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कविता: ‘जय भीम’ का अद्भुत नारा

हिल उठे जग सारा, कांप उठे पर्वत माला ।
नील गगन में गूँज उठे जब, जय भीम का अद्भुत नारा ।।
गांव से लेकर संसद तक,
सर से लेकर पॉव तक, दौड़ उठे जब नीली धारा,
झूम उठे सब नर नारी, नांच उठे मन मारा,
नील गगन में गूँज उठे, जब जय भीम का अद्भुत नारा ।।

उमड़-घुमड़ कर बदल आये, आसमान लगे अब कारा,
बदल बन बरसे अमृत, सींचे जग को जिसकी धारा,
नांच रहे है बाग बगीचे, झूम रहा है बहुजन सारा ।
नील गगन में गूँज उठा है, जय भीम का अद्भुत नारा ।।

पढों-लिखों आगे बढ़ों, बना संघ संगठित रहों,
फिर बहुजन कर तू विद्रोह,
तोड़ कमर तू मनुवाद की, नीच घिनौनी जिसकी काया,
फिर जग में गूँजेगा, समता, आज़ादी व भाईचारा
जग होगा कल से बेहतर, कल से न्यारा,
फिर नील गगन में राज करेगा, तेरा प्यारा मेरा प्यारा ।
जय भीम का अद्भुत नारा, जय भीम का अद्भुत नारा ।।

(अक्टूबर 10, 2016; 12:46 PM)


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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