आज हिन्दीभाषा मात्र हिन्दू भाषा बन कर रह गई है. इस भाषा में आज ‘श्रीगणेश करने’ से लेकर ‘वेद वाक्य’ तक, ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ से लेकर ‘लक्ष्मण रेखा’ तक, ‘इंद्र धनुष’ से लेकर ‘ब्रमांड’ तक कितनी ही हिन्दू शब्दावली घुसेड़ दी गई है. यह साम्प्रदायिक घुसपैठ इस कदर बढ़ गई है क़ि सब्ज़ियों का भी हिन्दुकरण हो गया है. ‘राम तोरी’ से लेकर ‘सीताफल’ तक इसके प्रमाण है.
हिंदू धर्म की वर्ण वादी मानसिकता जीव-जंतुओं पर भी थोप दी गई है. ‘डोम कौआ’ से लेकर ‘ब्रामणी मैना’ तक इसके उदाहरण है.
किसी धर्मनिरपेक्ष देश की राजभाषा में किसी एक धर्म की शब्दावली का वर्चस्व जायज नही है. इस भाषा की शब्दावली में घोर असहिष्णुता भी है. ‘लुच्चा’ शब्द जैन भाइयों के विरोध स्वरूप बना है तो ‘बुधु’ बौद्ध भाइयों के. शब्दों के इस साम्प्रदायिक रण की बहुत लंबी सूची है. ‘कोल’ एक आदिवासी जनजाति है. उसका एक अर्थ ‘सूअर’ क्यों है? उनकी मेहनती नारियों को लक्ष्य बनाकर ही कुलटा जैसे शब्द बनाये गए है. हिंदी भाषा में दलित जातिओं के अपमानजनक अर्थों की तो भरमार है ही. ‘काइयाँ’ एक दलित जाति है. इसका अर्थ ‘धूर्त’ कैसे हो गया. आज हमें हिंदी दिवस पर प्रण करना चाहिए क़ि हम हिंदी भाषा को हिन्दू भाषा बनने से रोकें.
(लेखक – सतनाम सिंह; ये लेखक के अपने विचार हैं)

