बहुजन आंदोलन में उतराधिकारी की जरूरत

जब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का उल्लेख होता है, तो विरोधियों की उपस्थिति तो स्वाभाविक है ही, किंतु बहुजन समाज के स्वघोषित चिंतक, कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी, जिन्हें प्रायः चमचे कहा जाता है, भी बसपा और इसके नेतृत्व, विशेष रूप से बहनजी, की आलोचना करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ये लोग बसपा और इसके नेतृत्व के विरुद्ध नकारात्मक कथानक रचते हैं, जिसके माध्यम से वे बाबासाहेब आंबेडकर के मिशन को क्षति पहुंचाने का निरंतर प्रयास करते हैं। इन सबके मध्य सबसे दुखद पहलू यह है कि सादगी और भोलेपन से भरा बहुजन समाज इन विरोधियों और चमचों द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार के कारण दिग्भ्रमित हो जाता है। इस भटकाव का ही परिणाम है कि आज लोग बहनजी पर बिना सोचे-समझे परिवारवाद का आरोप लगाने से नहीं हिचकते। इसका मूल कारण यह है कि उन्हें अपने इतिहास का बोध नहीं है, न ही बहनजी की दूरदर्शिता का ज्ञान है। अतः उन्हें यह समझना होगा कि किसी भी आंदोलन में उत्तराधिकारी की आवश्यकता अपरिहार्य होती है। बहनजी पर कोई भी अनावश्यक आरोप लगाने से पूर्व परिवारवाद के वास्तविक स्वरूप को समझना आवश्यक है।

इतिहास साक्षी है कि जब महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की, तो उनका नाम और उनका आंदोलन दोनों ही समाप्त कर दिए गए। 1920 के दशक के अंत में ‘सत्य शोधक समाज’ को कांग्रेस ने अपने में विलीन कर लिया। तत्पश्चात शाहू महाराज ने स्वयं आगे बढ़कर आंदोलन का नेतृत्व संभाला और अपने जीवनकाल में ही बाबासाहेब आंबेडकर को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर आंदोलन को सुरक्षित कर दिया। किंतु बाबासाहेब ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की, जिसके परिणामस्वरूप उनके देहांत के पश्चात उनके आंदोलन को लगभग समाप्त कर दिया गया। दक्षिण भारत में पेरियार ने एक सशक्त आंदोलन खड़ा किया, एक राजनीतिक दल का गठन किया, परंतु उचित समय पर उचित उत्तराधिकारी की घोषणा न करने के कारण उनका आंदोलन और उनकी पार्टी दोनों ही लुप्त हो गए। इसी प्रकार केरल में नारायण गुरु ने एक महान आंदोलन की नींव रखी, किंतु उत्तराधिकारी की अनुपस्थिति में उनका आंदोलन भी काल के गर्भ में समा गया।

महात्मा फुले, बाबासाहेब, पेरियार और नारायण गुरु जैसे महानायकों ने उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया, जिसके फलस्वरूप उनके आंदोलन छिन्न-भिन्न हो गए। किंतु शाहूजी महाराज ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर मिशन को संरक्षित कर दिया। धन्य हैं मान्यवर कांशीराम साहेब, जिन्होंने स्वयं आगे बढ़कर आंदोलन को पुनर्जनन दिया और इसका नेतृत्व संभाला। उन्होंने आंदोलन को आगे बढ़ाया और बहनजी को अपना एकमात्र उत्तराधिकारी घोषित कर इसे सुरक्षित किया। बहनजी ने भी शाहूजी महाराज और मान्यवर साहेब के पदचिह्नों पर चलते हुए, महात्मा फुले, बाबासाहेब, पेरियार और नारायण गुरु के उत्तराधिकारी न घोषित करने से उत्पन्न दुष्परिणामों से सबक लिया। एक सजग प्रहरी की भांति उन्होंने श्री आकाश आनंद जी को आंदोलन का उत्तराधिकारी घोषित कर इसे कम से कम अगले पांच दशकों के लिए सुरक्षित कर दिया।

शाहूजी महाराज और मान्यवर साहेब को आज सभी स्वीकार करते हैं और उनके योगदान को समझने का दावा करते हैं, किंतु जब शाहूजी ने बाबासाहेब को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, तब भी चमचों ने इसका विरोध किया था। इसी प्रकार जब मान्यवर साहेब ने बहनजी को उत्तराधिकारी घोषित किया, तो बसपा के भीतर भी हलचल मची। मान्यवर कांशीराम साहेब के इस निर्णय के विरोध में कुछ लोगों ने बसपा छोड़ दी और कांग्रेस, भाजपा, सपा जैसे दलों की चौखट पर पहरेदारी स्वीकार कर ली। कुछ ने अपने राजनीतिक दल बनाकर बसपा का विरोध किया, जो आज भी जारी है। अतः यह मान लेना कि शाहूजी महाराज के निर्णय और बाबासाहेब के नेतृत्व को समाज ने निर्विरोध स्वीकार कर लिया था, सरासर भ्रांति है। इसी प्रकार आज मान्यवर साहेब की जय-जयकार करने वालों को यह समझना होगा कि उनके निर्णय का भी विरोध हुआ था। ठीक उसी तरह आज भी चमचे बहनजी द्वारा श्री आकाश आनंद जी को उत्तराधिकारी बनाए जाने को कभी परिवारवाद के रूप में, तो कभी अन्य नकारात्मक कथानकों के माध्यम से कोसते दिखते हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह इतिहास में हुआ, आज हो रहा है और कल भी होगा। अतः बहनजी के निर्णय को उसी भाव से स्वीकार करना चाहिए, जिस भाव से आपने शाहूजी महाराज और मान्यवर साहेब के निर्णय को तमाम विरोधों के बावजूद सहर्ष स्वीकार किया था।

अब बात यदि उत्तराधिकारी को ‘थोपने’ की हो, तो यह कथन स्वार्थ और चमचागिरी का प्रतीक है। गौर करें कि जून 1917 में बाबासाहेब अपनी शिक्षा पूर्ण कर भारत लौटे और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हुए। मात्र तीन वर्ष की सकारात्मक और सृजनात्मक सक्रियता को देखते हुए 1920 के मांडगांव परिषद में शाहूजी महाराज ने उन्हें अपने आंदोलन का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। मान्यवर साहेब ने अपने प्रारंभिक दिनों से ही आंदोलन में सहयोगी रहीं बहनजी को पहले इसके लिए तैयार किया और फिर उचित समय पर आंदोलन की बागडोर उनके हाथों में सौंप दी।

इसी प्रकार बहनजी ने पहले पार्टी के भीतर अनेक लोगों को परखा, किंतु उचित व्यक्तित्व न मिलने पर उन्होंने अपनी देखरेख में पले-बढ़े श्री आकाश आनंद जी को जांचा-परखा। उन्हें तैयार किया। श्री आकाश आनंद जी ने भी बहनजी के संघर्ष को निकट से देखा और उनसे सीखा। फिर 2017 में वे बसपा में सक्रिय हुए। 2017 से 2023 तक उनमें अपार निखार आया। इसके पश्चात बहनजी ने उचित समय देखकर उन्हें आंदोलन का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। बीच में थोड़ी अपरिपक्वता के कारण बहनजी ने उन्हें पार्टी के सभी पदों से निलंबित कर पुनः प्रशिक्षण और अध्ययन का अवसर प्रदान किया, जैसा कि वे अन्य कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ करती हैं। इसके बाद श्री आकाश जी ने आंदोलन में रहकर इसे समझा, सीखा और पुनः बहनजी ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपते हुए पार्टी के पदों पर बहाल कर दिया।

अब यदि जबरन परिवारवाद के आरोप की बात हो, तो ऐसे अनुचित इल्जाम लगाने वालों को समझना चाहिए कि यदि बहनजी में परिवारवाद का तनिक भी दोष होता, तो उनके भाई श्री आनंद जी या श्री आकाश आनंद जी संसद अथवा विधानसभा में होते। सत्ता में श्री आनंद जी उपमुख्यमंत्री या मंत्री होते। अतः बहनजी पर परिवारवाद का आरोप निराधार है।

परिवारवाद वह है, जब मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद, विधायक या मंत्री जैसे पद बिना योग्यता और संघर्ष के किसी को सौंप दिए जाएं, जैसा कि सपा, कांग्रेस, राजद, टीएमसी आदि में देखने को मिलता है। किंतु बसपा में परिवारवाद का आरोप इसलिए आधारहीन है, क्योंकि जब बसपा सत्ता में मजबूत थी, तब भी बहनजी ने अपने परिवार के किसी सदस्य को मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद, विधायक या मंत्री नहीं बनाया। इसके विपरीत, श्री आकाश आनंद जी को जांचा-परखा और ऐसे समय में पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी, जब बसपा का वोट प्रतिशत चुनाव-दर-चुनाव घटता जा रहा है। अतः बहनजी पर परिवारवाद का आरोप लगाना किसी के बौद्धिक दिवालियापन का परिचायक है। बहनजी ने परिवारवाद के दोष से मुक्त रहते हुए आंदोलन को उत्तराधिकारी प्रदान कर इसे संरक्षित करने का महान कार्य किया, जैसा कि इतिहास में शाहूजी महाराज और मान्यवर साहेब ने किया था।

निष्कर्षतः बहनजी मान्यवर साहेब की वह खोज हैं, जिन्होंने फुले, शाहूजी, बाबासाहेब, पेरियार, नारायण गुरु और मान्यवर साहेब के आंदोलन को संरक्षित किया। इन महापुरुषों की अनुपस्थिति में भी वे आंदोलन को सतत आगे बढ़ा रही हैं, तब भी जब चमचे अपने स्वार्थ के लिए इसे बेचने को आतुर हैं। बहनजी के इस दृढ़ निर्णय, उनकी दूरदर्शिता और महापुरुषों व उनके मिशन के प्रति समर्पण के कारण ही उनका नाम फुले, शाहूजी, बाबासाहेब, पेरियार, नारायण गुरु और मान्यवर साहेब के तत्काल बाद शुमार किया जाता है।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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