किस्सा कांशीराम का 01: 13 अक्टूबर 2001 को साहेब ने अपने एक करीबी साथी फूल सिंह बरैया से यह इच्छा ज़ाहिर की थी कि तुम मुझे उस पूजनीय जगह ले चलो जहाँ बहुजन समाज के मसीहा बाबासाहेब आंबेडकर ने जन्म लिया था. वह साथी उस जगह से परिचित था. साहेब को गाड़ी में वह साथी इंदौर (मध्यप्रदेश) से 25 किलोमीटर दूर ‘महू’ नाम के कस्बे में ले आया. ड्राईवर को कार के पास छोड़ वह साथी साहेब को लेकर मंजिल की और बढ़े.
जिस घर में बाबासाहेब पैदा हुआ थे वहाँ एक इमली का वृक्ष लगा था. साहेब उस वृक्ष के नीचे जाकर खड़े हो गए. एक दम शाँत चित! काफी देर तक वह कुछ न बोले. फिर उन्होंने इमली के वृक्ष से एक पत्ता तोड़ते हुए अपने साथी से कहा, ‘तुम मुझसे वादा करो कि मेरा एक काम ज़रूर करोगे?’ साहेब अपने साथी की और मुखातिब हुए तो उनकी आँखों में आंसू तैर रहे थे.
साथी ने कहा, ‘साहेब जी, मेरी इतनी हेसियत कहाँ कि मैं आपके किसी काम आ सकूँ! हाँ, ये मेरी ज़िन्दगी अगर आपके किसी काम आ सके तो मैं खुद को धन्य समझूँगा.’
साहेब भावुक अवस्था में थे. उन्होंने कहा, ‘जहाँ बाबासाहेब ने अपनी ज़िन्दगी की पहली साँस ली, मैं वहीँ अपनी ज़िन्दगी की आखिरी साँस लेना चाहता हूँ.’ साहेब ने आगे कहा, ‘आप यहाँ डॉ. आंबेडकर जागृति केंद्र बनाएं, जहाँ मैं अपनी ज़िन्दगी के आखिरी पल बिता सकूँ. देश-विदेश से लोग आयें और मैं उन्हें अपने महापुरुषों के संघर्ष के बारे में बता सकूँ. लेकिन इस काम के लिए तो मध्यप्रदेश में हमारी सरकार होनी चाहिए. तब ही मेरा ये सपना पूरा होगा. तो मैं आपसे कहता हूँ, इस काम के लिए मेरा जितना भी इस्तेमाल करना है करो.’
(स्रोत: मैं कांशीराम बोल रहा हूँ का अंश; लेखक: पम्मी लालोमजारा, किताब के लिए संपर्क करें: 95011 43755)


