24.1 C
New Delhi
Saturday, February 7, 2026

कविता: भारतीय समाज की दशा एवं दिशा

1914 में घूरे बोले पैट्रिक गेडेस से
क्या है समाजशास्त्र?
गेडेस बोले घूरे से
अभी तो इसका है आगाज,

आर. के. बोले डी. पी. से 1921 में
समाजशास्त्र में मूल्यों का है आधार
मुम्बई और लखनऊ के समाजशास्त्र में
बुक व्यू का होता रहा व्यवहार

Prof Vivik Kumar Poem

तब बोले दिल्ली से श्रीनिवास
शाह, बेते, राव आदि को लेकर साथ
समाज शास्त्रियों को
गांव में करना होगा प्रवास

फिर क्या था
भारतीय समाजशास्त्र में
बुक व्यू और फील्ड व्यू
का होने लगा वाद-विवाद

पर जे.एन.यू. में योगेंद्र और उमन
को यह सब ना था मंजूर
बहुयामी पद्धतिशास्त्र और संविधान संवत
पाठयक्रम से भरा समाजशास्त्र में नया गुरुर

70-80 के दशक से आने लगी
जेंडर के समाजशास्त्र की आवाज
देसाई, दुबे, पर्वथम्मा, वीणा, मीनाक्षी
रेगे, मैत्रीय, नोंगबरी, अंजुम की बात रही खास

इसी समय अल्पसंख्यक एवं आदिवासी समाजों
को समाजशास्त्र करने लगा स्पर्श
शायद इसलिए एंथ्रोपॉलजी और सोशियोलॉजी
के रिश्तों पर होने लगा विमर्श

लगभग सौ साल लगे निचली पायदान के
समाजशास्त्र को आने में
नंदू राम को अपनी मृदु भाषा में
पर्सपेक्टिव फ्रॉम बिलो को जमाने में

फिर भी 21वीं सदी में पूछ रहे हैं विवेक कुमार
हाउ मच ईगलिटेरियन इज समाजशास्त्र?
हाउ मच ईगलेटिरियन इज समाजशास्त्र?

(रचनाकार: प्रो विवेक कुमार)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

यूजीसी समानता विनियमन 2026: एससी, एसटी और ओबीसी के हितों पर एक गहरा आघात

वर्तमान में सामान्य श्रेणी के बीच इस बात को लेकर शोर है कि इन विनियमनों के कारण उन पर 'फर्जी मामलों' की बाढ़ आ...

क्या भगवान बुद्ध सचमुच क्षत्रिय थे?

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध...

बहनजी: जनकल्याण की अमर आवाज़

न भूखंड है, न सिंहासन है,न कोई राजमुकुट, न कोई ताज़ है,फिर भी शान से खड़ी हैं वो,भारत की एकमात्र बुलंद आवाज़ हैं। जिधर नज़र...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

बाबासाहेब का मिशन: सराय नहीं, संकल्प का दुर्ग है

भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रतीक हैं। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे ही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

काल का मिथ्या यथार्थ और शून्यता का बोध

बौद्ध दर्शन में काल कोई ठोस, स्वायत्त या वस्तुगत सत्ता नहीं है. वह न तो कहीं संचित है और न ही किसी स्वतंत्र अस्तित्व...

सरदार पटेल के दौर में पुलिसिया दमन और आदिवासी संघर्ष: खरसावां गोलीकांड (1948) का गहन ऐतिहासिक विश्लेषण

स्वतंत्र भारत के इतिहास में खरसावां गोलीकांड एक ऐसा कला अध्याय है जो रियासतों के विलय की प्रक्रिया में आदिवासी स्वशासन की मांगों की अनदेखी और पुलिसिया दमन...

सूर्य और चंद्रमा: बहुजन संघर्ष का शाश्वत अंतर

इतिहास की पृष्ठभूमि में जब हम भारतीय समाज की गहन पीड़ा को देखते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि शोषित, पीड़ित और वंचित...

चमारों की चेतना: आग से राख, राख से सिंहासन

'चमारों की इतनी जुर्रत!चमार राजनीति करेगा!चमार भाषण सुनाएगा!चमार देश चलाएगा!यह कैसा कलियुग आ गया!' यह बात 1980 के मध्य दशक की है। बहुजन समाज पार्टी...