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Saturday, February 7, 2026
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साहित्य

कांशीराम का किस्सा #3: मेरा कोट कंधों से फटा है तो क्या हुआ? इससे अधिक तो मेरे समाज की गरीब औरतों की सलवार फटी...

बात अप्रैल की. जगह लंदन यूके वहां साहेब का ठिकाना 'अंबेडकर इंटरनेशनल मिशन’ और था. साहेब को बुद्ध विहार संस्था वालों ने एक कमरा...

किस्सा कांशीराम का 02: इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, बूटा सिंह और पिरथी सिंह ने बर्मिंघम (यूके) गुरु रविदास गुरुद्वारा से पैसा लिया पर मैंने...

किस्सा कांशीराम का 02: 1987 में जब इलस्ट्रेटेड वीकली के पत्रकार ने साहेब को सवाल किया कि आप कहते हो कि आपने कभी भी...

संकल्प-दिवस विशेष: जब पेड़ के नीचे बैठकर फूट-फूटकर रोए थे बाबासाहेब

आज 23 सितम्बर संकल्प दिवस है. आज के दिन का भारत के इतिहास व बौद्धों के लिए विशेष महत्व है. घटना 23 सितम्बर 1917...

कहानी: बाप की सीख; एक बार पढ़ते ही आँखे खुल जाएंगी

बाप अकेला रहता था. बेटे उससे दूर एक शहर में रहते थे. अचानक एक दिन बाप के घर के दरवाजे पर किसी ने दस्तक...

कविता: बीहड़ से बुद्ध की ओर… सूरज कुमार बौद्ध की कविता

मेरे बचपन को खाई में धकेले हो तुम,तेरे करतूतों का जवाब देकर रहूंगी.बहन-बेटियों के जिस्म को नोंचने वालों,मैं नंगेली की वारिस बदला लेकर रहूंगी. शोषण...

कविता: नीर नैन गिरता रहे, पढते रहे किताब…

नीर नैन गिरता रहे, पढते रहे किताब ।पुस्तक पैसा खर्चते, आधी रोटी आब ।। राज रत्न रमेश सह, गंगाधर सब अंत ।पुत्र चार बाबा भये,...

कविता: पढ़िए समाज की सच्चाई पर यह शानदार कविता

बैरवा,जाटव,रैगर,कोली,खटीक सबके न्यारे न्यारे ठाठ। कभी नहीं पढ सकते हैंये एकता का पाठ।। मेहनती हैं सारे मेहनत करके खाते हैं। पर राजनीति में तो ये आज भी...

8 मई मजदूर दिवस विशेष: अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर मजदूर एक मजबूर रचना

मज़दूर हुए मजबूर मैं मुर्दों की बस्ती में हूँया ज़ुबाँ पर सबके ताले हैं।मज़दूर आज मजबूर हुआचुप बैठे रखवाले हैं॥ अव्यवस्था के शिकार हुएलाखों गरीब मज़दूर...

कविता: मगर मरे नहीं हैं हम… हारे हैं जरूर – सूरज कुमार बौद्ध की कविता

मगर मरे नहीं हैं हम। उनसे कह दो कि डरे नहीं है हम,हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम। बहुत जुनून है मुझमें नाइंसाफी के...

कविता: बेपर्दा प्रगतिशीलता– सूरज कुमार बौद्ध की कविता

जाति धर्म के मलबे में धंसा वो सच हैजो झूठ के हर पर्दे को बेपर्दा कर देता है.लोग कितने भी प्रगतिशील हों,गला फाड़कर लिबरल...

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