भारत में संसद, सरकार, न्यायपालिका, खबरपालिक और पुलिस सहित सभी जांच एजेंसियों के अधिकतम अधिकारीगण मिशनरी इंग्लिश मीडियम स्कूलों, कालेजों में पढे हैं।
इसके बावजूद अल्पसंख्यकों सहित भारत में धार्मिक, सांस्कृतिक विविधता के प्रति उनमें स्वागत भाव एवं न्यूनतम सामाजिक नैतिकता का जन्म भी नहीं हो सका है। इसका सीधा अर्थ यह है कि त्योहारों, कर्मकांडों और मिथकों सहित अपने महाकाव्यों और धर्मग्रंथों से सवर्ण तबका जो सीख रहा है वह भारत को आधुनिक एवं सभ्य बनाने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
मिशनरी संस्थाओं को भी गंभीरता से सोचना चाहिए कि उनके अब तक के सेवा कार्यों का क्या परिणाम हुआ है। इंग्लिश माध्यम की शिक्षा में अगर भारत के ओबीसी, दलितों, आदिवासियों को केंद्र में रखकर अगर गांवों के बच्चों को पढ़ाया गया होता तो आज स्थिति अलग होती।
मिशनरी संस्थाओं ने भारत के ब्राह्मणवादी तबके की मित्रता हासिल करने की अपनी रणनीति के चलते न केवल भारत के बहुजनों की उपेक्षा की है बल्कि ईसाई धर्म की मूल प्रेरणा के साथ भी अन्याय किया है।
इसी का परिणाम है कि भारत में ईसाई धर्म ओबीसी एवं दलितों का विश्वास नहीं जीत सका है।
इस्लाम ने स्थानीय ओबीसी एवं दलितों को नई आइडेंटिटी, नए नाम और नई जीवनशैली देने का वादा किया है। मिशनरी स्कूल अपने नाम ‘गुरुकुल’ ‘विद्यालय’ इत्यादि नामों से संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में रखने लगे हैं। यह पुरानी रणनीति रही है।
ब्राह्मणवादी तबके को प्रभावित करने की इस रणनीति की शुरुआत सेंट थामस से होती है जो भारत आकर खुद ब्राह्मण की तरह चोटी बढ़ाकर, खड़ाऊ पहनकर ब्राह्मणों को अपने धर्म का संदेश देना चाहते थे।
यहीं पर उनसे और उनके बाद के मिशनरी लोगों से सबसे बड़ी भूल हुई, अगर उन्होंने इस्लामिक प्रचारकों की तरह सबसे कमजोर तबके को चुना होता तो आज भारत की तकदीर बदल चुकी होती।
आश्चर्य और दुख कि बात है कि बाद के मिशनरी भी भारत के ब्राह्मणवादी अभिजात्य पर ध्यान केंद्रित करके भारत के ओबीसी दलितों एवं अन्य गरीब तबकों की उपेक्षा करते रहे।
इससे मिशनरी संस्थाओं ने ब्राह्मणवादी तबके की कृपा तो हासिल कर ली लेकिन भारत के ओबीसी और दलितों से दूर हो गया। दूसरी तरफ इस्लाम के प्रचारकों ने संस्थाओं के नाम तो छोड़िए व्यक्तियों के नाम तक नए रखने का तरीका अपनाया है।
इस्लामिक व्यवस्था में शामिल व्यक्ति को एकदम से नया नाम, नई पहचान, नया समाज और नई जीवन शैली मिलती है।
इसीलिए इस्लाम में ओबीसी तबके ने सर्वाधिक प्रवेश किया है। आज जितने मुसलमान भारत में हैं उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक ओबीसी तबके से आते हैं।
भारत में आकर ईसाई मिशनरियों ने एवं इस्लाम के प्रचारकों ने जो रणनीति अपनाई है उसे देखकर साफ नजर आता है कि ईसाई मिशनरी भारत के समाज को समझने में बहुत बड़ी भूल करते रहे हैं।
आज पूरे भारत के अभिजात्य वर्ग के बच्चों को अपने मिशनरी स्कूलों में शिक्षित करने के बावजूद ईसाई समाज अपने प्रति व्यापक सहानुभूति पैदा करवाने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सका है।
भारत के ईसाइयों और मुसलमानों को ब्राह्मणवादी तबकों से एवं बहुजनों से अपने संबंधों की रणनीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
(लेखक: संजय श्रमण; ये लेखक के अपने विचार हैं)

