भारत में अबतक कुल 49 चीफ़ जस्टिस हुये लेकिन खास बात यह कि इन चीफ़ जस्टिस के साथ-साथ तमाम हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के जज महज़ चंद ही घरानों के लोग हैं ऐसा क्यों?
क्या इस बात की समीक्षा संसद, मीडिया, सोशल मीडिया इत्यादि में कभी हो सकेगी? समान प्रतिनिधित्व या खुली प्रतियोगिता कोई विमर्श हो?
लगभह 75 वर्षों में अबतक सिर्फ़ 37वें मुख्य न्यायाधीश माननीय के. जी. बालकृष्णन ही एकमात्र अनुसूचित जाति से बने जबकि महिलाओं के सम्बंध में अभी जाने कितना लंबा इंतजार करना पड़ेगा आखिर क्यों? यह कोलेजियम सिस्टम भारतीय न्याय प्रणाली के लिए ग्रहण का काम तो नहीं कर रहा?
क्योंकि आप देखिए अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाली भारत की बेटी मंजरी चावला को संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट कैलिफोर्निया द्वारा स्टेट बार कोर्ट सेनफ्रांसिस्को में 2018 में सर्वप्रथम जज बनाया गया था. दीपा अम्बेकर भी पहली बार मई 2018 में सिविल कोर्ट में अंतरिम जज बनी थीं.
वह कमिटी ऑन पब्लिक सेफ्टी में सीनियर लेजिस्लेटिव अटॉर्नी और काउंसेल भी रह चुकीं हैं. वह मिशिगन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुए हैं और रुटगर्स लॉ स्कूल से डॉक्टरेट डिग्री हासिल की हैं. अर्चना राव भी जनवरी 2019 में पहली बार सिविल कोर्ट में अंतरिम जज नियुक्त की गई थी.
अर्चना ने न्यूयॉर्क काउंटी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ऑफिस में 17 साल तक सेवाएं दी थीं. वह फाइनेंसियल फ्रॉड्स ब्यूरो की ब्यूरो प्रमुख भी हैं. वह वस्सार कॉलेज से ग्रेजुएट हैं और उन्होंने फॉर्दम यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ से डॉक्टरेटकी डिग्री हासिल की हैं.
दीपा अम्बेकर एवं अर्चना राव को अब न्यूयॉर्क सिटी के क्रिमिनल एंड सिविल कोर्ट्स का जज नियुक्त किया गया है. न्यूयॉर्क सिटी के मेयर बिल डी ब्लासियो ने जज अर्चना राव को क्रिमिनल कोर्ट में नियुक्त किया वहीं, जज दीपा अम्बेकर को सिविल कोर्ट में पुनर्नियुक्त किया है.
भारतीय मूल की महिलाएं लगातार विदेशों में उच्च पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हुई अपने देश का पूरी दुनिया में मान बढ़ा रही हैं लेकिन भारत मे सभी को उचित प्रतिनिधित्व व समान अवसर न मिलना एक चिंता का विषय भी है और प्रगति, न्यायिक प्रक्रिया में बड़ी बाधा है.
इस विषय को यदि अलग भी रखें तब भी सुप्रीम कोर्ट में जब एससी, एसटी एट्रोसिटी-एक्ट पर फैसला दिया जा रहा था उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में एससी एसटी का एक भी जज नहीं था. क्या यह न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है? टीवी डिबेट से लेकर जजों के न्याय तक दूसरों का फैसला तीसरे कर रहे हैं आखिर क्यों?
संविधान के आर्टिकल-229 के अनुसार कर्मचारियों एवं अधिकारियों के मामले में उच्च न्यायालय अपने आप को राज्य मानता है और राज्य के अनुसार आर्टिकल-15 ( 4)-16 (4) और 16(4 ) (क) का पालन क्यों नहीं किया जाता है इसकी भी ठीक से समीक्षा होनी चाहिए? तथा उचित प्रतिनिधित्व पर विचार होना चाहिए.
यदि यह भी नहीं तो संविधान के आर्टिकल-312 (1) के अनुसार जजों की भर्ती के लिए न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन होना चाहिए तथा संविधान संशोधन, अधिनियम 1976-के 42 वें संशोधन के अनुसार जजों की भर्ती के लिए ऑल इंडिया जुडिशरी सर्विस का गठन किया जाना चाहिए यह क्यों नहीं हुआ?
अंतिम बात ऑल इंडिया जुडिशरी सर्विस का गठन करके खुली प्रतियोगिता तो तुरन्त होनी चाहिए तथा नेताओं, जजों, वरिष्ठ वकीलों के अयोग्य बच्चे न्याय के सिंहासन बैठकर मनमाफिक न्याय दे ऐसा प्रचलन बन्द होना चाहिए. न्यायपालिका कभी भी विधायिका के हिसाब से नहीं चलनी चाहिए. इससे तानाशाही बढ़ेगी और न्यायिक चरित्र घटेगा.
कोलेजियम सिस्टम क्या होता है इसे आप इस वीडियो के माध्यम से समझ सकते हैं.
(लेखक: आर पी विशाल, यह लेखक के निजी विचार हैं)

