ओपिनियन: तुम्हें मरे जानवर का मीट खाना छोड़ना चाहिए था, काटे गए जानवर का नहीं

मेरे पिता जी बताते थे, वे जब छोटे थे तो मरे जानवर उठाने और उनका चमड़ा निकालने का काम हमारे वे लोग करते थे जिन्हें जातिव्यवस्था में चमार नाम दिया है. मरे जानवर का चमड़ा निकालने के बाद वे उसका गोश्त काटकर ले जाते थे. मरे जानवर का वे खून घड़े में भरकर ले जाते थे. माँस की लड़ियाँ बनाकर वे सुखा लेते थे और फिर कई दिनों तक खाते थे. कुछ लोग बताते हैं कि बुद्ध ने जीवहत्या की मनाही की थी इसलिए वे मरे जानवर का मीट खाते थे. मेरे विचार से मरे जानवर का गोश्त खाने के पीछे ग़रीबी थी. जातिव्यवस्था में जिन्हें “अछूत” घोषित किया गया है, उनसे आय के सारे साधन छीन लिए गए थे. जिसने भी जातीय पेशे के अलावा दूसरा पेशा अपनाने की कोशिश की उसकी या तो हत्या कर दी गई या फिर उसे बेरहमी से पीटा गया. अंग्रेजी शासन के दौरान जब उन्हें पीटना या उनकी हत्या करना आसान न रहा तो तमाम पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़कर उनका बहिष्कार कर दिया गया. इस बहिष्कार से उनका दूसरा धन्धा चौपट कर दिया गया. इस तरह उन्हें फ़िर से उसी पेशे पर लौटना पड़ा जो पेशा जातिव्यवस्था ने उन्हें सौंपा था.

अछूत घोषित किए गए लोगों को सौंपे गए पेशों की एक ख़ास बात यह भी थी कि उन पेशों से इन्हें नक़द पैसे नहीं दिए जाते थे बल्कि रोटी या फिर फ़सल का एक हिस्सा दिया जाता था. नक़द पैसे न होने की वजह से ये अपने भोजन के लिए पूरी तरह से उन पर निर्भर रहते थे जिनके यहाँ ये काम करते थे. अपनी मर्ज़ी का भोजन करने के लिए इनके पास पैसे न थे. मेरे विचार से इसीलिए ये मरे जानवर का मीट खाने को मजबूर थे.

कई ऐसी घटनाएं बताती हैं कि इन्हें भैंस जैसे बड़े जानवर पालने तक की इजाज़त नहीं थी. अगर इन्हें बड़े जानवर पालने की आजादी होती तो भी ये मरे जानवर का मीट स्वीकार नहीं करते.

हमारे फेसबुक मित्र कुरील जी बताते हैं कि जब वे छोटे थे तो उनके परिवार में मरे जानवर का मीट खाया जाता था. उस समय घर में कबीरपंथी कुछ बाबा आए और उन्होंने परिवार के 10-12 लोगों को कण्ठी-माला पहनाकर माँस खाने से मना कर दिया. आर. जी. कुरील जी ने जब बाबासाहब डॉ अम्बेडकर, पेरियार, ललई सिंह और रामस्वरूप वर्मा जैसे लोगों को पढ़ा तो उन्होंने माँसाहार शुरू कर दिया.

मेरे विचार से हमारे जिन लोगों को जातिव्यवस्था में चमार से शामिल किया गया है, उनको मरे जानवर का मीट छोड़ना चाहिए था, मांसाहार नहीं छोड़ना चाहिए था. माँसाहार छोड़ देने से अछूत घोषित की गई जातियों में खानपान का अंतर आ गया. खानपान में आए इस अंतर के कारण इनके बीच वैवाहिक संबंध और मुश्किल हो गए हैं.

जातिव्यवस्था बरगद के पेड़ की तरह है. यह जितना ऊपर से विशाल दिखाई देती है उतनी ही ये छुपी हुई है. ठीक बरगद की जड़ों की तरह…

अछूत घोषित किए गए लोगों के बीच जाति ख़त्म नहीं हो पा रही है उसका एक बड़ा कारण उनके बीच भोजन का अंतर भी है. दुनिया के तमाम देशों में लोग एक हैं, इसका एक बड़ा कारण उनका एक खानपान है.

(लेखक: स्टिफन फ्लेमिंग; ये लेखक निजी विचार हैं.)

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