18.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

लोकनायक आकाश आनन्द जी : बसपा के उत्तराधिकारी

आकाश नहीं, आगाज़ है: बहुजन आंदोलन का नवोदय और बसपा का संकल्प

एक नई सुबह का संकेत
“आकाश नहीं, आगाज़ है। देश की आवाज़ है।” यह पंक्तियाँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण इतिहास, संघर्ष और आशा की गाथा का प्रतीक हैं। भारतीय समाज के शोषित वर्गों का स्वर, जो सदियों से दबाया गया, आज बहुजन आंदोलन के रूप में एक नवीन प्रभात की ओर अग्रसर है। यह आंदोलन न तो क्षणिक उन्माद है, न ही सत्ता की अंधी दौड़; यह एक समतामूलक समाज के सृजन का वह संकल्प है, जिसकी नींव राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले ने रखी थी और जिसे समय-समय पर छत्रपति शाहूजी महाराज, बाबासाहेब आंबेडकर, मान्यवर कांशीराम और परम आदरणीया बहनजी ने संवारा। आज यह गाथा लोकनायक आकाश आनंद के नेतृत्व में एक नए युग का सूत्रपात कर रही है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: नेतृत्व का संकट और परिणाम
इतिहास साक्षी है कि ज्योतिबा फूले ने ‘सत्य शोधक समाज’ के माध्यम से सामाजिक सुधार का जो बीज बोया, वह समता और न्याय का प्रतीक बना। किंतु उनके महापरिनिर्वाण के पश्चात् उत्तराधिकारी के अभाव में यह संगठन बिखर गया और 1930 में कांग्रेस के षड्यंत्र ने इसके अवशेषों को भी अपने में विलय कर लिया। इस कमी को राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज ने पहचाना और फूले की वैचारिकी को आगे बढ़ाते हुए बाबासाहेब आंबेडकर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 1920 की ‘माड़ गाँव परिषद’ में शाहूजी ने बहुजन आंदोलन को एक मजबूत आधार प्रदान किया। बाबासाहेब ने इस विरासत को संविधान निर्माण, बौद्ध धम्म और सामाजिक-आर्थिक क्रांति के माध्यम से नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। किंतु उनके महापरिनिर्वाण से पूर्व उत्तराधिकारी की घोषणा न होने से उनकी ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ (आरपीआई) और स्वतंत्र बहुजन राजनीति कांग्रेस के हाथों नष्ट हो गई।

पुनर्जनन: मान्यवर और बहनजी का योगदान
जब बहुजन आंदोलन और उसकी आत्मनिर्भर राजनीति इतिहास के पन्नों में दफन होने की कगार पर थी, तब मान्यवर कांशीराम और परम आदरणीया बहनजी ने इसे पुनर्जनन का वरदान दिया। ‘फूले-शाहू-आंबेडकर’ की वैचारिकी को पुनर्जनन देकर, बहुजन समाज को उसकी पहचान, संस्कृति और इतिहास से जोड़ा गया। मान्यवर ने देखा कि नेतृत्व का अभाव आंदोलन को कैसे नष्ट कर सकता है। जहाँ फूले और आंबेडकर के बाद कांग्रेस ने उनकी विरासत को कुचल दिया, वहीं शाहूजी के उत्तराधिकार ने इसे जीवित रखा। इस सबक को आत्मसात करते हुए मान्यवर ने अपने जीते-जी बहनजी को उत्तराधिकारी घोषित कर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को एक अटूट ढाल प्रदान की।

वर्तमान चुनौतियाँ और बहनजी का दूरदर्शी कदम
आज पुनः कांग्रेस और उसके सहयोगी बसपा को कमजोर करने के लिए षड्यंत्र रच रहे हैं। गोदी मीडिया, यूट्यूब चैनल्स और क्षेत्रीय दलों के चमचों के माध्यम से बहुजन समाज को गुमराह करने का प्रयास हो रहा है। इस नाजुक मोड़ पर बहनजी ने मान्यवर के मार्ग का अनुसरण करते हुए लोकनायक आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। यह निर्णय केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि बहुजन आंदोलन और स्वतंत्र राजनीति को सुरक्षित करने का एक ऐतिहासिक कदम है। बहनजी ने आकाश आनंद को पहले देश भर में जन-जन तक पहुँचाया, उनकी रैलियों और साक्षात्कारों के माध्यम से उनकी प्रतिभा को उजागर किया। फिर, एक रणनीतिक कदम में, उनकी थोड़ी-सी अपरिपक्वता को अवसर में बदलते हुए उन्हें चुनाव के बीच से हटाकर उनकी माँग को बढ़ाया। आज आकाश आनंद ‘लोकनायक’ बन चुके हैं, और बसपा एक सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर है।

निष्कर्ष: बहुजन समाज की जिम्मेदारी और भारत का नवनिर्माण
आकाश आनंद के नेतृत्व में बहुजन आंदोलन एक नए आगाज़ की ओर बढ़ रहा है। किंतु यह यात्रा केवल नेतृत्व की सफलता पर निर्भर नहीं; बहुजन समाज की एकता और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ‘फूले-शाहू-आंबेडकर’ की वैचारिकी को नवीन, सकारात्मक और रचनात्मक दिशा देकर, बसपा को मजबूत करना अब समाज का कर्तव्य है। यह वह समय है जब बहुजन समाज को अपनी सत्ता स्थापित कर, भारत राष्ट्र निर्माण में नए कीर्तिमान गढ़ने होंगे। यह आकाश नहीं, बल्कि एक आगाज़ है—देश की उस आवाज़ का, जो समता और न्याय का स्वप्न साकार करेगी।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


Buy Now LEF Book by Indra Saheb
Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...

Opinion: धर्म का मर्म शब्दों में नहीं, आचरण में है

बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञहस्स होति॥ अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।रागञ्चप दोसञ्चस पहाय...