षुओं की सेवा या ध्यान केंद्रों पर नहीं, बल्कि पर्यटन सुविधाओं पर खर्च हो रहा है। सारनाथ में शराब की दुकानें खुल रही हैं और कुशीनगर में बाज़ारों की भीड़ ने शांति को विस्थापित कर दिया है।

इतिहास को फिर से पढ़ने का वक्त

अशोक महान ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इन बौद्ध स्थलों को अंतरराष्ट्रीय ज्ञान केंद्र बनाया था। लेकिन गुप्त काल के बाद जैसे ही ब्राह्मणिक ताकतें हावी हुईं, विहारों पर हमले शुरू हो गए। नालंदा को जलाने का दोष जहां बख्तियार खिलजी पर डाला गया, वहीं इतिहासकार डी.एन. झा बताते हैं कि हिंदू कट्टरपंथियों ने भी इसकी भूमिका निभाई। महाबोधी मंदिर पर कब्ज़ा, बोधिवृक्ष की कटाई, बुद्ध की मूर्तियों की जगह शिवलिंगों की स्थापना—ये सभी घटनाएं योजनाबद्ध सांस्कृतिक अपहरण की ओर इशारा करती हैं।

विहार से मंदिर तक: एक लंबी लिस्ट

पुरी का जगन्नाथ मंदिर, बद्रीनाथ, कांचीपुरम, एहोल, एलोरा, मथुरा, रत्नागिरी—ऐसे कई स्थल हैं जो कभी बौद्ध विहार थे और अब हिंदू मंदिरों में परिवर्तित कर दिए गए हैं। यह केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि शिक्षा और तर्क का आधार थे, जो अब पौराणिकता के बोझ तले दबा दिए गए हैं।

आधुनिक पाखंड की मिसाल: हैदराबाद का आईटी पार्क

आज भी यह पाखंड थमा नहीं है। हैदराबाद में आईटी पार्क जंगलों को काट कर बनाया जा रहा है, जो न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है बल्कि बुद्ध के करुणा आधारित दर्शन के भी विरुद्ध है। चील, मोर, हिरण जैसे जीव मर रहे हैं और जल स्रोत सूखते जा रहे हैं।

संघर्ष जारी है: क्या सरकार सुन रही है?

भदंत सुरई ससई जैसे बौद्ध नेताओं की अगुआई में हजारों लोग सड़कों पर हैं। 37 आंदोलन हो चुके हैं, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ लंबित हैं, और अंतरराष्ट्रीय समर्थन बढ़ रहा है। फिर भी सरकार चुप क्यों है? क्या यह ‘गोदी मीडिया’ की चुप्पी है, या फिर वोट बैंक की राजनीति?

यह सिर्फ इतिहास नहीं, वर्तमान की चुनौती है

बुद्ध का संदेश था—लोभ, द्वेष और मोह से ऊपर उठकर सत्य और करुणा के रास्ते पर चलो। लेकिन आज उन्हीं स्थलों पर लोभ का नृत्य, द्वेष का प्रभुत्व और मोह का जाल फैलाया जा रहा है। यह सवाल सिर्फ बुद्धिस्ट समुदाय का नहीं, पूरे भारत के विवेकशील नागरिकों का है।

समाप्ति नहीं, शुरुआत है

जब तक संघ एकजुट है, जब तक सत्य की मशाल बुझी नहीं, तब तक पाखंड हारता रहेगा। यह लेख एक शुरुआत है उस यात्रा की, जो हमारे सांस्कृतिक आत्मसम्मान और ऐतिहासिक न्याय की ओर जाती है।

(लेखक: डॉ लाला बौद्ध; ये लेखक के अपने विचार हैं)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...