21.3 C
New Delhi
Tuesday, March 3, 2026

कौन है भंते विनाचार्य जिसने महाबोधि महाविहार मुक्ति का बिगुल छेड़ दिया है?

सदियों से ब्राह्मणवाद के शिकंजे में कैद महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन में भंते विनाचार्य जी के साथ पूरा देश खड़ा हो गया है.

भंते विनाचार्य एक प्रमुख बौद्ध भिक्खु और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो महाबोधि महाविहार की मुक्ति के लिए सक्रिय रूप से आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं. यह आंदोलन महाबोधि मंदिर अधिनियम, 1949 (BT Act 1949) को रद्द करने और महाविहार का प्रबंधन पूरी तरह से बौद्ध समुदाय को सौंपने की मांग करता है, जिसे वर्तमान में ब्राह्मण और बौद्ध दोनों मिलकर संचालित करते हैं.

भंते विनाचार्य के इस आंदोलन को देशभर के बौद्ध समुदाय का व्यापक समर्थन मिल रहा है, जिसमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और तेलंगाना के लोग सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं. उनका उद्देश्य महाबोधि महाविहार को ब्राह्मण महंत के कब्जे से मुक्त कर बौद्ध भिक्खुओं को सौंपना है, ताकि बौद्ध धर्मावलंबियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सके.

Bhante Vinacharya Protestint at Mahabodhi Mahavihar
भंते विनाचार्य महाबोधि महाविहार की मुक्ति के लिए अपने साथी बौद्ध भिक्खुओं के साथ आंदोलन करते हुए.

भंते विनाचार्य बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों के धनी रहे. उन्होंने अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने की प्रेरणा अपने परिवेश से ही प्राप्त की. शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सांसारिक मोह-माया को त्यागकर जनकल्याण के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया. बहुजन समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष करना उनका जीवन उद्देश्य बन गया. उन्होंने अन्याय और अत्याचार से पीड़ित समाज के उत्थान के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया. इस संघर्ष में उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उनका संकल्प अडिग रहा.

समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि हिंसक क्रांति से अधिक प्रभावी मार्ग अहिंसा और धम्म का प्रचार-प्रसार है. इसके बाद उन्होंने बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के दिखाए मार्ग पर चलते हुए बौद्ध धम्म के प्रचार का संकल्प लिया. उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में धम्म देशना देना शुरू किया और बहुत कम समय में वे पूरे भारत में लोकप्रिय हो गए. उनके प्रवचनों ने लाखों लोगों को बुद्ध के करुणा और शांति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया.

लेकिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान बुद्ध की ज्ञान स्थली, महाबोधि महाविहार, बोधगया पर ब्राह्मणों का कब्जा है, तो वे चुप नहीं रह सके. यह देखकर उनका हृदय व्यथित हो उठा कि जहाँ स्वयं तथागत बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया, वहां आज बौद्धों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है. उन्होंने अपनी टीम के साथ बोधगया का दौरा किया और वहीं से एक ऐतिहासिक आंदोलन का शंखनाद कर दिया. उन्होंने प्रण लिया कि जब तक महाबोधि महाविहार को ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त नहीं करा लिया जाता, तब तक उनका संघर्ष अनवरत जारी रहेगा.

भंते विनाचार्य के इस अद्वितीय प्रयास ने बौद्ध समाज को जागरूक किया और उन्हें अपने धर्मिक स्थलों पर अधिकार के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी. उनका जीवन त्याग, संघर्ष और धम्म प्रचार का एक अनुपम उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा.

(लेखक: अरुण गौतम; ये लेखक के अपने विचार है)

Download Suchak App

खबरें अभी और भी हैं...

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’: बहन मायावती जी का दर्शन

भारतीय राजनीति और समाज सुधार के इतिहास में कुछेक व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिन्होंने न केवल अपने ऐतिहासिक कार्यों एवं विचारों से समाज को...

बसपा की असली जीत—शोषितों का जगा मनोबल है

भारतीय राजनीति के विशाल मंच पर जहाँ पार्टियाँ सत्ता की चकाचौंध में रंग-बिरंगे नृत्य करती दिखती हैं, वहाँ कांग्रेस का वंशानुगत विरासतवाद, भाजपा का...

पराये धन के सहारे नहीं, बहुजन के सहारे चलती है बसपा – बहनजी का अटल स्वाभिमान

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसके संस्थापक-मान्यवर श्री कांशीराम साहेब जी तथा बहनजी द्वारा स्थापित बहुजन आंदोलन की मूल विचारधारा (आम्बेडकरवाद) आत्मनिर्भरता, मान-सम्मान, स्वाभिमान...

कौन सी BAMCEF? मान्यवर साहेब की असली – या ब्राह्मणवादी वित्त पोषित नकली?

आज बहुजन संगठनों की महामारी में, जब बहुजन समाज के कानों में 'बामसेफ' का नाम गूँजता है, तो हृदय में एक अनिवार्य प्रश्न उदित...

न बिकने वाला बहुजन: मान्यवर साहेब का अमर मंत्र, बसपा का अटल संकल्प

बहुजन आन्दोलन के महान प्रणेता, मान्यवर श्री कांशीराम साहेब का वह उद्घोष आज भी बहुजन हृदय में गूँजता है—एक ऐसा संदेश जो न केवल...

‘समाज का कार्य, समाज के धन से ही हो सकता है, व्यक्तिगत से नहीं’ – बसपा आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का अमर सूत्र

बहुजन आन्दोलन की आत्मनिर्भरता का मूल मन्त्र— "समाज का कार्य समाज के धन से ही सम्पन्न होता है, व्यक्तिगत से नहीं।" भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में कुछ...

कठोर पत्थर, अमर संदेश: बहनजी का इतिहास-लेखन

जब इतिहास के पन्नों को मिटाने की साजिशें रची जाती हैं, तब पत्थर बोल उठते हैं। वे पत्थर जो न केवल कठोर होते हैं,...

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में “ऊँच-नीच” की मानसिकता: एक भयंकर ब्रह्मणी रोग

भारतीय समाज की सबसे गहरी और लगभग अटूट बीमारी उसकी जाति-आधारित ऊँच-नीच की मानसिकता है, जिसे विद्वान व विचारक "ब्रह्मणी रोग" या ब्राह्मणवादी चेतना...

ईश्वर अल्लाह गॉड: नाम की लड़ाई या पहचान का अहंकार?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से विविध धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ साँस लेती आई हैं, एक-दूसरे के साथ फलती-फूलती रही...

राजनीतिक सत्ता से समतामूलक संस्कृति की ओर: बहुजन समाज की स्वतंत्र अस्मिता का उदय

भारतीय समाज और आधुनिक लोकतंत्र के गहन अध्ययन से एक अटल सत्य उभरकर सामने आता है—जिनकी सांस्कृतिक पहचान मजबूत है, उनके पास ही सामाजिक...

भीमा कोरेगांव: जातिवाद पर विजय का ओजस्वी संदेश

दो सौ वर्ष पूर्व की वह गौरवमयी सुबह, जब भीमा नदी के तट पर पुणे के निकट कोरेगांव के मैदान में एक असाधारण महासंग्राम...

Opinion: समाजिक परिवर्तन के साहेब – मान्यवर कांशीराम

भारतीय समाज सहस्राब्दी से वर्ण व्यवस्था में बंटा है. लिखित इतिहास का कोई पन्ना उठा लें, आपको वर्ण मिल जायेगा. ‌चाहे वह वेद-पुराण हो...