N.D.A. और I.N.D.I.A. गठबंधन में शामिल लोगों का लक्ष्य आत्मनिर्भर बहुजन राजनीति को हासिये पर धकेलना है

“मनुवाद का षड्यंत्र और बहुजन आत्मनिर्भरता की चुनौती”

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक विचित्र विडंबना उभरकर सामने आती है। जो लोग आज भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए गठबंधन की माला जपते फिर रहे हैं, वही वास्तव में इसके पोषक और संरक्षक बन गए हैं। भाजपा का जन्म ही इस उद्देश्य से हुआ था कि आत्मनिर्भर बहुजन राजनीति को एक सशक्त विकल्प बनने से रोका जाए। मनुवादी शक्तियाँ इस चाल में सफल रही हैं, और इसका परिणाम यह है कि आज समूचा भारतीय राजनीतिक ताना-बाना दो ध्रुवों—कांग्रेस और भाजपा—के मध्य बँट गया है।

कांग्रेस और भाजपा, यद्यपि चेहरों में भिन्न प्रतीत होती हैं, किंतु वैचारिक, नीतिगत और एजेंडा के स्तर पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनके मुखौटों के भ्रमजाल में उलझा बहुजन समाज स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने और मनुवाद (कांग्रेस, भाजपा, टीएमसी, सपा, राजद, जदयू, शिवसेना, राकांपा, आप आदि) का विकल्प बनने के बजाय इनके मायावी जाल में फंसता जा रहा है। यही कारण है कि शोषित समाज अपनी ही आत्मनिर्भर पार्टी—बसपा—के प्रति नकारात्मक रुख अपनाए हुए है। बसपा और बहनजी के प्रति यह नकारात्मकता मनुवादी विचारधारा को बल प्रदान करती है और अम्बेडकरी विचारधारा पर आधारित राजनीति व आंदोलन के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है। यह भारत राष्ट्र निर्माण के लिए सर्वथा घातक है।

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में बहुजन समाज को अपनी आत्मनिर्भर अस्मिता और एजेंडे के अनुरूप खड़ा होने के लिए उन भ्रमित और नकारात्मकता के शिकार लोगों को समझना होगा कि भाजपा को मजबूत करने वाले, भले ही सतह पर अलग दिखें, किंतु वैचारिकता, नीति और एजेंडे में एनडीए और इंडिया गठबंधन के सभी घटक एक हैं। ये मनुवादी हैं, सामाजिक न्याय और समाजवाद का चोला ओढ़े हुए जातिवादी, पूंजीवादी, दलित, पिछड़े, आदिवासी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरोधी हैं। ये साम्प्रदायिकता के पोषक हैं। आइए, भाजपा को समय-समय पर खाद-पानी देकर पल्लवित करने वाले इंडिया गठबंधन के दलों के दूषित चरित्र को साहित्यिक दृष्टि से समझें।

1. कांग्रेस: मनुवाद का प्रथम संवाहक
कांग्रेस ने राम मंदिर का ताला खुलवाकर हिंदुत्व की राजनीति को पंख दिए और साम्प्रदायिकता को हवा देकर भाजपा को एक सशक्त एजेंडा भेंट किया। इसी कांग्रेस ने निजीकरण की नींव रखी, दलित-आदिवासी आरक्षण का कोटा कभी पूरा नहीं होने दिया, ओबीसी आरक्षण को लागू करने में आनाकानी की। नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी को भारत रत्न से नवाजने वाली इस कांग्रेस ने बाबासाहेब को इतिहास के पन्नों से मिटाने का हरसंभव प्रयास किया। बिना विज्ञापन के लैटरल एंट्री शुरू कर और आरक्षण को कमजोर कर इसने बहुजन समाज के हितों पर कुठाराघात किया।
पाँच दशकों से अधिक समय तक आजाद भारत पर शासन करने वाली कांग्रेस के कार्यकाल में न दलितों का आरक्षण पूरा हुआ, न ओबीसी को उनका हक मिला। बहुजन राजनीति को कुचलने के लिए रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) को पिछलग्गू बनाया गया। बाबासाहेब के विरुद्ध जगजीवन राम को खड़ा कर बहुजन समाज को गुमराह किया गया। जब मान्यवर कांशीराम साहेब ने बामसेफ के माध्यम से आत्मनिर्भरता का संकल्प लिया, तो कांग्रेस ने चमचों को खरीदकर इसे खंड-खंड कर दिया। आज भी कांग्रेस शासित राज्यों—राजस्थान, छत्तीसगढ़—में दलितों और आदिवासियों पर जघन्य अत्याचार जारी हैं। फिर भी कुछ तथाकथित बहुजन बुद्धिजीवी इसे सत्ता सौंपने को आतुर हैं। यह बाबासाहेब को तिलांजलि देकर गांधी के चरणों में नतमस्तक होने के समान है।

2. लालू यादव और नीतीश कुमार: साम्प्रदायिकता के सहायक
लालू यादव ने आडवाणी की रथयात्रा को ऐतिहासिक बनाने और हिंदुत्व को मजबूत करने के लिए उनकी गिरफ्तारी का नाटक रचा, जिससे बिहार में साम्प्रदायिकता का बीज बोया गया। इस वृक्ष का फल आज लालू परिवार, नीतीश कुमार और भाजपा संयुक्त रूप से भोग रहे हैं। नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ते हैं, सरकार बनाते हैं, मुख्यमंत्री बनते हैं और साम्प्रदायिकता को पोषित करते हैं। फिर भी कुछ लोग उन्हें सेक्युलर मानने की भूल करते हैं।

3. मुलायम सिंह यादव: उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिकता का पोषक
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की पटकथा को कांग्रेस की सहायता से सफल बनाया, जिससे भाजपा को मजबूती मिली। 1990 के दशक से सपा और भाजपा ने साम्प्रदायिकता के वृक्ष को संयुक्त रूप से सींचा। जब सपा इसकी जड़ें मजबूत करती है, तो भाजपा सत्ता में आती है; जब भाजपा इसे पल्लवित करती है, तो सपा को विपक्ष में सम्मानजनक स्थान मिलता है। यह एक सुनियोजित खेल है।

4. ममता बनर्जी: हिंदुत्व की छद्म विरोधी
ममता बनर्जी, जो स्वयं ब्राह्मण हैं, आरएसएस को देशहितकारी बताती हैं। भाजपा के साथ गठबंधन कर, एनडीए सरकार में मंत्री रहकर उन्होंने बंगाल में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया और भाजपा को मुख्य विपक्षी बनाया। फिर भी कुछ बहुजन बुद्धिजीवी इनमें सेक्युलरिज्म तलाशते हैं।

5. अरविंद केजरीवाल: संघ का सिपाही
केजरीवाल स्वयं को बचपन से संघी बताते हैं। वे आरक्षण का विरोध करते हैं, इसे बदनाम करने के लिए कहते हैं कि “आरक्षण वाले डॉक्टर मरीजों के पेट में कैंची छोड़ देते हैं।” नोटों पर गणेश-लक्ष्मी की तस्वीर की माँग करने वाले इस व्यक्ति की नींव विवेकानंद फाउंडेशन—आरएसएस का थिंक टैंक—पर टिकी है। फिर भी बहुजन और मुस्लिम इसमें अपना हित देखते हैं।

6. शरद पवार: बहुजन विरोधी चेहरा
शरद पवार, जिनका आधा परिवार भाजपा में है, ने मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहेब के नाम पर करने के लिए संघर्षरत छात्रों पर गोली चलवाई। मान्यवर साहेब का अपमान करने वाले इस व्यक्ति को कुछ चमचे समर्थन देते हैं।

7. ठाकरे खानदान: हिंदुत्व का प्रखर प्रतीक
महाराष्ट्र में साम्प्रदायिकता के प्रतीक ठाकरे परिवार को अब मुस्लिम तक सेक्युलर मानते हैं। यह एक विडंबना ही है।

8. डीएमके: पेरियार की धरती पर सनातन का खेल
तमिलनाडु में डीएमके सनातन के मुद्दे को हवा देकर भाजपा को स्थान दे रही है। उदयनिधि स्टालिन, जिसे कुछ बहुजन बुद्धिजीवी क्रांतिकारी मानते हैं, की माँ मनुवादी मंदिरों में सोना चढ़ाती है और वह स्वयं वहाँ माथा टेकता है। फिर भी इसमें बहुजन भविष्य तलाशा जा रहा है।

बसपा: एक अपवाद
कुछ नासमझ यह तर्क दे सकते हैं कि बसपा ने भी भाजपा के सहयोग से सरकार बनाई। यह सत्य है, किंतु इससे बड़ा सत्य यह है कि मान्यवर साहेब ने प्रथम सरकार बनते ही घोषणा की थी, “हमारी सरकार एक दिन चले या दो दिन, पर अपनी शर्तों और सिद्धांतों पर चलेगी।” बसपा ने अपने शासन में उत्तर प्रदेश का अम्बेडकरीकरण किया, परिवर्तन चौक का निर्माण शुरू किया और साम्प्रदायिकता को कभी पनपने नहीं दिया। इसकी नीति “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” रही, जिसमें शोषित समाज का सशक्तिकरण सर्वोपरि था।

निष्कर्ष
एनडीए और इंडिया गठबंधन का एकमात्र लक्ष्य आत्मनिर्भर बहुजन राजनीति को हाशिये पर धकेलना है। मनुवादी मीडिया, बिके हुए यूट्यूबर्स और पूंजीवादी-जातिवादी शक्तियाँ इस षड्यंत्र में संलग्न हैं। यदि बहुजन समाज, विशेष रूप से तथाकथित बुद्धिजीवी, इसे समझने में असफल रहते हैं, तो यह उनकी चेतना में बसी दलितपन की भावना, पिछलग्गूपन, आत्मविश्वास की कमी और वैचारिक शून्यता का परिणाम है। यह बसपा जैसे आंदोलन के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा है, जो समतामूलक समाज और भारत राष्ट्र निर्माण के लिए संकल्पित है। बहुजन समाज को इस मायाजाल से मुक्त होकर बसपा के साथ खड़ा होना होगा, तभी फुले, शाहू और बाबासाहेब का सपना साकार होगा। यह समय है सजगता का, आत्मचिंतन का और आत्मनिर्भरता के पथ पर बढ़ने का।


— लेखक —
(इन्द्रा साहेब – ‘A-LEF Series- 1 मान्यवर कांशीराम साहेब संगठन सिद्धांत एवं सूत्र’ और ‘A-LEF Series-2 राष्ट्र निर्माण की ओर (लेख संग्रह) भाग-1′ एवं ‘A-LEF Series-3 भाग-2‘ के लेखक हैं.)


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