भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही महान व्यक्तित्व हैं। उनका मिशन कोई साधारण आंदोलन नहीं, बल्कि एक महाक्रांति है – सामाजिक परिवर्तन की महाक्रांति, जो सदियों से दबे-कुचले बहुजन समाज को आत्मसम्मान, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और स्वाभिमान की ऊँचाइयों तक पहुँचाने का संकल्प है। लेकिन यह मिशन कोई सराय नहीं है, जहाँ कोई भी जब चाहे आ जाए और जब चाहे चला जाए। यह एक महान आन्दोलन है, जिसमें केवल वे ही सच्चे सहयोगी बन सकते हैं जो सोच-समझकर, पूरे समर्पण के साथ इसमें कूदें।
इस मिशन की गहराई को समझने के लिए हमें मान्यवर श्री कांशीराम साहेब की दूरदर्शी बातों की ओर मुड़ना होगा। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम साहेब ने बाबासाहेब की विचारधारा को ‘राजनीतिक शक्ति‘ में बदलने का जो महान कार्य किया, वह भारतीय इतिहास में एक अनुपम मिसाल है। वे कहते हैं:
“जिनको इस मूवमेंट में दिलचस्पी है, जिनको विश्वास है, जो साथी समाज में परिवर्तन लाना चाहते हैं, वही हमारे साथ आएं। ऐसे भीड़ खड़ा करने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि अगर हम आपको सांसद, विधायक न बना सके तो आप एक दिन बिकने को तैयार हो जाओगे, कभी गांधी के चरणों में, तो कभी गोलवलकर के चरणों में जा गिरोगे। मैं फिर कहता हूं कि – जूठ-मूठ खाना छोड़ो, हम सब कुछ अपने बलबूते पर अपनी सरकार बनाकर हासिल कर सकते हैं।”
ये शब्द केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं – उन अवसरवादियों (चमचों) के लिए जो आंदोलन को अपने निजी लाभ का साधन समझते हैं। मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जानते थे कि बहुजन समाज के दुश्मन केवल बाहरी शक्तियाँ (मनुवादी) ही नहीं, बल्कि अंदर का अवसरवाद (चमचापन) भी है। यदि कार्यकर्ता केवल पद, सत्ता या व्यक्तिगत लाभ के लिए आएँगे, तो विफलता के क्षण में वे पलायन कर जाएँगे या दुश्मन के सामने घुटने टेक देंगे। इसलिए उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस आंदोलन में केवल निस्वार्थ, ईमानदार और फुले, शाहू तथा बाबासाहेब की विचारधारा पर अटूट विश्वास रखने वाले कार्यकर्ताओं की ही जरूरत है। भीड़ इकट्ठा करना हमारा कोई लक्ष्य नहीं है; गुणवत्ता, त्याग और समर्पण इस मिशन की जरूरत है।
बसपा कोई साधारण राजनीतिक दल नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति का एक जीवंत महाआंदोलन है। यह फुले-शाहू-अम्बेडकर की उस विचारधारा की वाहक है जो जाति व्यवस्था की जड़ों को उखाड़ फेंकने, भारत को सशक्त, आत्मनिर्भर व समतावादी राष्ट्र बनाने का सपना देखती है। बाबासाहेब ने संविधान के माध्यम से कानूनी समता और वैचारिकी के माध्यम से सम्पूर्ण मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन मान्यवर श्री कांशीराम साहेब ने बहुजन सामर्थ्य को राजनीतिक ताकत व सत्ता में बदलकर सामाजिक समता व आर्थिक मुक्ति के मार्ग पर चलना सिखाया। उनका संदेश था – “जूठ-मूठ खाना छोड़ो” अर्थात दूसरों की कृपा पर निर्भर रहना बंद करो। बहुजन समाज अपने बलबूते पर सत्ता हासिल कर सकता है, अपनी सरकार बना सकता है, और अपने हक खुद प्राप्त कर सकता है।
आज के दौर में, जब राजनीति अवसरवाद और सौदेबाजी का पर्याय बन चुकी है, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब की ये बातें और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। बहुजन समाज को समझना होगा कि सत्ता की कुंजी उनके वोट में है, उनकी एकता में है। लेकिन यह एकता केवल संख्याबल की नहीं, बल्कि अम्बेडकरी विचारधारा वाले बहुजनों की होनी चाहिए। जो लोग बाबासाहेब के मिशन में आते हैं, उन्हें सोच-समझकर आना चाहिए – क्योंकि यह रास्ता आसान नहीं है। यह संघर्ष, समर्पण और त्याग का रास्ता है, जहां ‘सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति‘ का लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ से ऊपर है।
याद रखिए, बहुजन समाज का उदय तब तक नहीं होगा जब तक उसके कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से, ईमानदारी से और फुले-शाहू-अम्बेडकर की विचारधारा पर अडिग रहकर आगे न बढ़ें। बसपा का झंडा केवल एक चुनाव चिह्न नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति की महाक्रांति का प्रतीक है। आइए, हम सब मिलकर इस मिशन को मजबूत बनाएँ – भीड़ बनकर नहीं, बल्कि समर्पित सिपाही बनकर।


